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भोपाल गैस त्रासदी: एक बुझी हुई ‘जीवन ज्योति’, न्याय की आस में 35 बरस गुजर गए

Chandrakanta kumari चंद्रकांता कुमारी
Updated Sun, 08 Dec 2019 09:14 AM IST
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bhopal gas tragedy Survivors still struggle for better life after 35 years of this Disaster
इस भयावह त्रासदी में 15000 से अधिक लोगों (पशुओं की भी) की जान चली गई। - फोटो : Facebook @CK

यूनियन कार्बाइड कंपनी के भोपाल स्थित कारखाने से 2-3 दिसंबर 1984 की रात एमआईसी नाम की एक बेहद जहरीली गैस का रिसाव हुआ, जिससे 15000 से अधिक लोगों (पशुओं की भी) की जान चली गई, गर्भवती महिलाओं का गर्भपात हो गया और बहुत सारे लोग अनेक तरह की शारीरिक अपंगता या अंधेपन का शिकार हो गए। एमआईसी या मिथाइल आइसो साइनाइट नाम की यह गैस कीटनाशक बनाने के लिए इस्तेमाल की जाती है। यह त्रासदी इतनी भयावह थी कि किसी-किसी घर में पुरुषों की संख्या शून्य रह गई।

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जिन महिलाओं ने इस त्रासदी में अपने पतियों को हमेशा के लिए खो दिया था, उनके लिये मध्य प्रदेश हाउसिंग सोसाइटी द्वारा शहर से लगभग आठ किलोमीटर दूर करोंदकला गांव में पुनर्वास की व्यवस्था की गई थी। ‘गैस विधवा कॉलोनी’ के नाम से एक पुनर्वास कॉलोनी बनाई गई, बाद में जिसका नाम बदलकर ‘जीवन ज्योति कॉलोनी’ कर दिया गया। लेकिन लोगों की असंवेदनशीलता का आलम यह है कि वे आदतन आज भी इसे ‘विधवा कॉलोनी’ कहकर ही बुलाते हैं।
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यह ‘जीवन ज्योति कॉलोनी’ अब अराजक पुरुषों की अय्याशी का अड्डा बन गई है। महिलाओं से छेड़छाड़ करना या उन पर अश्लील फब्तियां कसना यहां आम बात है। पुलिस और प्रशासन का रवैया भी इस संदर्भ में की जाने वाली शिकायतों पर बेहद निराशाजनक है।
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इन महिलाओं को मिलने वाली पेंशन बंद कर दी गई है और इन घरों के समुचित मालिकाना हक आज भी इन महिलाओं के पास नहीं हैं। यहां गैस राहत विभाग ने महिलाओं के रोजगार के लिए शेड भी बनाए थे, जिनमें लंबे अरसे से ताला लगा हुआ है। लगभग सभी मकान जर्जर हालत में हैं और बिजली, पानी या सीवर की कोई नियमित सुविधा भी इस कॉलोनी में नहीं है। हालात इतने खराब हैं की नाले की गंदगी बहकर घरों तक आ जाती है। बस्ती में कूड़े के ढेर लगे हुए हैं और सड़कें हर जगह गहरे गड्ढों से भरी हुई है।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भोपाल गैस कांड की मुख्य आरोपी कंपनी की संपत्तियां नीलाम कर ‘भोपाल मेमोरियल अस्पताल एवं रिसर्च सेंटर’ (बीएमएचआरसी) बनाया गया था ताकि गैस पीड़ितों को यथासंभव चिकित्सीय सुविधा मिल सके, लेकिन बीएमएचआरसी में चिकित्सकों और सुविधाओं दोनों का अभाव है। शायद इसे भी निजी हाथों में सौंपे जाने की तैयारी चल रही है। कुल मिलाकर भोपाल गैस कांड की ये पीडिताएं और उनका परिवार पुनर्वास के नाम पर एक और नरक भोग रहे हैं।

bhopal gas tragedy Survivors still struggle for better life after 35 years of this Disaster
भोपाल गैस त्रासदी मानवता के इतिहास में एक भयावह दुर्घटना थी। - फोटो : फाइल फोटो

