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त्योहार की तरह लगी थी 15 अगस्त 1947 की सुबह
राकेश कुमार/देव शर्मा/अमर उजाला, संभल
Updated Sun, 14 Aug 2016 01:00 AM IST
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- फोटो : Amar Ujala
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प्रथम स्वतंत्रता दिवस की यादें आज भी जेहन में रोमांच पैदा कर देती हैं। स्वतंत्रता की पहली सुबह हर आम और खास के लिए एक त्योहार की तरह थी। यह कहना है स्वतंत्रता संग्राम सेनानी प्रेम पाल रस्तोगी का। उन्होंने प्रथम स्वतंत्रता दिवस से संबंधित कुछ यादें अमर उजाला से साझा करने के दौरान क्रांतिकारियों के सहयोग, सेवा को भी बयां किया।
स्वतंत्रता संग्राम सेनानी प्रेमपाल रस्तोगी 100 वर्ष की उम्र पार कर चुके हैं। उनके साथ देश की आजादी के लिए संघर्ष करने वाले अधिकतर लोग गुजर चुके हैं। बढ़ती उम्र के चलते उनकी यादें भी अब धुंधली होने लगी हैं लेकिन अच्छी बात यह है कि वह बातचीत करने में सक्षम हैं।
वे पहले स्वतंत्रता दिवस की सुबह का नजारा बयां करते हुए रोमांचित हो उठे। उन्होंने जेल में बिताए समय, क्रांतिकारी साथियों के सेवा, सहयोग और प्रेम भावना का जिक्र किया।बताया कि स्वतंत्रता की पहली सुबह हर आम और खास के लिए एक त्योहार की मानिंद थी।
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जब आजादी की घोषणा हुई तब वे संभल क्षेत्र में ही थे और पूरा दिन उत्साह भरे माहौल में बीता। हर तरफ जश्न था। बताया, उस दिन तो लोगों को लगता था कि अब देश की समस्याओं का समाधान होगा। अपने लोगों की सरकार अपने लोगों के लिए काम करेगी और वास्तविक तौर पर लोकतंत्र की स्थापना हो सकेेगी। लेकिन यह उम्मीद अभी पूरी नहीं हो सकी है।
पंडित नेहरू का था खास योगदान
संभल। स्वंतत्रता संग्राम सेनानी प्रेमपाल रस्तोगी ने बताया कि क्रांतिकारियों के जज्बे को देखकर अंग्रेजों को 1947 से पहले ही आभास हो गया था कि देश जल्द ही गुलामी की जंजीरों से मुक्त हो जाएगा। इसीलिए आजादी देने के प्रारूप पर अंग्रेजी हुक्मरान अंग्रेजो भारत छोड़ो आंदोलन के बाद ही विचार-विमर्श करने लगे थे। भारत के नरमपंथी नेताओं से उनकी बातचीत होने लगी थी। लेडी माउंट बेटेन ने पंडित जवाहर लाल नेहरू से संपर्क कर दिशा में पहल की थी।
जेल में साथियों ने सेवा की
संभल। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी प्रेमपाल रस्तोगी का कहना है कि आजादी का ऐसा दौर था जब लोगों में बड़ा प्रेम था। उन्होंने बताया कि जब वे जेल में वह बीमार हो गए थे। जेल में बंद तमाम क्रांतिकारियों ने उनका बड़ा ख्याल रखा।
आहत करता है भ्रष्टाचार
संभल। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी प्रेमपाल रस्तोगी ने कहा कि जिन उम्मीदों के साथ आजादी का संघर्ष किया गया था। उन उम्मीदों को आजाद भारत की सरकारें पूरा नहीं कर सकी हैं। आम जनता आज भी भ्रष्टाचार से पीड़ित है। सरकार गरीबों के प्रति जवाबदेह नहीं है। जब हम देश की समस्याओं और जनता की दिक्कतों को सुनते हैं तो दिल आहत होता है।
70 सालों में विदा हो गए 220 आजादी के दीवाने
चंदौसी/रजपुरा। ‘कर चले हम फिदा जान-ओ-तन साथियों’ यह गीत देश के लिए बलिदान होने वाले स्वातंत्रता के वीरों की याद दिलाता है। लेकिन, एक-एक कर हमारे बीच से स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भी विदा ले रहे हैं। जंग-ए-आजादी के 221 दीवानों में 220 हम से हमेशा के लिए विदा ले चुके हैं।
जिले के सभी ब्लाॅक कार्यालयों के बारे में तिरंगे के रंग वाले शिलापटों में ब्लाक क्षेत्र से संबंधित स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के नाम अंकित किए गए हैं। इसमें सबसे अधिक स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के नाम 81 जूनावई में अंकित हैं। इसके बाद बनियाखेड़ा ब्लाक (चंदौसी) में 62, संभल में 54, पंवासा में सात, असमोली में छह, गुन्नौर में दस, बहजोई में एक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का नाम अंकित है।
जबकि रजपुरा ब्लाक में शिलापट तो लगा है लेकिन किसी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का नाम नहीं लिखा है। यहां के खंड विकास अधिकारी नरेश कुमार ने बताया कि ब्लाॅक क्षेत्र में किसी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के होने का ब्लाॅक कार्यालय में कोई रिकार्ड नहीं है। कुछ ब्लाक ऐसे हैं, जहां स्वतंत्रता दिवस के पूर्व इन शिलापटों की रंगाई-पुताई कराई जा सकी है।
