अन्नू कपूर का ब्लॉगः खुद को स्टार मानने का नजरिया ही गलत है
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हिंदी सिनेमा को किसने कब और क्यों बॉलीवुड का नाम दिया इस पर तो लंबी बहस हो सकती है और इस पर मैं चर्चाएं भी करता रहता हूं लेकिन अपनी दिल की डायरी से जो मैं पन्ना आज आपके सामने पढ़ना चाहता हूं वह है सिनेमा में भारतीय भाषाओं के अलावा भारतीय बोलियों के सम्मिश्रण का।
हमारी बोलियां बहुत मीठी हैं, उनमें हरदम ताजगी बनी रहती है। हिंदुस्तान की तमाम बोलियां मैंने अपने किरदारों के जरिए बोली हैं और निजी जीवन में भी नई नई भाषाएं सीखना मेरा प्रिय शगल रहा है। ब्रज की बोली की मिठास की ही मिसाल ले लीजिए, हिंदी सिनेमा में हिंदी पट्टी की बोलियों में अवधी, भोजपुरी, मैथिली आदि बोलते किरदार हमने खूब देखे लेकिन मथुरा की ब्रज भाषा की बात ही अलग है। इस भाषा के प्रयोग के साथ एक बेहद विनोदप्रिय फिल्म बनाने की प्रयास मेरे निर्देशक राज शांडिल्य ने फिल्म ड्रीमगर्ल में किया और ये एक बड़ी बात है।
भारतीय भाषाएं और हिंदी सिनेमा
मैं जब भारतीय भाषाओं की बात करता हूं तो देखता हूं कि हिंदी मनोरंजन जगत में गिनती के ऐसे फिल्म निर्माता हैं जो दर्शकों की नब्ज पहचानते हैं। मनोरंजन एक उद्योग है और जाहिर है कि हर उद्योग में कामयाबी का पैमाना निवेश पर होने वाली कमाई ही है। इस मायने में मैं निर्माताओं शोभा कपूर और एकता कपूर की दाद देता हूं कि वह भारतीय दर्शक की बदलती रुचि का सही ध्यान रखती हैं और सही घोड़े पर दांव लगाने की कला भी उन्हें खूब आती है।
जब मैं बदलती पसंद की बात करता हूं तो देखता हूं कि हाल के दिनों में जो सिनेमा लोगों को खूब भा रहा है, उसका हीरो एक आम लड़का है। एक ऐसा लड़का जो अपने आसपास के परिवेश के अंदर ही कुछ अलग करके हीरो बन जा रहा है। हीरो बनने के लिए वह किसी बड़े विलेन से भिड़ रहा हो ये अब जरूरी नहीं रहा। जरूरी ये हो गया है कि उसका किरदार वैसे ही सांसें लेता है कि नहीं, जैसे उसकी फिल्मों का दर्शक ले रहा है।
राजनीति की बातें करने का माहौल इन दिनों देश में भले न हो क्योंकि आलोचना और विरोध का अंतर मिटता जा रहा है। लेकिन, फिर भी मैं ये कह सकता हूं कि इन दिनों जो कुछ भी सिनेमा के बदलते परिवेश के बारे में लिखा जा रहा है या जिस कंटेंट ड्रिवेन सिनेमा को लेकर बहसें और सेमिनार हो रहे हैं, उनकी शुरुआत आर्थिक उदारीकरण से होती है।
बदल रहा है हिंदी सिनेमा
सिनेमा के विषय और इसे बनाने में आए बदलाव में सबसे बड़ा योगदान आर्थिक उदारीकरण का है। भारत के दर्शकों को जब से टेलीविजन, सैटेलाइट मनोरंजन चैनल और इंटरनेट सुलभ हुआ उनकी सोच बदली। सही मायने में पूरी दुनिया एक गांव बन गई। मैं अपनी बात करूं तो मेरा भी मन होता है कि उड़ीसा में जो छऊ नृत्य होता है उसे अपने मोबाइल पर अपनी सुविधा और अपनी पसंद के समय के हिसाब से जहां चाहूं वहां देख सकूं। तो ये कैसे मुमकिन हुआ?
मेरी राय में हिंदी सिनेमा के लिए ये बहुत अच्छा समय है। लोग भारतीय परिवेश की बेहतरीन फिल्में बना रहे हैं। ऐसी फिल्में बॉक्स ऑफिस पर चल रही हैं तो नए-नए हीरो भी आ रहे हैं। कामयाब हो रहे हैं। लेकिन, इन नए कलाकारों को कभी ये नहीं भूलना चाहिए कि अगर वे सितारे बन पा रहे हैं तो उन्हें लोकप्रिय बनाने में उनके निर्माताओं, निर्देशकों और लेखकों का बहुत बड़ा हाथ है।
अगर ये नए कलाकार खुद को सुपरस्टार समझने लगे तो गड़बड़ शुरू हो जाएगी क्योंकि अपने बल बूते किसी फिल्म को चला लेने वाला जमाना अलग था। राजेश खन्ना ने अकेले अपने बूते लगातार 15 फिल्में हिट दीं तो ये उनका करिश्मा था। करिश्मा उस जमाने में और भी लोगों ने किया।
जैसे बिना हीरो हीरोइन के साइन हुए अगर पता चले कि फिल्म में संगीत शंकर जयकिशन का है तो फिल्म बिक जाती थी। कभी-कभी तो ऐसा भी हुआ कि निर्माता ने फिल्म की योजना बनाई और सिर्फ महमूद या जॉनी वाकर को साइन कर लिया तो उनके नाम से भी फिल्में बिक जाया करती थीं।
मेरा कहना ये है कि अगर किसी अभिनेता के लिए किसी लेखक और निर्देशक ने कोई किरदार लिखा अच्छा है, गढ़ा अच्छा है तो वह हिट होगा ही। इसमें अभिनेता को बहुत ज्यादा क्रेडिट लेना नहीं चाहिए। और अगर कहानी मौलिक होगी, उसके किरदार असली होंगे तो उन्हें हिट होने से कोई रोक नहीं सकता।
फिल्म विकी डोनर में अभिनय के लिए मिले राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार के बारे में जब भी बातें होती हैं तो मैं हमेशा इसका श्रेय फिल्म के निर्देशक शूजीत सरकार और उनकी लेखक जूही चतुर्वेदी को देता हूं। इस किरदार में कोई भी कलाकार अगर ढंग का काम करे तो वह हिट होना ही है।
मैं बहुत बड़ा स्टार हूं, इस नजरिए को ही मैं गलत मानता हूं क्योंकि अगर स्टार के होने से ही फिल्म चलती तो किसी भी बड़े स्टार की कोई फिल्म फ्लॉप नहीं होनी चाहिए।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।