कैसे की गई अरबों की काली कमाई, पढ़िए परत दर परत
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छत्तीसगढ़ के नान घोटाले को परत दर परत देखेंगे तो आपका दिमाग भन्ना जाएगा। राज्य के नागरिक आपूर्ति निगम अधिकारियों और कर्मचारियों ने धान से चावल बनने तक की प्रकिया में सैंकड़ों करोड़ रुपए डकार लिए। ये रुपए हजार करोड़ में भी हो सकते हैं। घोटाले की रकम पाने वाले में मुख्यमंत्री रमन सिंह के करीबी भी शामिल हैं।
इस मामले में अभी तक नौ अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया गया है। नान घोटाले के आरोपों में घिरे अधिकारी-कर्मचारियों के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति का मामला दर्ज कर नोटिस भी जारी किया गया है। पिछले दिनों सामने आए इस घोटाले में छापेमारी के दौरान नान के कई अधिकारियों के ठिकानों से तकरीबन सात करोड़ से अधिक की संपत्ति जब्त की गई थी।
बहरहाल आपको बताते हैं कि नान घोटाला कैसे किया गया? घोटालेबाजों ने सरकार को चूना लगाने के लिए क्या तरीका अपनाया?
मिलर्स के पंजीयन से शुरु होता है रिश्वत का खेल
दरअसल छत्तीसगढ़ में नागरिक आपूर्ति विभाग (नान) जनवितरण प्रणाली (पीडीएस) के खाद्यान्नों की आपूर्ति करता है। नान को चावल की आपूर्ति राज्य के पंजीकृत राइस मिलर्स करते हैं, जिन्हें धान मार्कफेड से मिलता है। छत्तीसगढ़ में लगभग 1800 सहकारी समितियों से धान खरीदा जाता है।
ये समितियां किसान से धान इकट्ठा कर स्टेट को-ऑपरेटिव मार्केटिंग फेडरेशन (मार्कफेड) को देती हैं। मार्कफेड वह धान राइस मिलर्स को देता है। और यहीं से शुरू होता है काली कमाई का काला खेल। धान उन्हीं राइस मिलर्स को दिया जाता है, जिनका पंजीयन खाद्य विभाग के पास होता है।
राइस मिलर्स को मिलिंग की अनुमति लेने के लिए खाद्य विभाग के अधिकारी को प्रति क्विंटल तीन रुपए के रुपए में देना होता है। ये किसी प्रकार शुल्क नहीं होता, बल्कि रिश्वत होती है।
छत्तीसगढ़ में प्रतिवर्ष करोड़ों क्विंटल धान की मिलिंग होती है। केवल राजधानी रायपुर में हर साल 40 से 50 लाख क्विंटल धन की मिलिंग होती है। प्रति क्विंटल तीन रुपए के हिसाब से आप जोड़ सकते हैं कि मिलर्स हर साल कितनी रिश्वत देते हैं।
चावल बेचने के लिए भी देनी पड़ती है मोटी रकम
जानकारी के मुतबिक, खाद्य विभाग से मिलिंग की अनुमति लेने के बाद मिलर्स मार्कफेड के डीएमओ के पास जाता हैं। वहां मार्कफेड और मिलर्स के बीच अनुबंध होता है।
अनुबंध के बाद डीएमओ मिलर्स को डिलिवरी ऑर्डर देता है और उस संग्रहण केंद्र को पता बताता है, जहां से धान उठाना है। संग्रहण केंद्र पर मिलर्स को प्रति क्विंटल दो रुपए के हिसाब से देना होता है।
राइस मिलर्स उसके बाद उस धान का चावल बनाता है, और बेचने के लिए वापस स्टेट वेयर हाउस के गोदाम जाता है। स्टेट वेयर हाउस मे चावल डंप करने भर के लिए ही मिलर्स को दो रुपए प्रति क्विंटल देने पड़ते हैं। वहां से मिलर्स का चावल दो एजेंसियां खरीदती हैं-राज्य आपूर्ति निगम (नान), भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई)। रिश्वत का खेल यहां दो कदम और आगे बढ़ता है।
अलग-अलग एजेंसियों की अलग-अलग रिश्वत
मिलर्स को नान या एफसीआई को चावल बेचने के लिए भी रिश्वत देनी पड़ती है। नान राज्य सरकार की एजेंसी है और एफसीआई केंद्र सरकार की, इसलिए दोनों की रिश्वत का रेट भी अलग-अलग होता है। एफसीआई को प्रति क्विंटल 15 से 20 रुपए देना होता है, जबकि नान को छह से आठ रुपए।
एजेंसियों को रिश्वत देने के पीछे मिलर्स का अपना खेल है। जानकारों के मुताबिक, रिश्वत देकर मिलर्स घटिया स्तर यानी डी ग्रेड का चावल, बढ़िया यानी ए ग्रेड के चावल के रेट में बेच देते हैं। इस तरीके से वे भी मोटी कमाई कर लेते हैं।
मिलर्स से चावल खरीदने के एवज में नान के टेक्निकल असिस्टेंट या खाद्य विभाग के फूड क्वालिटी इंस्पेक्टर प्रति क्विंटल तय रकम खुद लेते हैं। उसके बाद उस रकम से दो रुपए वे खुद रख लेते है और बाकी पैसा नान के डीएमओ को भेज देते हैं।
डीएमओ अपना हिस्सा निकालकर नान के मुख्यालय के अधिकारियों को पैसा भेजा देता है। मिलर्स 40 फीसदी चावल एफसीआई को और 60 फीसदी चावल नान को बेचते हैं।