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यादों में अमीन सयानी : वे अपनी आवाज समेटकर जा चुके हैं, लेकिन उसकी गूंज सदा रहेगी

Thu, 22 Feb 2024 12:16 PM IST
Dr. Vijay Sharma डॉ. विजय शर्मा
Updated Thu, 22 Feb 2024 12:16 PM IST
सार

41 साल श्रोताओं के दिल पर राज करने वाले अमीन साहेब बाद में भी सक्रिय रहे। उन्होंने न केवल बिनाका-सिबाका गीतमाला कार्यक्रम चलाया बल्कि एक कुमार का फ़िल्मी मुकदमा, गीतमाला की छांह में (फ़िल्म संगीत के संपादित संग्रह) जैसे कार्यक्रम चलाए। उनके सिग्नेचर स्वर की नकल संभव नहीं है। कोशिश भी नहीं करनी चाहिए।

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Ameen Sayani legacy of music and memories know the life
अमीन सयानी ने रेडियो की जनोन्मुखी, संवादात्मक और सहज सम्प्रेषणीय भाषा भी रची - फोटो : Twitter@ajaydevgn

विस्तार

बचपन में हमारे घर में का रेडिओ दूर-दुनिया तक पहुंच का हमारा साधन था। न केवल हमारा बल्कि भारत के अधिकांश लोगों का। रेडियो की आवाज दूर-दूर तक जाती थी और रेडियो की तरंगों पर सवार होकर इसी के जरिए अमीन सयानी की आवाज का जादू लोगों तक पहुंचता था और लोगों के सिर चढ़कर बोलता था। बोलता नहीं गुनगुनाता था। कौन था जो इस मखमली आवाज का दीवाना न था।

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ओह! बुद्धवार का, बिनाका गीतमाला का, कितनी बेसब्री से इंतजार किया जाता, कौन-सा गीत पहले पायदान पर होगा इसे लेकर शर्त बदी जाती और आठ बजते सबकी सांसें थम जातीं और तभी रेडियो से स्वर लहरी आती, ‘बहनों और भाइयों!मैं हूं, आपका दोस्त अमीन सयानी!’ एक घंटा कैसे निकल जाता पता नहीं चलता।
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एक घंटे में हफ्ते के दस लोकप्रिय फिल्मी गाने सुनना। एक-एक कर पायदान चढ़ते गीत और सरताज गीत। मगर केवल गाने ही नहीं सुनाते थे अमीन साहेब, वे इन्हें चासनी में लपेट कर प्रस्तुत करते थे। उफ़! क्या दिन थे। यह मात्र गीत-संगीत का कार्यक्रम न था वरन एक संस्कृति का हिस्सा था, पूरे देश को जोड़ने का बायस था।

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Ameen Sayani legacy of music and memories know the life
करीब 54,000 रिडियो प्रोग्राम अमीन साहेब ने चलाए और 19,000 जिंगल भी उनके खाते में हैं। - फोटो : Social Media

21 दिसम्बर 1932 को बंबई में कुल्सुम सयानी और डॉक्टर जान मोहम्मद सयानी के घर अमीन का जन्म हुआ था। कुल्सुम और जान मोहम्मद स्वतंत्रता आंदोलनकारी तथा सामाजिक कार्यकर्ता थे। मांं लिखती थीं, पिता गरीबों का मुफ़्त इलाज करते थे। इसी अमीन सयानी ने 91 की उम्र में जाने की तारीख वही चुनी, जिस तारीख को वे इस दुनिया में आए थे, मतलब 21 फ़रवरी 2024।

करोड़ों लोगों के दिल की धड़कन बने, दिल की धड़कन रुकने से चल बसे। हालांकि वे पिछले 12 साल से पीठ दर्द से परेशान थे। जाने का दिन भी वही बुधवार रहा, जिस दिन करोड़ों लोग रेडियो से कान लगाए रहते थे।


अमीन सयानी का संसार और उनकी आवाज 

रेडियो सिलोन और अमीन सायनी एक-दूसरे के पर्याय थे। 1952 से बिनाका गीतमाला से जुड़े अमीन सयानी ने सेंट जेवियर’ से पढ़ाई की और गुजराती प्रोग्राम से शुरुआत की। किशोरावस्था में ऑल इंडिया रेडियो पर इंग्लिश में प्रोग्राम करते थे। रेडियो से उनका परिचय उनके भाई हामिद सयानी ने कराया था। इंग्लिश से हिन्दी में आना सरल न रहा होगा, पर वे यहां भी सहज थे। ‘बिनाका गीतमाला’  बाद में ‘सिबाका गीतमाला’ कहलाया।

