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छत्तीसगढ़ चुनावः दो तिहाई बहुमत का दावा कर रही कांग्रेस आखिर क्यों हुई धड़ाम, समझिए इन पांच कारणों से
सार
CG Election Result 2023 : कांग्रेस हर बार 75 से अधिक सीटें जीतने का दावा कर रही थी। पर चुनाव परिणाम एकदम उलट आए। आइए समझते हैं कि उन कारणों को जिनके चलते बीजेपी राज्य में सरकार बनाने जा रही है और अति आत्मविश्वास के पहाड़ पर बैठी कांग्रेस के हाथ से सत्ता छिन गई।
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भूपेश बघेल की हार के कारण।
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
90 सीटों वाले छत्तीसगढ़ में सभी सीटों के परिणाम शाम तक आएंगे लेकिन अब करीब-करीब यह साफ हो गया है कि वहां सत्ता बदलने जा रही है। भूपेश बघेल की विदाई तय हैं। बीजेपी से मुख्यमंत्री कौन होगा यह अभी साफ नहीं हो सका है। पहले बात आज आए परिणामों की। छत्तीसगढ़ एक ऐसा राज्य है जहां तीन महीने पहले तक खुद बीजेपी के नेता इस बात को अंदर ही अंदर स्वीकार्य कर चुके थे कि इस बार कम से कम वह सत्ता में नहीं लौट रहे हैं। कांग्रेस हर बार 75 से अधिक सीटें जीतने का दावा कर रही थी। पर चुनाव परिणाम एकदम उलट आए। आइए समझते हैं कि उन कारणों को जिनके चलते बीजेपी राज्य में सरकार बनाने जा रही है और अति आत्मविश्वास के पहाड़ पर बैठी कांग्रेस के हाथ से सत्ता छिन गई।
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जातीय समीकरण बिठाने में असफल
चुनाव में जातीय समीकरण अहम रोल अदा करते हैं। ओबीसी वोटर बीजेपी और कांग्रेस दोनों को ही वोट करता रहा है। लेकिन इस बार कांग्रेस ओबीसी की अलग-अलग जातियों का समीकरण बैठाने में सफल नहीं रही। साहू समाज का एक बड़ा वोट बैंक जिसने 2018 के चुनावों में कांग्रेस को वोट किया था इस बार उससे छिटका दिखा। छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ टीवी पत्रकार बरुण सखाजी कहते हैं कि कांग्रेस सोशल इंजीनियरिंग करने में असफल रही। कांग्रेस का सबसे बड़ा वोट बैंक गांवों में था। कांग्रेस उसी को आधार बनाकर चुनाव लड़ रही थी। बीजेपी ने गांव और किसान के उस वोटर में बेहतर चुनावी प्रबंधन किया। कांग्रेस इन जातीय समीकरणों को बिठाने में असफल रही। जो जातियां कांग्रेस को वोट करती रहीं इस बार उससे दूर खड़ी दिखाई दीं।
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संगठन रहा जमीन से दूर
सत्ता में रही पार्टी जब चुनाव में उतरती है तो उसके साथ सरकार और संगठन दोनों होते हैं। छत्तीसगढ़ के चुनावों में लोगों की कुछ नाराजगी सरकार के साथ थी लेकिन बड़ा नुकसान संगठन के सक्रिय ना होने की वजह से हुआ। वरिष्ठ पत्रकार और समालोचक दिवाकर मुक्तिबोध कहते हैं कि संगठन इस बात की खुशफहमी में था कि वह सरकार में आने ही जा रहे हैं। संगठन ने बूथ स्तर पर ना तो मैनेजमेंट किया और ना ही वोटरों को घर से निकालने में दिलचस्पी दिखाई। सरकार और संगठन में एक तरह की दूरी दिखाई दी। संगठन की उपेक्षा भी बीते पांच सालों में दिखी। इसका साफ असर चुनाव परिणामों में दिखा।
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भष्ट्राचार के आरोप हुए नत्थी
कांग्रेस अपनी सफाई में कुछ भी कहती रहे। कोर्ट में क्या साबित हो पाए या नहीं या वक्त बताएगा लेकिन कांग्रेस सरकार के ऊपर भष्ट्राचार के आरोप एक तरह से नत्थी हो गए। ऐन चुनाव के वक्त महादेव ऐप के प्रकरण ने भी इस धारणा की पुष्टि की। मुक्तिबोध कहते हैं कि इससे इंकार नहीं कर सकते कि भष्ट्राचार के आरोपों ने कांग्रेस का नुकसान किया। आम वोटर के दिमाग में यह संदेश गया कि यह सरकार किसी ना किसी रूप में भष्ट्राचार के मामलों में शामिल होती दिख रही है। भूपेश अपनी सरकार की एक नीट एंड क्लीन इमेज नहीं बना रख सके।
विकास कार्य नहीं हुए
बीते पांच सालों में भूपेश सरकार का मुख्य फोकस छत्तीसगढ़ी संस्कृति और किसान रहे हैं। कांग्रेस शहरी क्षेत्रों के विकास कार्यों से दूर रही है। बरुण सखाजी कहते हैं कि निर्माण के स्तर पर कांग्रेस सरकार ने ऐसा कुछ भी नहीं किया जिसे बताया या दिखाया जा सके। सरकार लगातार छत्तीगसढ़ वाद पर केंद्रित रही। कई सारे सरकारी कार्यक्रमों में छत्तीसगढ़ के त्योहारों को धूम-धाम से मनाया गया। लेकिन कांग्रेस का फोकस कभी भी विकास कार्यों में नहीं दिखा। राजधानी रायपुर सहित प्रदेश के बाकी शहरों में जो योजनाएं बीजेपी पिछली सरकारों में लेकर आई थी कांग्रेस उन्हें आगे नहीं बढ़ा सकी।
आपस में मनमुटाव
कांग्रेस सरकार खेमों में बंटी नजर आई। मुक्तिबोध कहते हैं कि टीएस सिंह देव और भूपेश बघेल के बीच में खटपट है यह बात कोई सीक्रेट नहीं थी। ढाई-ढाई साल मुख्यमंत्री पद को लेकर शुरू हुआ विवाद आखिरी के दो साल तक सरकार को दो गुटों में स्पष्ट रुप से बांट चुका था। टीएस और भूपेश में नहीं बनती यह बात कांग्रेस में जगजाहिर थी। टिकट वितरण में भी यह मनमुटाव दिखा। दोनों ही खेमे के लोग यह चाहते थे कि टिकट में उनकी चले ताकि जीतने के बाद मुख्यमंत्री बनने में उनका खेमा मजबूत हो सके। टिकट वितरण में यह रस्साकशी भी हार की एक वजह बनी।