न्याय की आस में 35 बरस गुजर गए

भोपाल गैस इस त्रासदी के जिम्मेदार लोगों पर मूल एफआईआर आईपीसी की धारा 304 ए के तहत दर्ज की गई थी। धारा 304 के दो भाग हैं- 304 ए के तहत ‘लापरवाही से हुई हत्या’ का मामला दर्ज किया जाता है, जिसमें सजा की अधिकतम अवधि दो वर्ष है जबकि इसके दूसरे भाग 304 बी के तहत  ‘गैर इरादतन हत्या’ का मामला चलाया जाता है, जिसमें कम से कम 10 वर्ष की सजा का प्रावधान है। हमेशा की तरह रसूखदारों को बचाने के लिये बेहद मामूली धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज किया गया।

20 नवंबर, 2016 को भोपाल की अदालत ने मध्य प्रदेश सरकार के दो पूर्व अधिकारियों – स्वराज पुरी और मोती सिंह पर मामला दर्ज करने के आदेश दिए थे, क्योंकि इन्होंने यूनियन कार्बाइड के अध्यक्ष वॉरेन एंडरसन को भोपाल से भाग निकलने देने में मदद की थी। दुःख की बात है कि इस बात का पता लगने में ही 32 वर्ष निकल गए। अमेरिकी व्यवसायी एंडरसन को कभी वापस भारत नहीं लाया जा सका और 2014 में उसकी मृत्यु हो गई।

इस त्रासदी में अधिकांश महिलाओं ने अपने घरों के पुरुषों को खो दिया, गर्भवती महिलाओं का या तो असमय गर्भपात हो गया या फिर उन्होंने शारीरिक विकृति के साथ बच्चों को जन्म दिया। इनमें से बहुत-सी महिलाएं आज भी कैंसर, टीबी, आंखों और फेफड़ों की बीमारी से जूझ रही हैं। भोपाल गैस पीड़ितों के लिए गठित मंत्री समूह ने जून 2010 को विधवाओं को अगले पांच वर्ष तक एक हजार रुपए मासिक आजीविका पेंशन दिए जाने का निर्णय लिया था, जिसे अप्रैल, 2014 से बंद कर दिया गया है।

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इस घटना से प्रभावित लोगों ने न्याय की उम्मीद में ‘पांच गुहार’ नाम का अभियान भी शुरू किया था। - फोटो : Social Media

इस घटना से प्रभावित लोगों ने न्याय की उम्मीद में ‘पांच गुहार’ नाम का अभियान भी शुरू किया था, ताकि सरकार और प्रशासन को अपनी पीड़ा का एहसास करवा सकेें। पीड़ितों की मांग के इन पांच मांगों में चिकित्सा देखभाल, आर्थिक व सामाजिक पुनर्वास, पर्याप्त मुआवजा, मिटटी व गंभीर रूप से दूषित हो चुके भूमिगत जल का निस्तारण और त्रासदी के अपराधियों को उचित सजा देना शामिल हैं। सरकारें बदलती रहीं, लेकिन भोपाल गैस के पीड़ित अब तक न्याय का इंतजार कर रहे हैं।

भोपाल गैस त्रासदी से जुड़े हुए एक एक्टिविस्ट अब्दुल जब्बार साहब का अभी हाल ही में निधन हुआ है। आपको जानना चाहिए कि जब्बार साहब ने गैस त्रासदी के पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए एक लंबी लड़ाई लड़ी थी। वे इस त्रासदी के भुग्तभोगी भी थे। भोपाल गैस रिसाव कांड में उन्होंने भी अपने माता-पिता को खो दिया था। खुद जब्बार साहब की आंखों और उनके फेफड़ों पर मिथाइल आइसो साइनाइट गैस का बहुत गंभीर असर हुआ था। इस दर्दनाक त्रासदी से जुड़े कितने ही अनकहे किस्से इतिहास के पन्नों में दर्ज होकर रह गए हैं।

कुल मिलाकर सरकार और प्रशासनिक अधिकारियों की लापरवाही, भ्रष्टाचार और लीपापोती का नतीजा आज तक भोपाल गैस त्रासदी के पीड़ित लोग और उनके परिवार भुगत रहे हैं। इस कांड में किसी भी तरह से लिप्त लोगों पर देशद्रोह का मुकद्दमा चलाया जाना चाहिए।

(लेखिका स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। पर्यावरण, स्त्री विमर्श और अन्य जरुरी संवेदनशील मुद्दों पर लेखन करती हैं।)

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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