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बाइडन ने दिए बदलाव के संकेत, पर आसान नहीं है ट्रंप के फैसलों को पूरी तरह पलट पाना

Fri, 22 Jan 2021 07:54 PM IST
Atul sinha अतुल सिन्हा
Updated Fri, 22 Jan 2021 07:54 PM IST
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अमेरिका के नए राष्ट्रपति जो बाइडन - फोटो : PTI

पिछले कुछ महीनों की राजनीतिक उथल- पुथल, हिंसा और ट्रंप समर्थकों के रवैये ने पूरी दुनिया की निगाहों को अपनी तरफ खींचा, लेकिन जो बाइडन के शपथ लेने के बाद से अब एक नए अमेरिका के संकेत मिलने लगे हैं। खासकर बाइडन के पहले भाषण और कुछ अहम शुरुआती फैसलों ने ये साफ कर दिया है कि अब वहां बहुत कुछ बदलने वाला है। खासकर विदेश नीति में। भारत के साथ मौजूदा रिश्तों में और चीन को लेकर अमेरिकी रवैये में भी खासा बदलाव हो सकता है।  

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शपथ लेने के बाद अगर बाइडन के पहले भाषण पर गौर करें तो साफ है कि उनका नजरिया सिर्फ अमेरिकियों के प्रति ही नहीं, उन तमाम मुल्कों की तरफ भी बेहद सौहार्दपूर्ण है जो किसी न किसी रूप में अमेरिका को उम्मीद की नजर से देखते आए हैं। खासकर मुसलिम बहुल देशों के प्रति जो रवैया ट्रंप ने अपनाया था, उसे बाइडन ने मिनटों में बदल दिया और इन देशों से आवाजाही पर लगी रोक तत्काल हटा दी। ट्रंप के तमाम फैसलों को तत्काल बदलते हुए बाइडन ने अंतर्राष्ट्रीय पेरिस जलवायु समझौते में अमेरिका को दोबारा शामिल कर लिया।

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एक अहम कदम उठाते हुए उन्होंने अमेरिका के दोबारा विश्व स्वास्थ्य संगठन से हटने की प्रक्रिया को भी रोक दिया है। ट्रंप के इस कदम से दुनियाभर में संगठन की साख पर सवाल उठने लगे थे, जिसे बाइडन ने फिर से बरकरार रखने की कोशिश की है। जाहिर है इस कदम से चीन के प्रति भी उनके सकारात्मक रवैये का संकेत मिला है जो खासकर कोरोना काल के दौरान बेहद तल्ख हो गए थे।

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एक जो खास बात बाइडन ने कही वह भावनात्मक रूप से सबको साथ जोड़ने वाली रही है और एक बार फिर ओबामा की नीतियों को याद दिलाने वाली रही है। बाइडन ने कहा - " देश में हर व्यक्ति की आवाज सुनी जाएगी। अमेरिका विभाजनकारी, धार्मिक भेदभाव, नस्लवाद जैसी भावनाओं को खारिज कर अपना एकजुट चेहरा पेश करेगा। धर्म, जाति, नस्ल, रंग की पहचान को अलग रखकर मैं हर अमेरिकी नागरिक का राष्ट्रपति बनूंगा।"

 

यह बड़ी बात इसलिए है क्योंकि ट्रंप के शासन में जिस तरह नस्लवाद फिर से उभर आया, नस्ली हिंसा और अश्वेतों के प्रति नफरत का इजहार हुआ, कई अमानवीय घटनाएं हुईं, उससे अमेरिका का सिर शर्म से झुक गया। ऐसे में बाइडन की यह प्रतिबद्धता अमेरिकियों में भरोसा पैदा करने वाली है।

 

बाइडन के उस आदेश को बी बेहद अहम माना जा रहा है जिसके तहत उन्होंने संघीय दफ्तरों में कर्मचारियों के लिए शारीरिक दूरी और मास्क लगाना अनिवार्य कर दिया है। कोरोना की वजह से जो लोग गंभीर आर्थिक संकट झेल रहे हैं, उनके लिए बाइडन ने आर्थिक मदद का ऐलान भी किया। कोरोना से निपटने के लिए उन्होंने एक नया संघीय समन्वय कार्यालय भी बनाया है और वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा और रक्षा के लिए व्हाइट हाउस के राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद निदेशालय को फिर से बहाल कर दिया है। ट्रंप ने अपने कार्यकाल में इसे बंद कर दिया था।

 

अगर भारत के संदर्भ में देखें तो ट्रंप की सख्त वीजा नीति ने भारतीय आईटी उद्योग को तगड़ा झटका दे रखा है लेकिन अब बदले माहौल में भारतीय उद्योग जगत अमेरिका से नरम रुख के साथ कारोबारी संबंधों में नई गर्मजोशी की उम्मीद कर रहा है। माना जा रहा है कि बाइडन एच1 वीजा नीति में बदलाव करते हुए नरमी बरतेंगे जिसे ट्रंप ने बेहद सख्त बना दिया है।

