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यादों में बप्पी दा: 70 के दशक के युवाओं की बेचैनी को संगीत में ट्रांसलेट किया बप्पी दा ने

Wed, 16 Feb 2022 04:04 PM IST
Ajay Bokil अजय बोकिल
Updated Wed, 16 Feb 2022 04:04 PM IST
सार

अलग काम अलग लुक वाले बप्पी दा ने बुधवार को अंतिम सांस ली। लेकिन उनके गाए और कंपोज किए कई यादगार गीतों के बगैर फिल्म संगीत का इतिहास अधूरा रहेगा। 27 नवंबर 1952 को जन्मे बप्पी लहरी का असली नाम अलोकेश लाहिरी था, लेकिन वो बप्पी के नाम से ही जाने गए।

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Bappi Lahiri Death How Bappi Lahiri changed the dynamics of Indian music industry in 1970s
बप्पी ने डिस्को संगीत लाकर फिल्म संगीत को एक नया और लोकप्रिय आयाम दिया। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

अगर भारतीय सिने संगीत की फ्रंट लाइन तय की जाए तो उसमें बप्पी लहरी का नाम शायद न हो, लेकिन दूसरी पंक्ति के अग्रणी और प्रतिभाशाली संगीतकारों में बप्पी दा नाम हमेशा रहेगा। पचास के दशक के माधुर्य भरे लेकिन धीमी गति के संगीत, साठ के दौर के मेलोडियस मगर तेज गति के संगीत और सत्तर के दशक के शुरूआती कैबरे संगीत के दौर को बप्पी ने इलेक्ट्रॉनिक ध्वनियों वाले डिस्को संगीत में बदलकर अलग पहचान बनाई।

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अलग काम अलग लुक वाले बप्पी दा ने बुधवार को अंतिम सांस ली। लेकिन उनके गाए और कंपोज किए कई यादगार गीतों के बगैर फिल्म संगीत का इतिहास अधूरा रहेगा। 27 नवंबर 1952 को जन्मे बप्पी लहरी का असली नाम अलोकेश लाहिरी था, लेकिन वो बप्पी के नाम से ही जाने गए।

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पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी में जन्में बप्पी के माता-पिता भी संगीत से जुड़े थे। सत्तर के दशक में बॉलीवुड के तेज गानों के दौर के उत्तरार्द्ध में जो युवा संगीतकार तेजी से उभरे, उनमें बप्पी लहरी का नाम प्रमुख है। अगर परंपरा की बात की जाए तो बप्पी ने वास्तव में सिने संगीत के आर.डी.बर्मन स्कूल को ही आगे बढ़ाया।

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फर्क इतना था कि जहां आरडी पश्चिमी जैज संगीत को हिंदी फिल्मों में लेकर आए तो बप्पी ने डिस्को संगीत लाकर फिल्म संगीत को एक नया और लोकप्रिय आयाम दिया। हालांकि, उन्होंने शास्त्रीय संगीत पर आधारित अच्छे गीत भी दिए। यूं बप्पी दो दशक तक संगीत देते रहे, लेकिन उन्हें सबसे ज्यादा लोकप्रियता अस्सी के दशक में मिली।  

 

बप्पी लहरी को हिंदी सिने संगीत में डिस्को स्टाइल लाने और लोकप्रिय बनाने का श्रेय जाता है।  डिस्को डांसर, डांस डांस, चलते चलते और नमक हलाल में तो उन्होंने गाया भी। आय एम ए डिस्को डांसर, यार बिना चैन कहां रे, गीत खूब मशहूर हुए।


इसके पहले हिंदी फिल्म संगीत विदेशी रॉक एंड रोल संगीत का काफी प्रयोग हो रहा था। उसके बाद कैबरे संगीत भी हिंदी फिल्मों की अनिवार्यता बन गया। लेकिन इलेक्ट्रॉनिक ध्वनियों वाला डिस्को संगीत भारतीय दर्शकों और श्रोताओं के लिए बिल्कुल नई चीज था।

Bappi Lahiri Death How Bappi Lahiri changed the dynamics of Indian music industry in 1970s
यूं बप्पी ने फिल्मों में संगीत देना तो 1973 से ही शुरू कर दिया था, लेकिन बॉलीवुड में उन्हें पहचान फिल्म ‘जख्मी’  के गीतों से मिली। - फोटो : facebook

दरअसल डिस्को डांस म्यूजिक का जन्म 1970 के आसपास यूरोप और लैटिन अमेरिका में हुआ। तेज बीट्स पर आधारित यह संगीत उन डिस्कोथेक की जान हुआ करता था, जो द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जन्में अस्तित्ववादी  दर्शन की उपज थे। डिस्कोथेक में युवा इलेक्ट्रॉनिक और सिंथेसाइज्ड म्यूजिक पर थिरका करते थे। नाचना गाना और पीना।