जिले की सभी आठ ब्लाकों के सभी शिलापटों पर कुल 221 स्वतंत्रता के दीवानों के नाम अंकित हैं, लेकिन अफसोसजनक यह है कि इनमें से अब 220 सेनानी अब दुनियां से हमेशा के लिए विदा हो चुके हैं। सिर्फ संभल में प्रेमपाल रस्तोगी ही एक मात्र स्वतंत्रता संग्राम सेनानी हमारे बीच मौजूद हैं, जिनकी उम्र सौ वर्ष से अधिक बताई जा रही है। बनियाखेड़ा ब्लाक में इकलौता गांव गुमथल ही ऐसा है, जहां के सोलह स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के नाम बोर्ड पर अंकित है।
स्वतंत्रता संग्राम सेनानी प्रेमपाल रस्तोगी 100 वर्ष की उम्र पार कर चुके हैं। उनके साथ देश की आजादी के लिए संघर्ष करने वाले अधिकतर लोग गुजर चुके हैं। बढ़ती उम्र के चलते उनकी यादें भी अब धुंधली होने लगी हैं लेकिन अच्छी बात यह है कि वह बातचीत करने में सक्षम हैं।
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वे पहले स्वतंत्रता दिवस की सुबह का नजारा बयां करते हुए रोमांचित हो उठे। उन्होंने जेल में बिताए समय, क्रांतिकारी साथियों के सेवा, सहयोग और प्रेम भावना का जिक्र किया।बताया कि स्वतंत्रता की पहली सुबह हर आम और खास के लिए एक त्योहार की मानिंद थी।
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जब आजादी की घोषणा हुई तब वे संभल क्षेत्र में ही थे और पूरा दिन उत्साह भरे माहौल में बीता। हर तरफ जश्न था। बताया, उस दिन तो लोगों को लगता था कि अब देश की समस्याओं का समाधान होगा। अपने लोगों की सरकार अपने लोगों के लिए काम करेगी और वास्तविक तौर पर लोकतंत्र की स्थापना हो सकेेगी। लेकिन यह उम्मीद अभी पूरी नहीं हो सकी है।
पंडित नेहरू का था खास योगदान
संभल। स्वंतत्रता संग्राम सेनानी प्रेमपाल रस्तोगी ने बताया कि क्रांतिकारियों के जज्बे को देखकर अंग्रेजों को 1947 से पहले ही आभास हो गया था कि देश जल्द ही गुलामी की जंजीरों से मुक्त हो जाएगा। इसीलिए आजादी देने के प्रारूप पर अंग्रेजी हुक्मरान अंग्रेजो भारत छोड़ो आंदोलन के बाद ही विचार-विमर्श करने लगे थे। भारत के नरमपंथी नेताओं से उनकी बातचीत होने लगी थी। लेडी माउंट बेटेन ने पंडित जवाहर लाल नेहरू से संपर्क कर दिशा में पहल की थी।
जेल में साथियों ने सेवा की
संभल। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी प्रेमपाल रस्तोगी का कहना है कि आजादी का ऐसा दौर था जब लोगों में बड़ा प्रेम था। उन्होंने बताया कि जब वे जेल में वह बीमार हो गए थे। जेल में बंद तमाम क्रांतिकारियों ने उनका बड़ा ख्याल रखा।
आहत करता है भ्रष्टाचार
संभल। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी प्रेमपाल रस्तोगी ने कहा कि जिन उम्मीदों के साथ आजादी का संघर्ष किया गया था। उन उम्मीदों को आजाद भारत की सरकारें पूरा नहीं कर सकी हैं। आम जनता आज भी भ्रष्टाचार से पीड़ित है। सरकार गरीबों के प्रति जवाबदेह नहीं है। जब हम देश की समस्याओं और जनता की दिक्कतों को सुनते हैं तो दिल आहत होता है।
70 सालों में विदा हो गए 220 आजादी के दीवाने
चंदौसी/रजपुरा। ‘कर चले हम फिदा जान-ओ-तन साथियों’ यह गीत देश के लिए बलिदान होने वाले स्वातंत्रता के वीरों की याद दिलाता है। लेकिन, एक-एक कर हमारे बीच से स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भी विदा ले रहे हैं। जंग-ए-आजादी के 221 दीवानों में 220 हम से हमेशा के लिए विदा ले चुके हैं।
जिले के सभी ब्लाॅक कार्यालयों के बारे में तिरंगे के रंग वाले शिलापटों में ब्लाक क्षेत्र से संबंधित स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के नाम अंकित किए गए हैं। इसमें सबसे अधिक स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के नाम 81 जूनावई में अंकित हैं। इसके बाद बनियाखेड़ा ब्लाक (चंदौसी) में 62, संभल में 54, पंवासा में सात, असमोली में छह, गुन्नौर में दस, बहजोई में एक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का नाम अंकित है।
जबकि रजपुरा ब्लाक में शिलापट तो लगा है लेकिन किसी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का नाम नहीं लिखा है। यहां के खंड विकास अधिकारी नरेश कुमार ने बताया कि ब्लाॅक क्षेत्र में किसी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के होने का ब्लाॅक कार्यालय में कोई रिकार्ड नहीं है। कुछ ब्लाक ऐसे हैं, जहां स्वतंत्रता दिवस के पूर्व इन शिलापटों की रंगाई-पुताई कराई जा सकी है।
जिले की सभी आठ ब्लाकों के सभी शिलापटों पर कुल 221 स्वतंत्रता के दीवानों के नाम अंकित हैं, लेकिन अफसोसजनक यह है कि इनमें से अब 220 सेनानी अब दुनियां से हमेशा के लिए विदा हो चुके हैं। सिर्फ संभल में प्रेमपाल रस्तोगी ही एक मात्र स्वतंत्रता संग्राम सेनानी हमारे बीच मौजूद हैं, जिनकी उम्र सौ वर्ष से अधिक बताई जा रही है। बनियाखेड़ा ब्लाक में इकलौता गांव गुमथल ही ऐसा है, जहां के सोलह स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के नाम बोर्ड पर अंकित है।