 

दरअसल बाइडन से ज्यादा उम्मीद इसलिए भी की जा रही है क्योंकि वो ओबामा के कार्यकाल में उप राष्ट्रपति रहे थे और उस दौरान भारत-अमेरिका के बीच कई अहम समझौतों में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही थी। खासकर ट्रांस पेसिफिक पार्टनरशिप (टीपीपी) पहल को आगे बढ़ाने में बाइडन की अहम भूमिका थी। जाहिर है उस दौरान लिए गए फैसलों और समझौतों को वो फिर से आगे बढ़ाने की कोशिश जरूर करेंगे।

भारत अमेरिका के लिए दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा आयातक रहा है...

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बाइडन ने अपनी विदेश नीति संबंधी टीम के लिए जो नियुक्तियां की हैं उससे ये संकेत मिल गया है कि अब अमेरिका की क्या प्राथमिकताएं रहेंगी - फोटो : PTI

भारत अमेरिका के लिए दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा आयातक रहा है। अगर 2019-20 के कारोबार आंकड़ों पर नजर डालें तो भारत और अमेरिका के बीच 88.92 अरब डॉलर का द्विपक्षीय कारोबार हुआ और इस अवधि के दौरान भारत अमेरिका के लिए सबसे बड़ा निर्यात क्षेत्र बनकर उभरा और भारतीय निर्यात में अमेरिका का 17 फीसदी योगदान रहा। यहां तक कि कोरोना काल के सबसे खतरनाक तीन महीनों (अप्रैल-सितंबर 2020) में भारत में एफडीआई के मामले में अमेरिका दूसरे नंबर पर रहा है। जाहिर है बाइडन के लिए ये तथ्य खासे महत्वपूर्ण हैं।

 

बाइडन ने अपनी विदेश नीति संबंधी टीम के लिए जो नियुक्तियां की हैं उससे ये संकेत मिल गया है कि अब अमेरिका की क्या प्राथमिकताएं रहेंगी। अमेरिका में हर सरकारी पद पर हुई नियुक्ति पर सीनेट की मुहर लगनी जरूरी होती है। इस प्रक्रिया से पहले नियुक्त अधिकारी से सीनेटर पूछताछ करते हैं।

 

  • ट्रंप की किन नीतियों और फैसलों को जारी रख सकते हैं बाइडन

विदेश मंत्री के रूप में नियुक्त टोनी ब्लिंकेन के सीनेट में दिए गए भाषण के आधार पर विश्लेषकों का कहना है कि शुरुआती संकेत से ये तो जरूर पता चलता है कि बाइडन विदेश नीति में कुछ बदलाव करेंगे, लेकिन मोटे तौर पर वे डॉनल्ड ट्रंप के दौर में अपनाई गई नीति पर ही आगे बढ़ेंगे। खासकर चीन और चीन के शिनजियांग प्रांत में उइघुर मुसलमानों के कथित दमन के मामले में बाइडन प्रशासन मौजूदा सख्त नीति का पालन करता रहेगा।

 

टोनी ब्लिंकेन ने सीनेट में कहा कि बाइडन प्रशासन यरुशलम को इजराइल की राजधानी के रूप में मान्यता देने के ट्रंप प्रशासन के फैसले को जारी रखेगा। उसी तरह वह वेनेजुएला में दक्षिणपंथी नेता हुआन गुआइदो को वहां के अंतरिम राष्ट्रपति के रूप में अमेरिकी मान्यता को भी जारी रखेगा। बाइडन प्रशासन उक्रेन को हथियार देने के फैसले को भी जारी रखेगा। साथ ही वह रूस और जर्मनी के बीच नॉर्ड स्ट्रीम-2 गैस पाइपलाइन के लिए हुए करार का विरोध करता रहेगा।

 

ब्लिंकेन सीनेट में सुनवाई के दौरान ज्यादातर समय इसी बात पर जोर देते रहे कि बाइडन प्रशासन विदेश नीति में जल्दबाजी में कोई परिवर्तन नहीं करेगा। लेकिन कुछ मामलों में इसमें ठोस बदलाव लाए जाएंगे। मसलन, यमन में सऊदी अरब की बमबारी को अब अमेरिका समर्थन नहीं देगा। यमन के हाउथी बागियों को आतंकवादी समूह मानने के ट्रंप प्रशासन के फैसले की अब समीक्षा की जाएगी।

 

जाहिर है, एक बार फिर बराक ओबामा के वक्त का अमेरिका आकार लेने की कोशिश करेगा, लेकिन पिछले चार सालों में ट्रंप ने पूरी व्यवस्था को अपने तरीके से कुछ इस तरह चलाया है कि अंदरूनी तौर पर उसे ठीक करना और डेमोक्रेट्स की नीतियों को जल्दी लागू कर पाना बाइडन के लिए एक कड़ी चुनौती तो है ही।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
 

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