अलवर की निर्भया को न्याय: आखिर कब सुधरेगी सोच और कैसे बदलेगा सरकारी नजरिया?
अलवर में दिल्ली जैसे निर्भया कांड ने एकबार फिर देश को झकझोर दिया है। मूक-बधिर नाबालिग बालिका से ऐसी हैवानियत की गई कि सुनने वालों की रूह कांप उठती है। सर्द रात के घूप अंधेरे में हैवान मूक-बधिर को शहर के एक फ्लाईओवर में फेंककर चले गए।
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अलवर में दिल्ली जैसे निर्भया कांड ने एक बार फिर देश को झकझोर दिया है। मूक-बधिर नाबालिग बालिका से ऐसी हैवानियत की गई कि सुनने वालों की रूह कांप उठती है। सर्द रात के घूप अंधेरे में हैवान मूक-बधिर को शहर के एक फ्लाईओवर में फेंक कर चले गए।
पुलिस ने लहूलुहान हालत में पीड़िता को पहले अलवर और फिर जयपुर के अस्पताल पहुंचाया। 7 डॉक्टरों की टीम ने 3 घंटे ऑपरेशन करके नाबालिग की जान तो बचा ली, लेकिन जिस तरह से उसके प्राइवेट पार्ट पर नुकीली वस्तु से वार किए गए, वो पहले जैसी जिंदगी जी पाएगी, यह कहना मुश्किल है। पीड़िता के मां-बाप मजदूर हैं, न्याय की लंबी लड़ाई लड़ भी पाएंगे या नहीं, कहना मुश्किल है। लेकिन, दुष्कर्म की दिन-ब-दिन बढ़ती घटनाओं पर सरकारों के साथ सभ्य समाज को भी सोचने की जरूरत है।
याद आता है निर्भया कांड
वर्ष 2012 में जब दिल्ली की एक सर्द रात को चलती बस में निर्भया से दरिंदगी हुई थी, तब देश जाग उठा था। केंद्र सरकार ने अगले ही साल 2013 में निर्भया फंड का गठन किया था, जिसका मुख्य उद्देश्य महिलाओं के खिलाफ हिंसा को कम करने, दुष्कर्म पीड़िताओं की सहायता और पुनर्वास को सुनिश्चित करना था।
सरकार की मानें तो निर्भया फंड को रेलवे, सड़क, बेहतर बिजली व्यवस्था, अधिक सीसीटीवी कैमरों, सुरक्षित सार्वजनिक परिवहन, वाहनों में पैनिक बटन लगाने के लिए शोध में भी खर्च किया गया। वैसे, फंड बनाना अच्छी बात है, लेकिन दुःखद यह है कि केंद्रीय गृह मंत्रालय को छोड़ दें तो फंड की राशि खर्च करने में केंद्र के दूसरे मंत्रालय और राज्य सरकारें सुस्ती बरतती आ रही है।
पिछले महीने लोकसभा में महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने बताया था कि निर्भया फंड के अंतर्गत 6,212.85 करोड़ रुपए आवंटित किए गए, जिसमें 4,138.51 करोड़ विभिन्न मंत्रालयों और विभाग के जरिए जारी किए गए हैं। हालांकि, इसमें से मात्र 2,921.85 करोड़ रुपए (47%) ही इस्तेमाल में लिए गए हैं। हद तो यह है कि इस फंड से सड़क निर्माण जैसे कार्य तक करने के मामले सामने आए हैं।
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के अनुसार देश में वर्ष 2021 में दुष्कर्म के कुल 28,046 केस दर्ज किए गए। इनमें सबसे अधिक केस राजस्थान और दूसरे नंबर पर उत्तर प्रदेश में दर्ज किए गए। राजस्थान की बात करें तो जहां वर्ष 2020 में राज्य में 5310 दुष्कर्म के केस दर्ज हुए थे, वहीं वर्ष 2021 में इनकी संख्या 6337 हो गई।
अपराधों पर ठीक नहीं है सरकारों का नजरिया
हालांकि, राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत इन आंकड़ों को स्वीकारने को तैयार नहीं हैं। उन्होंने तो यहां तक कहा था कि इनमें आधी शिकायतें फर्जी हैं, क्योंकि हमारी सरकार ने वर्ष 2019 में अनिवार्य रूप से प्राथमिकी दर्ज करने की नीति लागू की थी, जिसके बाद सभी की एफआईआर दर्ज हो जाती हैं। राज्य की पुलिस भी मुख्यमंत्री के सुर में सुर मिलाती नजर आती है। वो भी दोहराती है कि 43% केस झूठे होते हैं। शायद यही कारण है कि पुलिस ने वर्ष 2021 में 2377 केसों को झूठा करार देते हुए फाइनल रिपोर्ट तक लगा दी। वैसे, सच्चाई यह भी है कि अधिकांश केसों में पीड़ित पक्ष कमजोर होता है। वो सही ढंग से लड़ाई लड़ ही नहीं पाता। अमूमन ऐसी ही कहानी देशभर में है।
