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AI समय: एआई कभी कुछ नया नहीं खोज सकता, बस की बात नहीं
Sat, 17 Jan 2026 06:49 AM IST
लव गौर
एलन डैनजिगर, द न्यूयॉर्क टाइम्स
एलन डैनजिगर, द न्यूयॉर्क टाइम्स
Published by: लव गौर
Updated Sat, 17 Jan 2026 06:49 AM IST
सार
वास्तविक खोज के लिए तथ्यों को जोड़ने के बजाय नए व अप्रत्याशित ढंग से सोचना पड़ता है, जो एआई के बस की बात नहीं।
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एआई कुछ भी नया नहीं खोज सकता
- फोटो : अमर उजाला प्रिंट
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विस्तार
इटली के फ्लोरेंस शहर में, प्रसिद्ध फ्लोरेंस कैथेड्रल के ठीक सामने एक बहुत पुराना चर्च है, सैन जियोवानी का बैपटिस्टी। प्राचीन रोम की वास्तुकला की स्पष्ट छाया होने के बावजूद, यह आज भी एक अनसुलझा रहस्य बना हुआ है कि किसने और किन परिस्थितियों में इसका निर्माण करवाया। 2020 की शुरुआत में मैंने इसकी ऐतिहासिक जड़ों की तलाश शुरू की। वर्षों तक दस्तावेजों को खंगालने और गहन शोध के बाद, मैं एक अहम निष्कर्ष पर पहुंचा। यह चर्च 1073 में पोप ग्रेगरी सप्तम के चुनाव के बाद, उनके ही नेतृत्व में बनवाया गया था। मेरा यह शोध उस समय पूरा हुआ, जब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) और बड़े भाषा मॉडल अभी आम चर्चा का विषय नहीं बने थे।
हाल ही में, मेरे मन में यह सवाल उठने लगा है कि क्या आज का कोई चैटजीपीटी सरीखा एआई टूल ऐसे सदियों पुराने रहस्य को मुझसे ज्यादा तेजी से सुलझा सकता था? एक व्यक्तिगत प्रयोग के तौर पर मैंने अपनी खोज के अलग-अलग पहलुओं पर तीन एआई चैटबॉट-चैटजीपीटी, क्लाउड और जेमिनी को आजमाया। मेरा उद्देश्य यह जानना था कि क्या ये टूल वही सुराग पहचान पाते हैं, उनकी अहमियत समझ पाते हैं और उसी निष्कर्ष तक पहुंच पाते हैं, जिन तक मैं वर्षों की जांच के बाद पहुंचा था। नतीजा निराशाजनक रहा, क्योंकि चैटबॉट इसमें असफल साबित हुए।
हालांकि, ये एआई टूल बैपटिस्टी की उत्पत्ति से जुड़े जटिल व कठिन तथ्यों को समझने में सक्षम थे, लेकिन वे किसी नए विचार या मौलिक निष्कर्ष तक नहीं पहुंच सके। उनमें वह बुनियादी गुण नहीं था, जो किसी खोज के लिए आवश्यक होता है।
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इसके पीछे कई कारण हैं। दरअसल, बड़े लैंग्वेज मॉडल किसी भी इन्सान से कहीं ज्यादा पढ़ चुके होते हैं, पर जब एआई पढ़ता है, तो वह असल में अर्थ नहीं, बल्कि पैटर्न पहचानता है। ऐसे विचार, जो प्रचलित सोच को चुनौती देते हैं, अक्सर इस प्रक्रिया में छूट जाते हैं। जबकि वास्तविक खोज इन्हीं असामान्य बिंदुओं से जन्म लेती है। यदि मैं इन पर ध्यान न देता, तो शायद मैं भी कभी इस खोज तक नहीं पहुंच पाता। उदाहरण के तौर पर, फ्लोरेंस विश्वविद्यालय के प्रोफेसर गुइडो टिगलर की किताब टस्काना रोमनिका में बैपटिस्टी के निर्माण से जुड़े तर्क को अधिकांश विद्वान स्वीकार नहीं करते। जब मैंने चैटबॉट से बैपटिस्टी के रहस्य को सुलझाने के स्रोतों के बारे में पूछा, तो उन्होंने इस किताब का कोई जिक्र नहीं किया।