इसी संस्कृति ने डिस्को संगीत को जन्म दिया था। ये संगीत अश्वेत, समलैंगिको और लैटिन अमेरिकी युवाओं में खासा लोकप्रिय हुआ। ये डिस्कोथेक अंडरग्राउंड नाइट क्लब थे।  सम्मोहक रिदम्, बार दोहराए जाने वाले लिरिक्स और इलेक्ट्रॉनिक ध्वनियां इनकी खासियत थी।। उनके साथ लप झप करती तेज रोशनियां और मदहोश होते युवा इनकी खास पहचान थी।  

भारत में जिस दौर में डिस्को संगीत लोकप्रिय हुआ, वो सिने संगीत के स्वर्ण युग के संध्याकाल में उभरे पश्चिमी कैबरे संगीत से भी दर्शकों के ऊबने का समय था। देश में बेरोजगारी तेजी से बढ़ रही थी और अर्थव्यवस्था भी खस्ताहाल थी।

जेपी आंदोलन के चलते पूरे देश में राजनीतिक और सामाजिक उथल-पुथल मची थी। ऐसे दौर में बेहतर जिंदगी की तलाश में भटकते युवा इस डिस्को संगीत की ओर तेजी से आकर्षित हुए। बप्पी  ने युवाओं की उसे बेचैनी और छटपटाहट को अपने डिस्को संगीत में अनूदित करने का प्रयास किया। 

Bappi Lahiri Death How Bappi Lahiri changed the dynamics of Indian music industry in 1970s
बप्पी का डिस्को संगीत और उस पर मिथुन चक्रवर्ती का थिरकना, एक दूसरे के पर्याय बन गए। - फोटो : ANI

यूं बप्पी ने फिल्मों में संगीत देना तो 1973 से ही शुरू कर दिया था, लेकिन बॉलीवुड में उन्हें पहचान फिल्म ‘जख्मी’  के गीतों से मिली। उसका एक गाना ‘जलता जिया मेरा, भीगी-भीगी रातों में’ खासा लोकप्रिय हुआ। लोगों ने एक संगीतकार का नाम सुना बप्पी लाहिरी।
 

इसी फिल्म का और लता मंगेशकर का गाया ‘अभी अभी है दोस्ती, अभी है दुश्मनी’ आज भी सुना जाता है। बप्पी लहरी ने डिस्को गीतों के साथ कुछ पारंपरिक और शास्त्रीय रागों पर आधारित गीत भी दिए। फिल्म ‘एतबार’ की गजल ‘ किसी नजर को तेरा इंतजार आज भी है’ आज भी उतनी ही कर्णप्रिय है। लेकिन उनकी खास पहचान डिस्को संगीत से ही बनी।


बप्पी का डिस्को संगीत और उस पर मिथुन चक्रवर्ती का थिरकना, एक दूसरे के पर्याय बन गए। हालांकि, नब्बे के दशक में सिने संगीत ने फिर एक नई करवट ली। कुछ तेज मगर मेलोडियस संगीत का दौर आया। बप्पी दा के संगीत की खूबी यह थी कि तेज ध्वनियों और इलेक्ट्रॉनिक साउंड्स के बाद भी उन्होंने संगीत में मेलोडी को हमेशा जिंदा रखा।

हालांकि, इस दौर की मेलोडी को लिरिक्स के स्तर पर काव्यात्मक और साहित्यिक पुट का वैसा साथ नहीं मिला, जो पचास और साठ के दशक के सिने संगीत को मिला था। लेकिन बप्पी जैसे प्रतिभाशाली संगीतकारों ने इस कमी की पूर्ति आर्केस्ट्रेशन में विविधता लाकर पूरी करने की कोशिश की। दूसरे, इस दौर में जवां होती पीढ़ी रिदम की ज्यादा दीवानी हुई जा रही थी, बजाए सार्थक शब्दों के।

बप्पी बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। उन्होंने जीवन में संगीत के अलावा कई क्षेत्रों में हाथ आजमाया। बप्पी दा ने एक्टिंग में भी हाथ आजमाए। उन्होंने किशोर कुमार की एक कॉमेडी फिल्म ‘बढ़ती का नाम दाढ़ी’ में एक छोटा रोल भी किया था। किशोर कुमार रिश्ते में बप्पी के मामा लगते थे। ये फिल्म 1974 में आई थी।

सिने जगत में मांग कम होने के बाद बप्पी राजनीति में आए और भारतीय जनता पार्टी से जुड़े। 2014 के लोकसभा चुनाव में पार्टी ने उन्हें श्रीरामपुर से टिकट भी दिया, लेकिन बप्पी टीएमसी प्रत्याशी कल्याण बनर्जी से हार गए। बप्पी लहरी को आज की पीढ़ी उनके संगीत के अलावा उनके अनोखे लुक के कारण ज्यादा जानती है। स्थूल काया के बप्पी शरीर पर किलो भर सोना पहनते थे।

कहते हैं, उनकी इस दीवानगी पर प्रसिद्ध अभिनेत्री बिपाशा बसु ने कहा कि वो बप्पी दा की ये ज्वेलरी चुराना चाहती हैं। इसके जवाब में बप्पी दा ने हंसकर कहा था कि वो ऐसे मांगे तो दे दूंगा। चोरी करना अच्छी बात नहीं है।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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