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चरक पूजा VIDEO: यहां कांटो से भरे पेड़ पर नंगे पैर चढ़ते हैं शिव भक्त, फिर नृत्य करते हुए तोड़ते हैं खजूर

Sat, 15 Apr 2023 04:32 PM IST
मोहनीश श्रीवास्तव न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कांकेर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कांकेर Published by: मोहनीश श्रीवास्तव Updated Sat, 15 Apr 2023 04:32 PM IST
सार

इस त्यौहार के आयोजन पर प्रशासन ने कुछ हद तक बंदिशे लगाई हैं। अब पखांजूर क्षेत्र में चरक पर्व केवल सांकेतिक रूप से मनाया जाने लगा है। बंग समुदाय में एक लोकप्रिय कहावत है, बारो मासे तेरो परव। अर्थ है की 12 महीनों में 13 तरह के पूजा-पाठ और त्यौहार का आयोजन किया जाता है।

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Bengali Shiva devotees Special Charak Puja in Chhattisgarh Kanker, see video
चरक पूजा में नंगे पैर खजूर के पेड़ पर चढ़ते हैं शिव भक्त। - फोटो : संवाद

विस्तार

छत्तीसगढ़ का बस्तर इलाका अपनी अनोखी परंपराओं के लिए जाना जाता है। आदिवासी त्योहारों के बीच अन्य जगहों के पर्व भी स्थानीय तरीके से आकर्षक रूप में मनाए जाते हैं। उनमें ही है बंगालियों को पर्व चरक पूजा। पंखाजूर में होनी वाली इस चरक पूजा के दिन शिव भक्त नंगे पैर कांटों से भरे खजूर के पेड़ पर चढ़ते हैं। फिर नृत्य करते हुए खजूर तोड़ते हैं। इसे देखने के लिए आसपास के गांवों से हर साल हजारों की संख्या में पहुंचते हैं। अमर उजाला भी इस विशेष और अनोखी पूजा को वीडियो सहित आपके पास लेकर आया है। 

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खजूर के गुच्छों को प्रसाद रूप में करते हैं ग्रहण
चरक पूजा के दौरान खजूर भंगा उत्सव में शिव भक्त खजूर के पेड़ पर चढ़कर कटीले कांटों के बीच नृत्य करते हुए फल के गुच्छों को तोड़ते हैं। फिर उसे नीचे भक्तों के पास फेंका जाता है। भक्त उस गुच्छे को प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं। साथ ही यह कहा जाता हैं की गुच्छे को घर के प्रवेश द्वार पर लगाने बरकत आती है। इसलिए इस फल को पाने के लिए काफी जद्दोजहद करनी पड़ती है। इस उत्सव में भक्त अपनी पीठ पर लोहे के हुक लगवाते है और भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कई तरह के कर्मकांड करते हैं। 
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चैत्र महीने के अंतिम दिन मनाते हैं चरक पूजा
दरअसल, पखांजूर क्षेत्र बंगाली बाहुल्य है। ऐसे में उनके त्यौहार भी आकर्षण का केंद्र हैं। नील पूजा, खजूर भंगा (खजूर तोड़ना) और चरक पूजा पश्चिम बंगाल की आध्यात्मिक परंपरा है। जिसे पंखाजूर में भी मनाया जाता है। चैत्र महीने के अंतिम दिन चरक पूजा होती है। पिछले 42 सालों से इंद्रप्रस्थ गांव के लोग चरक पूजा करते आ रहे हैं। यह शिव आराधना अलग धार्मिक पृष्ठभूमि मान्यता से सराबोर होती है। पूर्वजों की मान्यता को आज भी पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित करते बंग बंधु नजर आते है।
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चैत्र माह में नंगे पैर रहकर मांगते हैं भिक्षा
मान्यता है कि, सबसे पहले भगवान शिव ने ही अपने अंशों से सभी देवी-देवताओं को जन्म दिया था। भगवान शिव को देवो के देव महादेव कहा जाता है। भगवान शिव रूप की उपासना से सभी देवी-देवताओं की पूजा का फल मिलता है। इसलिए बंग समुदाय में शिव भगवान के पूजा के प्रति गहरी आस्था है। चैत्र महीने में भगवान शिव और पार्वती के वस्त्र धारणकर भक्त भीषण गर्मी में नंगे पैर पर चलते है। घरों-दुकानों में जाकर भिक्षा मांगते हैं। इसी माह के अंतिम दिन विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन होता है। 



शिव जी को प्रसन्न करने करते हैं विशेष आराधना
जानकार लक्ष्मण विश्वास बताते है चैत्र महीना बंग समुदाय के कैलेंडर का आखिरी महीना होता है। उसके बाद वैसाख महीना से बंग समुदाय के नव वर्ष का आगाज होता है। इसलिए साल के आखिरी चैत्र महीना के पहले दिन से ही बंग समुदाय के लोग शिव भगवान को प्रसन्न करने के लिए विशेष आराधना करते है। इसमें पूरे एक माह तक नंगे पैर गेरुआ वस्त्र धारण कर कठोर तपस्वी जीवन यापन किया जाता है। यहां तक कि भिक्षा मांगकर एक पहर का शाकाहार भोजन करते हैं और शिवलिंग पर जलाभिषेक करते हैं। 

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