करीब 54,000 रिडियो प्रोग्राम अमीन साहेब ने चलाए और 19,000 जिंगल भी उनके खाते में हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि बिनाका गीतमाला के श्रोताओं की संख्या 21 करोड़ पहुaचने के पीछे अमीन साहेब की कार्यक्रम अदायगी की शालीन, आधिकारिक आवाज थी।उनकी सहजता और समझ सदा आकर्षित करती रही है।

यह ई-मेल, व्हाट्सअप का जमाना न था। श्रोता अपने प्रिय उद्घोषक को बड़े प्रेम से पत्र लिखा करते थे और पत्रों की संख्या का अंदाज आप लगाइए, क्योंकि वे थैलों में नहीं, बोरों में आया करते थे।

एक सूत्र के अनुसार उन पत्रों की संख्या प्रति सप्ताह 65.000 तक पहुंची थी। ऐसा करिश्मा पहले कभी नहीं हुआ था और शायद ही भविष्य में कभी हो।


41 साल श्रोताओं के दिल पर राज करने वाले अमीन साहेब बाद में भी सक्रिय रहे। उन्होंने न केवल बिनाका-सिबाका गीतमाला कार्यक्रम चलाया बल्कि एक कुमार का फ़िल्मी मुकदमा, गीतमाला की छांह में (फ़िल्म संगीत के संपादित संग्रह) जैसे कार्यक्रम चलाए। उनके सिग्नेचर स्वर की नकल संभव नहीं है। कोशिश भी नहीं करनी चाहिए।

रेडियो से वे टीवी पर आए और वहां ‘संडे सस्पेंस’, चर्चा पे चर्चा’ करते रहे। नहीं जानती हूं उनकी स्क्रिप्ट कौन तैयार करता था, मगर उनकी प्रस्तुति मनोरंजक होती थी। गाने का परिचय, कमर्शियल के बीच-बीच में संगति, कहन का लहजा सबमें मौलिकता थी। एक घंटे का यह कार्यक्रम बिनाका गीतमाला और गीतों की लोकप्रियता तय करता, श्रोताओं को बांधे रखता, बहाय लिए जाता।

श्रोता किसी और दुनिया में होता। यही कारण है, उन्हें कमर्शियल ब्रॉडकास्टिंग का सिरमौर, रेडियो का ग्रैंड ओल्डमैन, रिडियो किंग, आयकनिक अनाउंसर, मेलोडियस आवाज का मालिक आदि, आदि विशेषणों से नवाजा जाता है।

अपनी लम्बी पारी में अमीन साहेब ने फ़िल्म संगीत के बदलते परिवेश, आते-जाते फ़िल्मीं लोगों, गायकों, संगीतकारों, गीतकारों को देखा। यहां तक कि लता मंगेशकर भी उनके सामने आईं और गईं। समय के साथ काफ़ी कुछ बदला। तकनीक का बोलबाला हुआ। इसके नुकसान हैं, तो फ़ायदे भी हैं।

तकनीक के चलते गीत में वाद्ययंत्र तथा स्वर को नियंत्रित किया जाने लगा। तकनीक के चलते अमीन सयानी की गर्माहट भरी आवाज सदियों तक श्रोताओं को लुभाती रहेगी। वे मनोरंरन से आगे जाते थे। अपने कार्यक्रम में वे सामाजिक मुद्दों को बड़ी बारीकी और सरलता से पिरोते थे। वे स्त्री सशक्तिकरण, राष्ट्रीय एकता, प्रगति को चुपके से प्रोग्राम में  दर्ज कर लेते थे। सूझबूझ भरी कहानी, घटना, संगीत, हास्य को गूंथकर वे सब कुछ रोचक बना देते थे। तकनीक के चलते बाद में बिनाका गीतमाला के एल.पी रिकॉर्ड्स बने और वे भी खूब चले।


माइक के पीछे रहने वाले अमीन साहेब की आवाज तो माशा अल्लाह है। वे परदे के सामने, कुछ फ़िल्मों जैसे ‘भूत बंगला’, ‘तीन देवियां, कत्ल’, ‘बॉक्सर’ फ़िल्मों में भी नजर आते हैं। श्रोताओं ने शानदार पारी खेलने वाले अमीन सयानी को सिर-माथे पर बैठाया। लिम्का बुक्स ऑफ़ रिकॉर्ड्स ने भी उन्हें अपने यहां शामिल किया। देश ने उन्हें पद्म भूषण एवं पद्म विभूषण सम्मान से पुरस्कृत किया।

वे अपनी आवाज समेट कर जा चुके हैं, उनकी आवाज सदा रहेगी।
 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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