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इसरो 50 सालः भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन और पंडित नेहरू

Sanjiv Pandeyसंजीव पांडेय Updated Tue, 13 Aug 2019 10:41 AM IST
इंडियन स्पेश रिसर्च ऑरगेनाइजेशन (इसरो) के पचास साल 15 अगस्त को पूरे हो रहे हैं।
इंडियन स्पेश रिसर्च ऑरगेनाइजेशन (इसरो) के पचास साल 15 अगस्त को पूरे हो रहे हैं। - फोटो : Social Media
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इंडियन स्पेश रिसर्च ऑरगेनाइजेशन (इसरो) के पचास साल 15 अगस्त को पूरे हो रहे हैं। अपने पचास साल के इतिहास में इसरो ने कई उतार-चढ़ाव देखते हुए अभूतपूर्व सफलता हासिल की है। कम बजट में दुनिया के दूसरे मुल्कों के अंतरिक्ष विज्ञान को चुनौती देते हुए इसरो ने अभूतपूर्व सफलता हासिल की।
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आज दुनिया के कई मुल्क अपने शांतिपूर्व अंतरिक्ष अभियान और जरूरतों के लिए इसरो पर निर्भर हैं। दुनिया के कई मुल्क इसरो के साथ कॉमर्शियल गठजोड़ कर रहे हैं। इसरो उनकी जरूरतों को पूरा कर रहा है। शांतिपूर्ण अभियान के जरिए ही इसरो करोड़ों डॉलर की आय भी कर रहा है। किसी जमाने में दुनिया के दूसरे मुल्कों से अंतरिक्ष विज्ञान की टेक्नलॉजी के लिए मोहताज इस भारत को इसरो ने अंतरिक्ष विज्ञान के टेक्नलॉजी में आत्मनिर्भर बना दिया।

विज्ञान से खासा प्रेम था पंडित नेहरू को 
पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय पंडित जवाहर लाल नेहरू के विज्ञान के प्रति खास प्रेम ने भारत को अंतरिक्ष विज्ञान में आज सशक्त बना दिया है। स्वतंत्रता के बाद ही पंडित जवाहर नेहरू के निर्देश पर भारत ने अंतरिक्ष विज्ञान की तरफ कदम बढ़ाना शुरू कर दिया था।

आजादी के संघर्ष के दौरान पश्चिमी देशों और सोवियत संघ की यात्रा के दौरान पंडित नेहरू ने विज्ञान के क्षेत्र में हो रहे कामों को ध्यान से देखा था। आजाद भारत में भी विज्ञान उनकी प्राथमिकता में था। हालांकि इसरो की स्थापना तो 15 अगस्त 1969 को हुई थी। लेकिन आधुनिक भारतीय अंतरिक्ष विज्ञान की नींव पंडित जवाहर लाल नेहरू ने अपने जीते जी डाली थी।

एक लंबे सफर के बाद इसरो ने आज दुनिया के तमाम उन मुल्कों में भारत को स्थान दिलवाया है, जो अपने अंतरिक्ष विज्ञान को लेकर गर्व करते हैं। इसमें अमेरिका, चीन, फ्रांस, ब्रिटेन, रूस आदि मुल्क शामिल हैं। यही नहीं इसरो ने कई जगहों पर पश्चिम देशों के अंतरीक्ष विज्ञान को मात दे दी।

मसलन मंगलयान को इसरो ने पहले ही प्रयास में मंगल पर पहुंचाया। जबकि अमेरिका, को यह सफलता पांचवी बार में मिली थी। सोवियत संघ को 8वीं बार में मिली थी। दिलचस्प बात यह थी कि भारत का मंगल मिशन अमेरिका और रूस के मुकाबले कई गुणा सस्ता था। भारत ने मंगल मिशन पर 450 करोड़ रुपये खर्च किए थे।
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