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दूसरा पहलू: लखनऊ नहीं, यह हरियाणा की भूल भुलैया है, हर दरवाजा एक जैसा धोखा देता है

Mon, 26 Oct 2026 08:51 AM IST
Navin Singh Patel नवीन सिंह पटेल
Updated Mon, 26 Oct 2026 08:51 AM IST
सार

लखनऊ में स्थित भूल भुलैया से करीब चार सौ साल पहले बना हरियाणा का चोर गुंबद वास्तुकला की ऐसी पहेली है, जहां हर दरवाजा एक जैसा धोखा देता है। एक जैसे दिखने वाले 20 दरवाजों और दीवारों के बीच बने संकरे रास्तों का फायदा उठाकर अपराधी भाग निकलते थे। तभी, इसे ‘चोर गुंबद’ भी कहा गया।

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Another perspective not Lucknow labyrinth aka bhul bhulaiya in Haryana 400 yr old afghan architecture story
हरियाणा में भूल भुलैया - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स-एआई

विस्तार

अवध में भीषण अकाल के बाद नवाब आसफुद्दौला के लखनऊ में बनवाए भूल भुलैया (1794) से तो बहुतेरे वाकिफ हैं, लेकिन इससे करीब 400 साल पुराने हरियाणा की भूल भुलैया से शायद ही लोग परिचित हों। दिल्ली सल्तनत के सुल्तान फिरोज शाह तुगलक के शासनकाल (1351-1388 ईस्वी) में अफगान रईस और व्यापारी जमाल खान ने इसे महेंद्रगढ़ जिले में नारनौल की सुनसान पहाड़ी पर अपने मकबरे के रूप में बनवाया था।

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लंबे समय तक वीरान रही यह इमारत डाकुओं, ठगों और चोरों के छिपने का अड्डा बनी रही। उन्हें पकड़ने आने वाले लोग भी यहां की भूल भुलैया में उलझकर रह जाते थे। एक जैसे दिखने वाले 20 दरवाजों और दीवारों के बीच बने संकरे रास्तों का फायदा उठाकर अपराधी किसी भी दरवाजे से निकल भागते थे। तभी, लोककथाओं में इसे ‘चोर गुंबद’ या व्यंग्य रूप में ‘साहूकार गुंबद’ भी कहा गया।
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इतिहासकार प्रो. आर नाथ ने अपनी पुस्तक हिस्ट्री ऑफ मुगल आर्किटेक्चर में इसे तुगलक कालीन और प्रारंभिक क्षेत्रीय अफगान स्थापत्य का बेजोड़ उदाहरण बताया है। यह एक मंजिला इमारत बाहर से दो मंजिला प्रतीत होती है। इसकी चारों दीवारों में पांच-पांच मेहराबदार रास्ते हैं। इनसे 20 दरवाजे बनते हैं। सभी दरवाजे आकार, ऊंचाई और रूप-रंग में एक जैसे हैं।
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लगातार मोड़ के कारण जब कोई इस गलियारे में घूमता है, तो उसे दिशाभ्रम हो जाता है। स्थानीय लोग इसे ही ‘भूल भुलैया’ कहते हैं। कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के प्रोफेसर रहे केसी यादव ने अपनी पुस्तक हरियाणाः इतिहास एवं संस्कृति में लिखा है कि चोर गुंबद को स्थानीय कारीगरों ने अरावली की पहाड़ियों के धुंधले भूरे या ग्रे रंग के पत्थरों से बनाया है।

चोर गुंबद की बाहरी दीवारें नीचे से चौड़ी हैं और ऊपर जाते हुए थोड़ी अंदर की तरफ झुकती हैं। यह झुकाव इमारत को भूकंपीय झटकों से बचाता है। महेंद्रगढ़ जिला गजेटियर में निर्माण की बारीकियों के आधार पर चोर गुंबद को पड़ोस में स्थित 1357 ईस्वी में निर्मित मदरसे के पुराने हिस्सों के समकालीन बताया गया है।


प्रो. नाथ लिखते हैं, फिरोज शाह तुगलक के काल में वफादारी और रसूख को दिखाने का सबसे बड़ा जरिया भव्य इमारतों का निर्माण था। जमाल खान ने भी रईसी और ताकत की नुमाइश की थी। ऊंची पहाड़ी पर तामीर यह इमारत मरुस्थलीय व्यापारियों को मीलों दूर से दिख जाती थी। यह तब ‘नारनौल का साइनबोर्ड’ भी थी।

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