जो अपराधी पकड़े भी जाते हैं, वो लंबी कानूनी लड़ाई में पीड़ित पक्ष का हौसला तोड़ देते हैं। दिल्ली की निर्भया के केस में देश ने यह देखा भी है। कैसे वकील बार-बार दलीलों से केस को लटकाते रहे और सारे सबूत होने के बावजूद 7 साल तक दोषी अपराधी फांसी के फंदे को धोखा देते रहे। हालांकि मीडिया, समाज और विपक्षी दलों के दबाव चलते इस मामले की सीबीआई जांच की मांग पर सरकार झुकती नजर आ रही है और जल्द ही सरकार जांच के लिए कह सकती है।
नाबालिग बच्चियों के खिलाफ यौन अपराधों को लेकर तो पॉक्सो एक्ट में भी एक वर्ष में ट्रायल पूरा करने का प्रावधान है, लेकिन अकेले राजस्थान में पॉक्सो कोर्ट में 7000 केस लटके हुए हैं। कुछ-कुछ जिलों में तो 7-8 सालों से केसों का ट्रायल चल रहा है। मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में भी कुछ-कुछ ऐसी ही स्थितियां हैं।
हालांकि, दुष्कर्म जैसी घटनाओं पर अंकुश लगाने की जिम्मेदारी केवल सरकार पर अकेले छोड़ना गलत होगा। आखिर समाज के भी अपने कुछ दायित्व हैं। बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है, जो दुष्कर्म जैसी घटनाओं पर मौन धारण कर लेते हैं। खुलकर कभी विरोध में नहीं आते। कुछ तो अपनी बेटियों के साथ घटी दुष्कर्म की घटनाओं को इसलिए छिपा लेते हैं, ताकि समाज में बदनामी न हो।
चुप्पी का एक और कारण संभवतः लंबी और जटिल कानूनी प्रक्रिया भी है। पिछले दिनों कई प्रदेशों में तो अपराधियों के दुष्कर्म के बाद पीड़िता या उसके परिवार को ब्लैकमेल करने और फिर नाजायज मांगें न मानने पर सोशल मीडिया पर घटना की वीडियो या फोटो वायरल करने के बाद वारदात सामने आई हैं।
वर्ष 2012 में निर्भया कांड के समय देश खड़ा हो गया था, तब सरकार को झुकना पड़ा था। जरूरत आवाज बुलंद करते रहने की है। यदि सभी मिलकर ऊंची आवाज करेंगे तो सरकार भी जागेगी और अपराधियों के हौसले भी पस्त होंगे।
एक और बात। दशकों से स्कूली पाठ्यक्रम में यौन शिक्षा को लेकर देश में बहस जारी है। जब घटनाएं होती हैं, तब सभी पार्टियां मिलकर हल्ला मचाती हैं, लेकिन जब मुद्दा पॉलिसी बनाने का आता है तो विरोध के सुर उठने लगते हैं। न केवल राजनीतिक पार्टियां, बल्कि धार्मिक संगठन अड़ जाते हैं। वर्ष 2007 में केंद्र सरकार ने किशोर शिक्षा कार्यक्रम की शुरुआत की थी, लेकिन कुछ राज्य सरकारों ने इसे प्रतिबंधित कर दिया।
यौन शिक्षा समय की मांग है, यह इसलिए भी आवश्यक है, क्योंकि जब बच्चे किशोरावस्था में प्रवेश करते हैं तो रिश्तों और सेक्स के विषय में उन्हें बेहद भ्रमित और आधी-अधूरी जानकारी होती है। इनदिनों तो ओटीटी प्लेटफॉर्म, सोशल मीडिया, इंटरनेट भी युवाओं में सेक्स को लेकर खूब भ्रम फैला रहा है।
यौन शिक्षा निश्चित ही उस टूल की तरह काम कर सकती है, जो यौन अपराधों में कमी ला सकता है। स्कूल में शिक्षक ही नहीं, घरों पर माता-पिता को भी अपने बच्चे से यौन विषयों पर बात करने की जरूरत है। यदि सभी अभिभावक बच्चों की परवरिश करते समय उन्हें यौन विषयों के साथ नैतिक शिक्षा का पाठ भी पढ़ाएं तो ऐसे अपराधों में निश्चित ही कमी लाई जा सकती है।
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