सदियों तक यह माना जाता रहा कि 1059 में पोप निकोलस द्वितीय ने सैन जियोवानी के बैपटिस्टी को पवित्र किया था। पर वास्तव में, इसका कोई ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है। यह धारणा केवल दस्तावेजों से निकाले गए अनुमान पर आधारित है, जिनमें उस वर्ष पोप निकोलस द्वितीय की अन्य फ्लोरेंटाइन चर्चों से जुड़ी गतिविधियों का उल्लेख मिलता है। जब मैंने एआई चैटबॉट्स से कहा कि वे इस विसंगति को पहचानने की कोशिश करें, तो नतीजे चौंकाने वाले थे। चैटजीपीटी और क्लाउड इस विरोधाभास तक तो पहुंच गए, लेकिन वे यह समझने में असफल रहे कि यह तथ्य संदिग्ध क्यों है। वहीं जेमिनी ने तो ऐसे सबूत ही गढ़ दिए, जिनसे यह भ्रम दूर होता हुआ प्रतीत होने लगा। किसी भी शोध के लिए तीन बातें जरूरी होती हैं-स्थिति का सटीक आकलन, समस्या की पहचान करना और यह स्पष्ट करना कि वह क्यों गंभीर है? बड़े भाषा मॉडल इन तीनों स्तरों पर संघर्ष करते दिखाई दिए।
वास्तव में, इस रहस्य की असली कुंजी बैपटिस्टी की वास्तुकला में ही छिपी थी कि इसे किसने बनाया था। दरअसल, इसकी संरचना प्राचीन रोम के पैंथियन से गहराई से प्रेरित है। यह इमारत ठीक उसी प्रकार की चर्च वास्तुकला थी, जिसे ग्रेगरी सप्तम बढ़ावा देना चाहते थे। मध्ययुगीन इतिहास के बिखरे हुए तथ्यों को एक नई व्याख्या में जोड़ना केवल सूचनाओं को जोड़ने का काम नहीं था, बल्कि उनके बीच छिपे अर्थ को पहचानने की प्रक्रिया थी। एआई इस तरह के ऐतिहासिक टुकड़ों को इकट्ठा करने और व्यवस्थित करने की प्रक्रिया को तेज तो कर सकता है, पर वास्तविक खोज केवल जानकारी को जोड़ने से नहीं होती। उसके लिए नए और अप्रत्याशित संबंधों को देखना पड़ता है।
मेरे प्रयोगों से यह स्पष्ट हुआ कि मौजूदा एआई तकनीक अभी इस स्तर की रचनात्मक समझ से काफी दूर है। खोज अब भी एक मानवीय प्रयास है। यह उस विशिष्ट मानवीय प्रवृत्ति से जन्म लेती है, जिसमें हम उन चीजों पर ध्यान देते हैं, जो तयशुदा पैटर्न में फिट नहीं बैठतीं और फिर उन्हें गहराई से समझने की कोशिश करती हैं, जो कि शायद एआई के भीतर नहीं हैं।
कोवर्क
यह एक नया एआई एजेंटिक टूल है, जिसे एंथ्रोपिक कंपनी ने विकसित किया है। यह साधारण चैटबॉट्स से अलग है, क्योंकि यह सिर्फ सलाह नहीं देता, बल्कि एक डिजिटल सहकर्मी की तरह उपयोगकर्ताओं के लिए काम भी कर सकता है। उपयोगकर्ता इसे अपने कंप्यूटर के किसी खास फोल्डर का एक्सेस दे सकते हैं। यह उस फोल्डर की फाइल्स को पढ़कर उसे एडिट कर सकता है और नई फाइल्स बना भी सकता है। जब इसे कोई काम सौंपा जाता है, तो यह खुद एक योजना बनाकर चरण-दर-चरण प्रक्रिया तय करके काम पूरा करता है। इसके लिए कोडिंग सीखने की जरूरत नहीं है। उपयोगकर्ता इसे हिंदी या अंग्रेजी में निर्देश दे सकते हैं।
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हाल ही में, मेरे मन में यह सवाल उठने लगा है कि क्या आज का कोई चैटजीपीटी सरीखा एआई टूल ऐसे सदियों पुराने रहस्य को मुझसे ज्यादा तेजी से सुलझा सकता था? एक व्यक्तिगत प्रयोग के तौर पर मैंने अपनी खोज के अलग-अलग पहलुओं पर तीन एआई चैटबॉट-चैटजीपीटी, क्लाउड और जेमिनी को आजमाया। मेरा उद्देश्य यह जानना था कि क्या ये टूल वही सुराग पहचान पाते हैं, उनकी अहमियत समझ पाते हैं और उसी निष्कर्ष तक पहुंच पाते हैं, जिन तक मैं वर्षों की जांच के बाद पहुंचा था। नतीजा निराशाजनक रहा, क्योंकि चैटबॉट इसमें असफल साबित हुए।
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हालांकि, ये एआई टूल बैपटिस्टी की उत्पत्ति से जुड़े जटिल व कठिन तथ्यों को समझने में सक्षम थे, लेकिन वे किसी नए विचार या मौलिक निष्कर्ष तक नहीं पहुंच सके। उनमें वह बुनियादी गुण नहीं था, जो किसी खोज के लिए आवश्यक होता है।
