फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Blog ›   bihar election 2020 bjp wins by great margin in bihar west bengal elections political parties bjp

बिहार खास के बाद अब बंगाल से आस...भाजपा दो कदम आगे, कांग्रेस ने नहीं सीखा

Sat, 14 Nov 2020 02:33 PM IST
Hari Verma हरि वर्मा
Updated Sat, 14 Nov 2020 02:33 PM IST
विज्ञापन
bihar election 2020 bjp wins by great margin in bihar west bengal elections political parties bjp
एनडीए के बहुमत से महज तीन सीटें ज्यादा हासिल करने पर भाजपा ने इसे बड़ी जीत साबित करने की कोशिश की - फोटो : पीटीआई

खबर है कि पटना में कांग्रेस विधायक दल का नेता चुने जाने के लिए शुक्रवार को बुलाई गई बैठक में हाथापाई की नौबत आ गई। बिक्रम से विधायक सिद्धार्थ सौरभ ने विजय शंकर के खिलाफ नारेबाजी की। और अंत में विधायक दल का नेता चुनने के लिए सोनिया गांधी को अधिकृत किया गया।

विज्ञापन


हाईकमान के हस्तक्षेप के बाद भागलपुर से मामूली मतों से जीते अजीत शर्मा को विधायक दल का नेता बना दिया गया। दूसरी खबर यह है कि एनडीए के घटक दलों के प्रमुखों संग बैठक में 15 नवंबर को नेता चुनने पर औपचारिक फैसला होगा। फैसला राजग के सभी नवनिर्वाचित विधायक मिलकर करेंगे।
विज्ञापन



नीतीश का नेता चुना जाना तय है। इन दोनों घटनाक्रम में अप्रत्याशित कुछ भी नहीं। दोनों में अंतर है तो बस भाजपा और कांग्रेस का। एक घटनाक्रम में यह झलकाने की कोशिश की गई है कि एनडीए में नेता का चुनाव नवनिर्वाचित विधायक मिलकर लोकतांत्रिक प्रक्रिया से करेंगे।
विज्ञापन
विज्ञापन


दूसरे घटनाक्रम में जूतमपैजार के बाद विधायक दल नेता का चुनाव नवनिर्वाचित विधायकों के बदले कांग्रेस हाईकमान को करना पड़ा। भाजपा के दो से यहां तक पहुंचने के सफर और कांग्रेस के सिकुड़ने को बिहार चुनाव के ताजा घटनाक्रम से महसूस किया जा सकता है।

कांटे की टक्कर में एनडीए के चुनाव जीतने पर नरेंद्र मोदी ने दिल्ली भाजपा मुख्यालय में मेगा शो कर मामूली जीत को न केवल बड़े जश्न में तब्दील कर दिया, बल्कि पार्टी कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाया। एनडीए के बहुमत से महज तीन सीटें ज्यादा हासिल करने पर भाजपा ने इसे बड़ी जीत साबित करने की कोशिश की।

जश्न बिहार की जीत का था लेकिन जोश बंगाल के लिए भरा जा रहा था। भाजपा अब बिहार में आत्मनिर्भर हो चुकी है। उसे बंगाल में अपने पैरों पर खड़ा होना है। मौत से मत को जोड़ने और कार्यकर्ताओं की हत्याओं की निंदा कर मोदी ने बंगाल का लक्ष्य साफ कर दिया। असल में बिहार के इसी नतीजे ने बंगाल के लिए भाजपा के सामने चुनौती भी रख दी है।

बिहार में वामदलों ने शानदार प्रदर्शन किया। बंगाल में भाजपा को जहां ममता से लड़ना है, वहीं वामपंथ की पुरातन धरती पर कमल खिलाने की चुनौती है। जब बिहार में मतदान का दौर चल रहा था, तो भाजपा के चाणक्य बंगाल की धरती पर कमल खिलाने के होमवर्क में जुट चुके थे।

दक्षिणेश्वर काली की पूजा-अर्चना और भात खाकर वह बंगाल की नब्ज टटोलने के साथ-साथ एजेंडा सेट कर रहे थे। इससे पहले भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा भी बंगाल हो आएं हैं। चर्चा रही कि पूरे बिहार चुनाव में कहीं भी भाजपा के चाणक्य नजर नहीं आएं।

