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सात फेरे न होने से विवाह अमान्य नहीं: हाईकोर्ट ने खारिज की पति की याचिका, फेसबुक पर दोस्ती के बाद हुई थी शादी
Sat, 17 Oct 2026 04:11 PM IST
अमन कोशले
अमर उजाला नेटवर्क, बिलासपुर
अमर उजाला नेटवर्क, बिलासपुर
Published by: अमन कोशले
Updated Sat, 17 Oct 2026 04:11 PM IST
सार
हाईकोर्ट ने सात फेरे न होने की दलील देकर विवाह शून्य घोषित कराने की पति की याचिका खारिज कर दी। अदालत ने हिंदू विवाह अधिनियम की धाराओं का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि केवल रस्मों के विवाद से विवाह अमान्य नहीं हो जाता।
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छत्तीसग़ढ हाईकोर्ट
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने विवाह में सात फेरे न होने का तर्क देकर शादी को शून्य घोषित कराने की पति की याचिका को खारिज कर दिया है। न्यायमूर्ति पार्थ प्रतीम साहू और न्यायमूर्ति सुषमा सावंत की पीठ ने स्पष्ट किया कि केवल रस्मों या सप्तपदी के न होने से हिंदू विवाह अधिनियम के तहत विवाह अमान्य नहीं हो जाता। उच्च न्यायालय ने इस मामले में परिवार अदालत के फैसले को निरस्त करते हुए पति की मूल याचिका भी खारिज कर दी।
शिव मंदिर में की थी शादी, दस्तावेज भी बनाए
यह मामला जांजगीर-चांपा जिले के राहौद क्षेत्र के युवक और युवती से जुड़ा है। दोनों की पहचान सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म फेसबुक के जरिये हुई थी। इसके बाद दोनों के बीच प्रेम संबंध बन गए और उन्होंने शादी करने का निर्णय लिया। युवक ने युवती के परिजनों से मुलाकात के दौरान कहा था कि वह शादी से पहले दोनों परिवारों की सहमति लेगा। हालांकि बाद में 3 फरवरी, 2022 को चिरमिरी स्थित शिव मंदिर में दोनों का विवाह हुआ और विवाह से जुड़े दस्तावेज भी तैयार करा लिए गए।
मंदिर में विवाह और जबरन शादी का आरोप
विवाह के कुछ समय बाद दोनों के बीच मतभेद उत्पन्न हो गए, जिसके बाद युवक ने विवाह को मानने से इन्कार कर दिया। युवक ने आरोप लगाया कि युवती के परिजनों ने उसे अपने घर बुलाकर शादी करने का दबाव बनाया था। उसने दावा किया कि आपराधिक मामले में फंसाने की धमकी देकर उससे शादी के कागजातों पर हस्ताक्षर करवाए गए और चिरमिरी के शिव मंदिर में जल्दबाजी में विवाह कराया गया।
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युवक की दलील-सप्तपदी नहीं हुई थी
युवक ने अपनी याचिका में कहा कि विवाह के समय हिंदू रीति-रिवाज के अनुसार अग्नि के सामने सात फेरे लेने यानी सप्तपदी की रस्म पूरी नहीं हुई थी। युवक का तर्क था कि सात फेरे न होने के कारण विवाह वैध नहीं है। उसने विवाह को शून्य घोषित कराने के लिए हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 11 के तहत परिवार अदालत में अर्जी दाखिल की थी।
भरण-पोषण से बचने के दावे पर सुनवाई
दूसरी ओर, युवती ने पति के सभी आरोपों को खारिज करते हुए अपनी बात रखी। युवती का कहना था कि उनका विवाह संपूर्ण हिंदू रीति-रिवाज से पूरा हुआ था। विवाह के बाद पति ने उसे पत्नी के रूप में स्वीकार किया था और दोनों लगभग डेढ़ महीने तक साथ रहे थे।
युवती ने आरोप लगाया कि पति केवल भरण-पोषण की कानूनी जिम्मेदारी से बचने के लिए विवाह को शून्य घोषित कराने का प्रयास कर रहा है। परिवार अदालत ने केवल सात फेरे न होने के आधार पर विवाह को अमान्य मानने से इन्कार कर दिया था और युवक की अर्जी खारिज कर दी थी। इसके बाद युवक ने उच्च न्यायालय का रुख किया।
केवल रस्मों के विवाद पर विवाह शून्य नहीं
उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 5, धारा 7 और धारा 11 के प्रावधानों का सूक्ष्म विश्लेषण किया। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि अधिनियम की धारा 7 के अनुसार हिंदू विवाह रीति-रिवाजों और परंपराओं के अनुसार आयोजित होता है। यदि परंपरा में सप्तपदी शामिल है, तो सातवां कदम पूरा होने पर ही विवाह पूर्ण माना जाता है।
