एक अतीत और एक किस्सा: लिखने के खतरे व्हाया सलमान रुश्दी और हमारी आजादी का अमृत महोत्सव
19 जून 1947 को बंबई में जन्में सर अहमद सलमान रुश्दी स्वयं को ‘मिडनाइटस चिल्ड्रन’ में गिनते हैं। इस विश्वविख्यात रचनाकार के दूसरे उपन्यास का नाम है, ‘मिडनाइट्स चिल्ड्रेन’ अपने स्पष्ट गद्य के लिए प्रशंसित सलमान रुश्दी इसके पहले भी परेशानी में पड़ चुके हैं। उनका काम मुख्य रूप से पूर्वी तथा पश्चिमी सभ्यताओं के अवरोधों तथा प्रवासन को एड्रेस करता है, साथ ही वे प्रवासी की तरह भारत पर पैनी नजर रखते हैं।
19 जून 1947 को बंबई में जन्में सर अहमद सलमान रुश्दी स्वयं को ‘मिडनाइटस चिल्ड्रन’ में गिनते हैं। इस विश्वविख्यात रचनाकार के दूसरे उपन्यास का नाम है, ‘मिडनाइट्स चिल्ड्रेन’ अपने स्पष्ट गद्य के लिए प्रशंसित सलमान रुश्दी इसके पहले भी परेशानी में पड़ चुके हैं। उनका काम मुख्य रूप से पूर्वी तथा पश्चिमी सभ्यताओं के अवरोधों तथा प्रवासन को एड्रेस करता है, साथ ही वे प्रवासी की तरह भारत पर पैनी नजर रखते हैं।
विस्तार
19 जून 1947 को बंबई में जन्में सर अहमद सलमान रुश्दी स्वयं को ‘मिडनाइटस चिल्ड्रन’ में गिनते हैं। इस विश्वविख्यात रचनाकार के दूसरे उपन्यास का नाम है, ‘मिडनाइट्स चिल्ड्रेन’ जिसमें वे 1915 से लेकर 1977 तक के भारत को चित्रित करते हैं।
पूरी असल कहानी 1947-1977 के बीच चलती है। इस तरह यह ऐतिहासिक उपन्यास भारत की स्वतंत्रता और उसके तीन दशक के इतिहास, उसकी प्रमुख घटनाओं, उसके प्रमुख व्यक्तियों को समेटता चलता है। दरअसल, इस घोषित आत्मकथात्मक मैजिकल रियलिज्म उपन्यास ने रुश्दी को उत्तरोपनैवेशिक साहित्य का एक प्रमुख उपन्यासकार बना दिया और उन्हें 1981 में बुकर पुरस्कार दिला दिया। कुछ साल बाद 1993 में इसी के लिए उन्हें बुकर ऑफ़ बुकर्स से भी नवाज गया। और फ़िर 2008 में बेस्ट ऑफ़ बुकर भी उन्हें मिला। ब्रिटेन ने उन्हें ‘सर’ की उपाधि दी है। अभी वे अमेरिकन नागरिक हैं।
आजादी का अमृत महोत्सव मना रहे हैं, सलमान रुश्दी भी 75 साल
हम आजादी का अमृत महोत्सव मना रहे हैं, सलमान रुश्दी भी 75 साल के हुए हैं। साहित्यिक दुनिया उन्हें नोबेल पाने और उसका समारोह मनाने की प्रतीक्षा कर रही थी पर आज वे कट्टरपंथ के हाथ घायल हो वेंटिलेटर पर हैं।
सलमान रुश्दी की झोली में उपरोक्त उपन्यास के अलावा ‘शालीमार द क्लाउन’, ‘शेम’, ‘द ग्राउंड बिनीथ हर फ़ीट’, ‘फ़्यूरी’, ‘गोल्डेन हाउस’, ‘द मूर्स लास्ट साई’, ‘द सैटनिक वर्सेस’ भी हैं, अपने बेटे केलिए ‘हारुन एंड द सी ऑफ़ स्टोरीज’ लिखा, साथ ही गद्य के अन्य तमाम नमूने भी हैं।
व्यंजनापूर्ण कार्य द्वारा वे विचारपूर्ण हास्य गद्य में अपनी बात कहने वाले इस लेखक का चौथा उपन्यास ‘द सैटनिक वर्सेस’ 1988 में ब्रिटेन में और 1989 में अमेरिका में प्रकाशित हुआ और इसके प्रकाशित होते ही साहित्यिक और राजनैतिक इलाकों में भूचाल आ गया। एक धार्मिक नेता ने उनका सिर काटकर लाने पर ईनाम घोषित कर दिया।
जाहिर है लिखने के अपने जोखिम और खतरे होते हैं, तो रुश्दी को भूमिगत होना पड़ा। राज्य से सुरक्षा लेनी पड़ी। रहने के ठिकाने बदलने पड़े। मुझे शक है फ़तवा देने वाले और उसे कारगर करने के लिए जोश वालों ने उपन्यास पढ़ा है। हालांकि रुश्दी ने मुसलमानों से माफ़ी मांग ली इसके बावजूद उन्हें छिपकर रहना पड़ रहा था।
कहा जा रहा है कल का हमला उसी फ़तवे का एक्टेन्शन है। फ़तवा देने वाला नहीं रहा मगर हम जो बोलते हैं वह रह जाता है। बहुत सोच-समझ कर बोलना चाहिए।
सलमान रुश्दी की नजर और दुनिया
अपने स्पष्ट गद्य के लिए प्रशंसित सलमान रुश्दी इसके पहले भी परेशानी में पड़ चुके हैं। उनका काम मुख्य रूप से पूर्वी तथा पश्चिमी सभ्यताओं के अवरोधों तथा प्रवासन को एड्रेस करता है, साथ ही वे प्रवासी की तरह भारत पर पैनी नजर रखते हैं।
