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बड़ी राहत, अब पीजीआई में मरीजों के इलाज के लिए टोकन सिस्टम

Mon, 02 May 2016 01:10 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़ Updated Mon, 02 May 2016 01:10 AM IST
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now token system will will be launched in PGI for patient treatment
पीजीआई चंडीगढ़ - फोटो : demo pics

पिछले दिनों न्यू ओपीडी में इलाज के इंतजार में महिला की मौत के बाद पीजीआई ने टोकन सिस्टम लागू करने का फैसला ले लिया है। पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर पीजीआई के गाइनेकोलॉजी और डरमेटोलॉजी (स्किन) डिपार्टमेंट में टोकन सिस्टम शुरू करने की योजना बनाई गई है।

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पीजीआई के अधिकारियों ने बताया कि अगले 15 दिन के भीतर दोनों डिपार्टमेंट में यह योजना शुरू हो जाएगी। उसके बाद यह सिस्टम सभी ओपीडी में लागू कर दिया जाएगा। इससे मरीजों को काफी राहत मिलने वाली है। हालांकि पीजीआई फैकल्टी एसोसिएशन का कहना है कि इससे पहले पीजीआई को मरीजों की भीड़ कंट्रोल करनी चाहिए। उसके बाद टोकन व अन्य सिस्टम कारगार साबित होंगे।
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मरीजों को यह होगा फायदा
टोकन सिस्टम शुरू होने से मरीजों को सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि वह स्क्रीन पर देख सकेगा कि उसका नंबर कब आएगा। अंदर किस नंबर के मरीज देखा जा रहा है, ताकि वह अपने समय का सदुपयोग कर सके। यदि लंबा इंतजार करना पड़ेगा तो वह कैंटीन में जाकर चाय पी सकता है या फिर बाहर जाकर भी इंतजार कर सकता है। इससे भीड़ भी कंट्रोल होगी। अभी मरीज कार्ड जमा करता है, लेकिन उसका नंबर कब आएगा, पता नहीं चलता। मरीज इंतजार करते रह जाते हैं और दूसरे मरीज दिखाकर चले जाते हैं। इससे मरीज का वेटिंग का समय बढ़ता जाता है।
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दो साल से लंबित है मांग
पीजीआई में रोजाना दस हजार मरीजों की ओपीडी होती है। इतनी भीड़ शायद ही देश की किसी ओपीडी में होती हो। दो साल पहले पीजीआई प्रशासन ने टोकन सिस्टम शुरू करने का फैसला लिया। इसके लिए तैयारियां भी शुरू हो गईं। एक प्राइवेट कंपनी के साथ टाईअप भी होना था, लेकिन बात बीच में ही रुक गई। उसके बाद योजना पर काम नहीं हो पाया।


दो हफ्ते पहले हुई थी मौत 
दो हफ्ते पहले शिमला से आए पेशेंट शशि ठाकुर की सोमवार को पीजीआई में मौत हो गई थी। वे किडनी की पेशेंट थी। पहले उन्हें इमरजेंसी में जाया गया, लेकिन उन्हें भरती नहीं किया गया। उन्हें न्यू ओपीडी में दिखाने को बोला गया, लेकिन डाक्टरों ने उन्हें नहीं देखा और उनकी मौत हो गई। मरीज न्यू ओपीडी में इंतजार ही करता रह गया और डाक्टर उसे देखने नहीं आए। डाक्टरों का दावा है कि उन्होंने तीन बार पेशेंट को बुलाया, लेकिन वह नहीं आया, जबकि मरीज के परिजनों का कहना है कि वे बार-बार डाक्टर से गुहार लगाते रहे, लेकिन वे नहीं आए।

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