अदालत ने कहा कि अधिनियम की धारा 11 के तहत विवाह को शून्य घोषित करने के आधार अत्यंत सीमित हैं। विवाह केवल तभी शून्य घोषित हो सकता है जब धारा 5 की अनिवार्य शर्तों का उल्लंघन हुआ हो। केवल रस्मों के विवाद पर धारा 11 के तहत विवाह शून्य नहीं हो सकता।
परिवार अदालत का फैसला निरस्त
उच्च न्यायालय ने पाया कि परिवार अदालत ने कानूनी शर्तों के बजाय केवल रस्मों के विवाद पर फैसला सुना दिया था। इस कानूनी त्रुटि के कारण उच्च न्यायालय ने परिवार अदालत का फैसला निरस्त कर दिया। हालांकि, इससे युवक को कोई राहत नहीं मिली और उच्च न्यायालय ने पति की मूल याचिका भी खारिज कर दी।
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शिव मंदिर में की थी शादी, दस्तावेज भी बनाए
यह मामला जांजगीर-चांपा जिले के राहौद क्षेत्र के युवक और युवती से जुड़ा है। दोनों की पहचान सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म फेसबुक के जरिये हुई थी। इसके बाद दोनों के बीच प्रेम संबंध बन गए और उन्होंने शादी करने का निर्णय लिया। युवक ने युवती के परिजनों से मुलाकात के दौरान कहा था कि वह शादी से पहले दोनों परिवारों की सहमति लेगा। हालांकि बाद में 3 फरवरी, 2022 को चिरमिरी स्थित शिव मंदिर में दोनों का विवाह हुआ और विवाह से जुड़े दस्तावेज भी तैयार करा लिए गए।
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मंदिर में विवाह और जबरन शादी का आरोप
विवाह के कुछ समय बाद दोनों के बीच मतभेद उत्पन्न हो गए, जिसके बाद युवक ने विवाह को मानने से इन्कार कर दिया। युवक ने आरोप लगाया कि युवती के परिजनों ने उसे अपने घर बुलाकर शादी करने का दबाव बनाया था। उसने दावा किया कि आपराधिक मामले में फंसाने की धमकी देकर उससे शादी के कागजातों पर हस्ताक्षर करवाए गए और चिरमिरी के शिव मंदिर में जल्दबाजी में विवाह कराया गया।
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युवक की दलील-सप्तपदी नहीं हुई थी
युवक ने अपनी याचिका में कहा कि विवाह के समय हिंदू रीति-रिवाज के अनुसार अग्नि के सामने सात फेरे लेने यानी सप्तपदी की रस्म पूरी नहीं हुई थी। युवक का तर्क था कि सात फेरे न होने के कारण विवाह वैध नहीं है। उसने विवाह को शून्य घोषित कराने के लिए हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 11 के तहत परिवार अदालत में अर्जी दाखिल की थी।
भरण-पोषण से बचने के दावे पर सुनवाई
दूसरी ओर, युवती ने पति के सभी आरोपों को खारिज करते हुए अपनी बात रखी। युवती का कहना था कि उनका विवाह संपूर्ण हिंदू रीति-रिवाज से पूरा हुआ था। विवाह के बाद पति ने उसे पत्नी के रूप में स्वीकार किया था और दोनों लगभग डेढ़ महीने तक साथ रहे थे।
युवती ने आरोप लगाया कि पति केवल भरण-पोषण की कानूनी जिम्मेदारी से बचने के लिए विवाह को शून्य घोषित कराने का प्रयास कर रहा है। परिवार अदालत ने केवल सात फेरे न होने के आधार पर विवाह को अमान्य मानने से इन्कार कर दिया था और युवक की अर्जी खारिज कर दी थी। इसके बाद युवक ने उच्च न्यायालय का रुख किया।
केवल रस्मों के विवाद पर विवाह शून्य नहीं
उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 5, धारा 7 और धारा 11 के प्रावधानों का सूक्ष्म विश्लेषण किया। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि अधिनियम की धारा 7 के अनुसार हिंदू विवाह रीति-रिवाजों और परंपराओं के अनुसार आयोजित होता है। यदि परंपरा में सप्तपदी शामिल है, तो सातवां कदम पूरा होने पर ही विवाह पूर्ण माना जाता है।
अदालत ने कहा कि अधिनियम की धारा 11 के तहत विवाह को शून्य घोषित करने के आधार अत्यंत सीमित हैं। विवाह केवल तभी शून्य घोषित हो सकता है जब धारा 5 की अनिवार्य शर्तों का उल्लंघन हुआ हो। केवल रस्मों के विवाद पर धारा 11 के तहत विवाह शून्य नहीं हो सकता।
परिवार अदालत का फैसला निरस्त
उच्च न्यायालय ने पाया कि परिवार अदालत ने कानूनी शर्तों के बजाय केवल रस्मों के विवाद पर फैसला सुना दिया था। इस कानूनी त्रुटि के कारण उच्च न्यायालय ने परिवार अदालत का फैसला निरस्त कर दिया। हालांकि, इससे युवक को कोई राहत नहीं मिली और उच्च न्यायालय ने पति की मूल याचिका भी खारिज कर दी।