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इसके पीछे कई कारण हैं। दरअसल, बड़े लैंग्वेज मॉडल किसी भी इन्सान से कहीं ज्यादा पढ़ चुके होते हैं, पर जब एआई पढ़ता है, तो वह असल में अर्थ नहीं, बल्कि पैटर्न पहचानता है। ऐसे विचार, जो प्रचलित सोच को चुनौती देते हैं, अक्सर इस प्रक्रिया में छूट जाते हैं। जबकि वास्तविक खोज इन्हीं असामान्य बिंदुओं से जन्म लेती है। यदि मैं इन पर ध्यान न देता, तो शायद मैं भी कभी इस खोज तक नहीं पहुंच पाता। उदाहरण के तौर पर, फ्लोरेंस विश्वविद्यालय के प्रोफेसर गुइडो टिगलर की किताब टस्काना रोमनिका में बैपटिस्टी के निर्माण से जुड़े तर्क को अधिकांश विद्वान स्वीकार नहीं करते। जब मैंने चैटबॉट से बैपटिस्टी के रहस्य को सुलझाने के स्रोतों के बारे में पूछा, तो उन्होंने इस किताब का कोई जिक्र नहीं किया।
सदियों तक यह माना जाता रहा कि 1059 में पोप निकोलस द्वितीय ने सैन जियोवानी के बैपटिस्टी को पवित्र किया था। पर वास्तव में, इसका कोई ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है। यह धारणा केवल दस्तावेजों से निकाले गए अनुमान पर आधारित है, जिनमें उस वर्ष पोप निकोलस द्वितीय की अन्य फ्लोरेंटाइन चर्चों से जुड़ी गतिविधियों का उल्लेख मिलता है। जब मैंने एआई चैटबॉट्स से कहा कि वे इस विसंगति को पहचानने की कोशिश करें, तो नतीजे चौंकाने वाले थे। चैटजीपीटी और क्लाउड इस विरोधाभास तक तो पहुंच गए, लेकिन वे यह समझने में असफल रहे कि यह तथ्य संदिग्ध क्यों है। वहीं जेमिनी ने तो ऐसे सबूत ही गढ़ दिए, जिनसे यह भ्रम दूर होता हुआ प्रतीत होने लगा। किसी भी शोध के लिए तीन बातें जरूरी होती हैं-स्थिति का सटीक आकलन, समस्या की पहचान करना और यह स्पष्ट करना कि वह क्यों गंभीर है? बड़े भाषा मॉडल इन तीनों स्तरों पर संघर्ष करते दिखाई दिए।
वास्तव में, इस रहस्य की असली कुंजी बैपटिस्टी की वास्तुकला में ही छिपी थी कि इसे किसने बनाया था। दरअसल, इसकी संरचना प्राचीन रोम के पैंथियन से गहराई से प्रेरित है। यह इमारत ठीक उसी प्रकार की चर्च वास्तुकला थी, जिसे ग्रेगरी सप्तम बढ़ावा देना चाहते थे। मध्ययुगीन इतिहास के बिखरे हुए तथ्यों को एक नई व्याख्या में जोड़ना केवल सूचनाओं को जोड़ने का काम नहीं था, बल्कि उनके बीच छिपे अर्थ को पहचानने की प्रक्रिया थी। एआई इस तरह के ऐतिहासिक टुकड़ों को इकट्ठा करने और व्यवस्थित करने की प्रक्रिया को तेज तो कर सकता है, पर वास्तविक खोज केवल जानकारी को जोड़ने से नहीं होती। उसके लिए नए और अप्रत्याशित संबंधों को देखना पड़ता है।
मेरे प्रयोगों से यह स्पष्ट हुआ कि मौजूदा एआई तकनीक अभी इस स्तर की रचनात्मक समझ से काफी दूर है। खोज अब भी एक मानवीय प्रयास है। यह उस विशिष्ट मानवीय प्रवृत्ति से जन्म लेती है, जिसमें हम उन चीजों पर ध्यान देते हैं, जो तयशुदा पैटर्न में फिट नहीं बैठतीं और फिर उन्हें गहराई से समझने की कोशिश करती हैं, जो कि शायद एआई के भीतर नहीं हैं।
कोवर्क
यह एक नया एआई एजेंटिक टूल है, जिसे एंथ्रोपिक कंपनी ने विकसित किया है। यह साधारण चैटबॉट्स से अलग है, क्योंकि यह सिर्फ सलाह नहीं देता, बल्कि एक डिजिटल सहकर्मी की तरह उपयोगकर्ताओं के लिए काम भी कर सकता है। उपयोगकर्ता इसे अपने कंप्यूटर के किसी खास फोल्डर का एक्सेस दे सकते हैं। यह उस फोल्डर की फाइल्स को पढ़कर उसे एडिट कर सकता है और नई फाइल्स बना भी सकता है। जब इसे कोई काम सौंपा जाता है, तो यह खुद एक योजना बनाकर चरण-दर-चरण प्रक्रिया तय करके काम पूरा करता है। इसके लिए कोडिंग सीखने की जरूरत नहीं है। उपयोगकर्ता इसे हिंदी या अंग्रेजी में निर्देश दे सकते हैं।