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छत्तीसगढ़ में आधार कार्ड के बिना जमानत के बाद भी रिहाई नहीं

Mon, 22 Jan 2018 08:00 PM IST
बीबीसी, हिन्दी
बीबीसी, हिन्दी Updated Mon, 22 Jan 2018 08:00 PM IST
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In Chhattisgarh jails prisoner released on bail only after Aadhaar card verification
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट - फोटो : highcourt.cg.gov.in
छत्तीसगढ़ के बस्तर में एक आदिवासी को जमानत मिलने के बाद भी जेल से रिहाई नहीं मिल सकी। वजह - उसके आधार कार्ड का सत्यापन नहीं हो पाया। कुछ हफ्ते पहले का मामला होता तो इस शख्स को जमानत मिलने के साथ ही रिहाई मिल जाती, लेकिन हाल ही में बनाए गए नियम के बाद ऐसा नहीं हो सका।
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छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने बीते दिनों जमानत के बाद रिहाई के लिए आधार कार्ड को जरूरी बना दिया है। अदालत ने कहा था कि राज्य में किसी भी मामले में जमानत मिलने पर जेल में बंद व्यक्ति और उसकी जमानत देने वाले शख्स के आधार कार्ड ले लिए जाएंगे। एक हफ्ते के भीतर उनका सत्यापन होगा और उसके बाद ही जमानत पर रिहाई हो सकेगी।
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छत्तीसगढ़ की जेलों में इस फैसले के बाद से काफी उलझन का माहौल है। कहीं अभियुक्त के पास आधार कार्ड नहीं है, तो कहीं जमानत देने वाले के पास। और जिन मामलों में दोनों के आधार कार्ड हैं वहां कई स्तरों पर होने वाला सत्यापन टेढ़ी खीर बना हुआ है।
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नतीजा - जमानत मिलने के बाद भी कई लोग जेल में ही पड़े हुए हैं। 

जानकारों ने उठाए फैसले पर सवाल

देश की कई योजनाओं के लिए आधार कार्ड को जरूरी बनाने के खिलाफ अभियान चला रहीं अर्थशास्त्री रीतिका खेड़ा हाईकोर्ट के इस आदेश से हैरान हैं।

रीतिका कहती हैं, "जमानत देते वक्त आधार की क्या भूमिका है? इसका एक ही जवाब है कि सरकार लोगों की 360 डिग्री प्रोफाइल तैयार करना चाहती है। जैसे-जैसे आधार का दायरा बढ़ रहा है, बैंक, फोन, एयरपोर्ट, अमेजन सब इसे मांगने लगे हैं। सरकार एक ही नंबर से जान जाएगी कि कौन किसकी जमानत दे रहा है, किससे बात कर रहा है, कहां आता-जाता है, कौन सी किताबें पढ़ता है। यह सब लोकतंत्र के लिए खतरे के संकेत हैं।" 

'हाईकोर्ट का निर्देश व्यावहारिक और विधिसम्मत नहीं'

In Chhattisgarh jails prisoner released on bail only after Aadhaar card verification
आधार कार्ड
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के अधिवक्ता सतीश वर्मा बताते हैं कि भारतीय कानून के हिसाब से जमानत मिलने के बाद किसी को एक मिनट भी जेल में नहीं रखा जा सकता। लेकिन नए नियम के बाद मामला बदल गया है। इसके अलावा पुलिस और राजस्व विभाग के अधिकारियों से सत्यापन करवाना भी आसान नहीं है।

"आधार कार्ड का सत्यापन लंबी प्रक्रिया है। सवाल यह है कि इस प्रक्रिया के दौरान कोई अभियुक्त जितने दिन जेल में रहेगा, उसकी भरपाई किस रूप में होगी? उसके लिए कौन जिम्मेदार होगा?" एडवोकेट वर्मा कहते हैं।

'यह निर्देश व्यावहारिक नहीं है'

छत्तीसगढ़ स्टेट बार काउंसिल के अध्यक्ष प्रभाकर सिंह चंदेल ने हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को एक पत्र लिखकर कहा है कि हाईकोर्ट का निर्देश व्यावहारिक और विधिसम्मत नहीं है।

प्रभाकर चंदेल के मुताबिक "अभियुक्त की ओर से सक्षम जमानत मिलते ही वह रिहाई का पात्र हो जाता है। यह विडंबना है कि जारी निर्देश का पालन करने से अभियुक्त कानून के दिए गए रिहाई के अधिकार से वंचित हो रहा है।"

साथ ही चंदेल ने अपने पत्र को पुनर्विचार याचिका मानने का भी अनुरोध किया है।

दुर्ग जिले के एक वकील पीयूष भाटिया ने भी हाईकोर्ट के इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है जिस पर सुनवाई होनी बाकी है।
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