जब बंगाल के चुनाव हों तब भी शायद वह लोगों और सियासी विश्लेषकों को नजर न आएं। तब उनकी जेहन में शायद यह याद न रहे कि नतीजे में जब बिहार खास था तो बंगाल से आस था। चाणक्य अपनी नीति-रणनीति तैयार करने में बंगाल में जुट चुके थे। बिहार में भी ऐसा ही हुआ था।

चुनाव से तीन महीने पहले कोरोना संकट में उन्होंने न केवल ताबड़तोड़ वर्चुअल रैलियां कीं, बल्कि नीतीश के साथ-साथ सहयोगियों और विरोधियों का मन-मिजाज पढ़ चुके थे। भाजपा की यह तीन स्तरीय तैयारी को दर्शाता है। अमित शाह, जेपी नड्डा और फिर मोदी का फाइनल स्ट्रोक।

कांग्रेस का 70 सीटों पर लड़ने का फैसला ही गलत था...

bihar election 2020 bjp wins by great margin in bihar west bengal elections political parties bjp
कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने अपनी पार्टी की बिहार में हार की समीक्षा या नतीजे पर चर्चा करना मुनासिब नहीं समझा - फोटो : पीटीआई

इसके उलट बिहार नतीजे के बाद कांग्रेस के घटनाक्रम पर गौर करें तो हार का पार्टी ने न तो मंथन किया, न वामदलों को साथ लेकर बंगाल के संभावित लक्ष्य की फिलहाल कोई चिंता दिखाई। और तो और पार्टी के भीतर ही नेतृत्व पर सवाल उठने लगे। इतना ही नहीं राहुल गांधी को नए साल (जनवरी 21) में पार्टी में फिर से स्थापित करने पर चर्चा छिड़ पड़ी।

कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने अपनी पार्टी की बिहार में हार की समीक्षा या नतीजे पर चर्चा करना मुनासिब नहीं समझा। दिग्विजय सिंह ने नीतीश पर डोरे डाले। इससे साफ हो गया कि उन्हें घर (पार्टी) की नहीं पड़ोसियो (दूसरों) की चिंता है। बिहार के नतीजे से यह साफ है कि महागठबंधन की जीती बाजी का पासा कांग्रेस की वजह से पलटा।

अब तो दीपांकर ने भी साफ कर दिया कि कांग्रेस का 70 सीटों पर लड़ने का फैसला ही गलत था। याद कीजिए, जब बिहार चुनाव में महागठबंधन में सीटों की उलझन थी, तो कांग्रेस बार-बार घुड़की देती रही, हम अकेले ही सभी सीटों पर लड़ सकते। अरसे से बिहार में जब-जब कांग्रेस अकेले लड़ी है, पिछड़ी  है।

2015 के बिहार चुनाव में कांग्रेस ने 42 में 27 सीटें इसलिए हासिल कीं, उस समय उसके साथ लालू-नीतीश थे। कई सीटों पर सिंबल भले पंजा का था लेकिन पकड़ (उम्मीदवारी) राजद-जदयू की थी। पिछले नतीजे से उत्साहित कांग्रेस को इस बार लगा, शायद वह ज्यादा सीटों पर लड़कर खुद को बुलंद कर ले, लेकिन इसी गफलत में उसने पुराना सम्मान भी खो दिया।

न कम सीटों पर मानी और न ही इस बार उसने राजद के चेहरे को अपनाया। शुरू में तो कांग्रेस के भीतर से टिकट खरीद-फरोख्त के आरोप तक उछले। रही-सही कसर पार्टी नेताओं के बिगड़े बोल ने निकाल दी। कांग्रेस में यह चलन पुराना है।

2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव की बात हो या कई विधानसभा चुनावों की, जब-जब कांग्रेस को मजबूती की जरूरत पड़ी, तब-तब पार्टी नेताओं के अलग-अलग सुर-ताल से बंटाधार होता रहा। पिछले चुनावों में चायवाला, नीच, जिन्ना, पाक प्रेम जैसे राग से कांग्रेस नुकसान उठाती रही है। बिहार के साथ हुए उपचुनावों के नतीजों से कांग्रेस को सबक व सीख लेने जरूरत है। व्हाट नेक्सट... दो कदम आगे की सोच से भाजपा आगे निकलती गई और कांग्रेस का हश्र सबके सामने है।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed