'माओवादियों ने भिजवाए थे बिनायक सेन को रुपए'
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हाल ही में गिरफ्तार हुए नक्सल नेता सब्यसाची पांडा के साथ मैंने 2009 में अपनी किताब पर शोध के सिलसिले में नौ दिन बिताए थे, जिनमें बहुत सारी बातों के अलावा डॉ बिनायक सेन के नक्सलवादियों से जुडे होने का भी जिक्र छिडा।
पूरी कहानी पढिए
भरी गर्मी का मौसम था और ओडिशा के उस हिस्से में पानी की भारी कमी थी। हम एक जंगल में आमने-सामने बैठे थे। ‘पानी उबला हुआ हो तो उसके रंग की ओर नहीं देखना चाहिए‘, उन्होंने मुझसे कहा और हम आँखे बंद कर पानी पीने लगे। वह पीले रंग का था।
सब्यसाची पांडा से मिलने का इंतजाम करने में मुझे जितने पापड बेलने पडे, उनसे मिलने का रास्ता उतना लंबा नहीं था, जितना बाकी नक्सली नेताओं तक पंहुचने में लगता है। मुझे सिर्फ भुवनेश्वर के एक सिनेमा हाल के बाहर टहलना था, जहां उस वक्त ‘केवल वयस्कों के लिए’ वाली फिल्म लगी हुई थी।
हमारी अगवानी का इंतजाम यहीं था। थोड़ी देर में एक हाथ में साइकिल और दूसरे हाथ में गुलाब का फूल पकडे हमें वह दिख गया, जैसा फोन पर तय हुआ था। वह मुझे और फोटोग्राफर मुस्तफा कुरैशी को पास के बस अड्डे पर ले गया और बस में बिठा कर गायब हो गया।
बस छूटने का टाइम हुआ जा रहा था और हमें पता ही नहीं था, कि हमें जाना कहां है। पर वह आखिरी पल नमूदार हुआ ये कहते हुए, “माफ़ कीजिएगा एक परिचित मुझे दिख गया इसलिए मुझे छुप जाना पडा”।
रात भर बस में सफ़र के बाद उस कैम्प तक जाने के लिए ज्यादा चलना नहीं पडा।
'हां मैंने ही भेजे थे रुपए'
गोरे-चिट्टे सब्यसाची पांडा से हाथ मिलाते वक्त मैंने कहा, ‘आप तो ओडिया सिनेमा के हीरो भी बन सकते थे।‘ सब्यसाची थोडा मुस्कुराए।
कैम्प में ज्यादातर लोग ओडिशा से ही थे। और कुछ छत्तीसगढ के भी। एक वरिष्ठ से दिखते नेता से भी परिचय कराया गया। बताया गया वे बालाकृष्णा हैं। माओवादियों के आंध्र-ओडिशा बॉर्डर (एओबी) राज्य के प्रमुख। एक दूसरे इलाके का प्रमुख यहाँ क्या कर रहा है? बताया गया कि वे सब्यसाची से कुछ ज़रूरी बात करने आए हैं।
इस मुलाकात से कुछ ही दिन पहले अखबारों में यह खबर छपी थी कि सब्यसाची को गिरफ्तार कर लिया गया है। तब ये खबर सही साबित नहीं हुई थी। सब्यसाची से मैंने एक बात की तसदीक भी की। मैं उन दिनों छत्तीसगढ़ में माओवादी आंदोलन पर एक किताब लिख रहा था। उसके लिए खोजबीन करते हुए एक माओवादी कुरियर ने मुझसे कहा था कि सब्यसाची पांडा ने मानव अधिकार कार्यकर्ता बिनायक सेन को 50,000 रू भेजे थे।
50 हजार का किस्सा
इससे पहले कि बिनायक सेन उस रकम को लेने पहुंच पाते, कुरियर पीयूष गुहा को गिरफ्तार कर लिया गया था। उस माओवादी नेता के अनुसार सब्यसाची ने यह धन जेल में बंद माओवादी नेता नारायण सान्याल के कानूनी खर्च के लिए भेजा था। बिनायक सेन ने इस प्रश्न का उत्तर नहीं दिया और उनके वकील इस आरोप को बेबुनियाद बताते हैं।
सब्यसाची से बैठक तय करने में मुझे चार महीने से अधिक का समय लगा था और वह सवाल जो मैं पूछने गया था वह पूछने का माहौल बनाने में भी मुझे नौ दिन लग गए।
एक रात हम फिर से अड्डा बदल रहे थे मैं सब्यसाची के पीछे चल रहा था। वह सवाल मैंने तब पूछा, “आपने डॉक्टर सेन को 50,000 रुपए क्यों भेजे थे?” चलते-चलते सब्यसाची ठिठककर मुडे। और मुझे देखा। शायद वे ताडना चाहते थे कि मैं कितने भरोसे से ये बात उनसे पूछ रहा हूं।
सब्यसाची ने मुझे बताया, ‘पीयूष कुछ खबर देने आया था और उसने कहा अब उसे कोलकाता वापस जाना है फिर वहां से 50,000 रूपए लेकर बिनायक सेन के पास जाना है। मैंने कहा कि यदि सिर्फ पैसे लेने ही कोलकाता जाना है तो मुझसे ले लो। मुझे बाद में वापस कर देना।’
‘तो क्या वो पैसे आपको वापस मिले?’, मैंने पूछा
“नहीं पीयूष तो गिरफ्तार हो गया था और मैंने यह हिसाब सेन्ट्रल कमेटी को दे दिया है”।
नक्सल नेता की लाइफ स्टाइल