दरअसल उनका दूसरा उपन्यास ब्रिटिश उपनिवेशवाद से स्वतंत्रता और स्वतंत्रता के कुछ दशक बाद तक को दिखाता है। यह कहानी उन्होंने कई पात्रों के द्वारा कही है मुख्य पात्र सलीम सिनाई उसी समय पैदा होता है जब नेहरू भारत की स्वतंत्रता की घोषणा कर रहे थे।
यह उपन्यास अचार फ़ैक्टरी में काम करने वाले सलीम की तीन पीढ़ियों के जीवन और अनुभवों को समेटा हुआ श्रीनगर, अमृतसर, आगरा, बंबई, कराची में पाठकों को ले जाता है। इस सबके बीच देश की तमाम वास्तविक घटनाओं यथा भारत छोड़ो, कैबिनेट मिशन, मुस्लिम लीग, दंगों, जलियांवाला बाग, माउंटबेटन, पाकिस्तान युद्ध, बांग्लादेश मुक्ति आदि को समेटता है। भारत के उत्थान-पतन की कहानी कहता है। यहाँ फ़िल्म हैं, मिथक हैं, राजनीति और धर्म हैं, दोस्ती और दुश्मनी हैं।
उपन्यास भारत विभाजन, प्रवासियों का संघर्ष-कठिनाइयां उनकी अस्मिता, नए देश में उनके विचित्र अनुभव और नए संबंध, परिवार, समुदाय, देश सब पर अंगुली धरता है। इसके पहले संस्करण में ‘विधवा’ शब्द मुख्य रूप से रेखांकित किया गया था जिस पर इंदिरा गांधी ने ब्रिटेन के कोर्ट में मुकदमा किया वे जीत गई और प्रकाशक को अगले संस्करण में यह शब्द हटाते हुए कुछ सुधार किया। अब तो इस उपन्यास पार फ़िल्म बन चुकी है जो मुझे बहुत अच्छी नहीं लगी। जिस पर फ़िर कभी।
रुश्दी पर किताबें और उनकी जिंदगी
रुश्दी पर किताबें लिखी गई हैं, लिखी जाएंगी। इंग्लिश भाषा पर रुश्दी का अधिकार तथा यथार्थ और कल्पना का अद्भुत मिश्रण चकित करने वाला उनका ‘दि एंचान्ट्रेस ऑफ़ फ़्लोरेंस’ अपने नाम के अनुरूप पाठक को अपनी माया में घेरता है। यहां रुश्दी अकबर, अधम खान, बाबर, मेकियावेली, ओटोमन साम्राज्य के सुल्तान महमद, बायजिद, सलीम जैसे ऐतिहासिक चरित्रों के साथ-साथ कारा कोज़ या काली आंखों वाली लेडी का काल्पनिक चरित्र गढ़ते हैं।
इस मैजिक रियलिज्म की कहानी फ़तेहपुर सीकरी में अकबर के दरबार में प्रारंभ होती है। सात भाषाओं में स्वप्न देखने वाला एक युवा यूरोपियन यात्री दरबार में पहुंचता है और अकबर को अपना रिश्तेदार बताता है। कहानी सुनाते हुए दावा करता है कि वह इंग्लैंड की महारानी का राजदूत और बाबर की सबसे छोटी बहन का बेटा है। यह शहजादी कारा कोज़, ‘लेडी ब्लैक आईज’ न केवल गजब की सुंदरी है वरन उसके पास मायावी शक्ति है। अपनी जान बचाने के लिए इस जादूगरनी को बाबर ने एक उज़बेक को दे दिया। वहां से वह फ़ारस के शाह के पास पहुंची और अंतत: ओटोमन सुल्तान की सेना के कमांडर अर्गालिआ की प्रेमिका बनी।
कारा कोज़ पुरुषों की दुनिया में अपना भाग्य लिखने की चेष्टा कर रही है। कारा का चरित्र पुरुष की आंख से रचा गया है, उसकी सत्ता बहुत सीमित है, मात्र बिस्तर तक, यह राजसी बिस्तर हो भी हो सकता है। मंत्रमुग्ध करने वाले इस उपन्यास में रुश्दी फ़तेहपुर और फ़्लोरेंस दोनों शहरों को सजीव करते हैं।
पाठक सम्राट अकबर की राजधानी वैभवशाली सीकरी, अकबर के शयनकक्ष की झाँकी पाता है। अकबर धर्म, विश्वास-आस्था, लालसा के प्रश्नों से जूझ रहा है, बेटों के षडयंत्र, पत्नी और एक मानसिक पत्नी-प्रेमिका का सामना उसे करना है। पूरा फ़्लोरेंस इस बला की खूबसूरत स्त्री के इंद्रजाल में पड़ता है। वह सुंदरता ही क्या जो मुसीबत न खड़ी करे? इस उपन्यास में भी कारा कोज़ तमाम समस्याओं की जड़ बनती है।
‘दि एंचान्ट्रेस ऑफ़ फ़्लोरेंस’ के कारण नहीं पर अन्य कई कारण से कई बार सलमान रुश्दी मुसीबत में पड़े हैं। इस बार उनके लिए यह जीवन-मरण का प्रश्न बन गया है। कल वे न्यूयॉर्क के एक सुदूर इलाके में ‘अमेरिका: निर्वासित लेखकों की शरणस्थली तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सुरक्षित घर’। पर अमेरिका भी सुरक्षित नहीं है। वहां भी टॉवर गिरते हैं और अब साहित्य के एक टावर पर निंदनीय हमला हुआ है। वे जल्द स्वस्थ हों यही कामना है।
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