सब्यसाची के पिता ओडिशा में कम्यूनिस्ट पार्टी से विधायक रह चुके थे। उनके भाई आजकल विभिन्न उद्योग कंपनियों के एजेंट हैं। मैं उनसे भी मिल चुका था।
इन नौ दिनों में बहुत सारा वक्त मिला उनसे बात करने का। एक मात्र सब्यसाची ही वहां अपने टेंट में डबल लेयर यानी टेंट के नीचे एक चादर भी लगाते थे जिससे गर्मी कम लगे। हम भी उनके ही टेंट में ज्यादा वक्त बिताते।
उन्होंने नयागढ़ के शस्त्रागार लूटने की घटना को बड़े विस्तार से बताया जो आजाद भारत में इस तरह की सबसे बड़ी वारदात है। सब्यसाची ने इसकी अगुवाई की थी। अपने बचपन, अपने परिवार के बारे में भी उन्होंने मुझे बताया। उनके बताने का तरीका इतना दिलचस्प है, कि उन नौ दिनों में मेरी कई डायरियां उनसे भरती चली गईं।
जिस सवाल को वे टाल गए वह था स्वामी लक्ष्मणानंद की कथित हत्या का मामला।
जानकारी तक का सफर
बातचीत के इन सिलसिलों के बीच कुछ लोग आते और उनके जाने के बाद हमें अपना अड्डा बदलना होता। सब्यसाची समझाते कि यदि कोई भी व्यक्ति हमें मिलकर गया है तो उसके बाद अड्डा बदलना ज़रूरी है क्योंकि अगर वापस जाने के बाद वह पकड़ा गया तो उसके द्वारा पुलिस को अड्डे की जानकारी दे दिए जाने का खतरा बना रहता है।
जंगल की पगडंडियों पर चलते हुए हमेशा कतार में चलना होता और आख़िरी व्यक्ति कमर में एक झाडू बांधे चलता, बन्दर की पूंछ की तरह। पैरों के निशान मिटाने के लिए। दिन में सब्यसाची अक्सर बालकृष्णा से अकेले में बात करते। उनकी बातें हमारी सुनाई में तो नहीं पडती, पर उनके हावभाव से दोनों के बीच तनाव साफ़ झलकता था। बाद में सब्यसाची ने पार्टी छोड़ दी थी।
जब जाने का वक्त हुआ, सब्यसाची ने अपने झोले से मोबाइल सिम कार्ड का डिब्बा निकाला। उसमें से एक को मोबाइल पर लगाया और हमारे लौटने का टिकट बुक कर दिया। सड़क पर आते ही मैंने और मेरे साथ कैमरामैन मुस्तफा ने सबसे पहले एक-एक कोल्ड ड्रिक पीया। नौ दिन तक उबाले हुए पीले पानी के बाद।
कोसा से मुलाकात
इस मुलाकात के कुछ दिन बाद मैं दंडकारण्य इलाके के प्रमुख कोसा से मिला था। कोसा को जैसे ही पता चला कि मैं सब्यसाची से मिलकर आ रहा हूँ तो उन्होंने राहत की सांस ली क्योंकि उन्होंने भी अखबार में यह गलत खबर पढी थी कि सब्यसाची गिरफ्तार हो गए हैं। मैंने उनसे भी पूछा था, क्या सब्यसाची ने जो पैसे डाक्टर सेन को भेजे थे उसका हिसाब दे दिया?
जवाब मिला “मैं सेंट्रल कमेटी के हिसाब को उतने ध्यान से नहीं देखता”
दो चीज़ें स्पष्ट थी पहला सब्यसाची और कोसा सम्पर्क में नहीं थे और दूसरा कोसा को यह पता नहीं था कि सब्यसाची ने मुझे यह बताया था कि उसने सेन्ट्रल कमेटी को हिसाब दिया था। जो पत्रकारिता का नियम मैं जानता हूं उसमें एक तथ्य को कम से कम दो स्वतंत्र सूत्रों से कन्फर्म करना होता है जो आपस में न जुड़ें हो। सब्यसाची और कोसा ने उस बात की तसदीक कर दी थी, जो उस माओवादी कूरियर ने मुझे बताई थी।
(बीबीसी में प्रोड्यूसर रह चुके शुभ्रांशु चौधरी माओवादियों के इलाके में सक्रिय रहे हैं और उन पर एक किताब भी लिखी है)
बिनायक सेन की वकील की प्रतिक्रिया
लेकिन बिनायक सेन की वकील ने बीबीसी के साथ बातचीत में इन दावों को खारिज किया है।
बिनायक सेन की वकील और पीयूसीएल की महासचिव सुधा भारद्वाज कहती हैं, "सब्यसाची पांडा की गिरफ़्तारी के पश्चात शुभ्रांशु चौधरी का सनसनीखेज़ खुलासा करना काफी संदेहास्पद और मोटीवेटेड लगता है। डॉ बिनायक सेन का सब्यसाची पांडा के साथ किसी भी प्रकार का दूर तक भी कोई सरोकार नहीं रहा। पूर्व में शुभ्रांशु चौधरी ने अपनी पुस्तक में कुछ दूसरे विरोधाभासी और इतने ही अपुष्ट आरोप लगाए थे और उनकी पुस्तक को काफी सस्ती लोकप्रियता हासिल हुई।"
सुधा भारद्वाज आगे कहती हैं, "सुखद आश्चर्य यह है कि "रास्ता दिखाने" और "खाना खिलाने" के लिए निर्दोष आदिवासियों को बड़ी तादाद में जेल में डालने वाली छत्तीसगढ़ पुलिस ने पांडा के साथ नौ दिन बिताने वाले चौधरी पर छत्तीसगढ़ विशेष जनसुरक्षा अधिनियम के अंतर्गत कोई अपराध कायम करना ज़रूरी नहीं समझा है।"