{"_id":"5d6ce46e8ebc3e93ae3f1d8f","slug":"sfs-vs-abvp-vs-nsui-vs-soi-in-punjab-university-student-council-elections-2019","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"पीयू में छात्र संघ चुनाव, 500 जादुई वोट और एसएफएस, एबीवीपी, एनएसयूआई व सोई में मुकाबला","category":{"title":"Campus","title_hn":"कैंपस ","slug":"campus"}}
पीयू में छात्र संघ चुनाव, 500 जादुई वोट और एसएफएस, एबीवीपी, एनएसयूआई व सोई में मुकाबला
Mon, 02 Sep 2019 03:14 PM IST
खुशबू गोयल
सुशील कुमार, अमर उजाला, चंडीगढ़
सुशील कुमार, अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: खुशबू गोयल
Updated Mon, 02 Sep 2019 03:14 PM IST
विज्ञापन
कैंपस में छात्राएं
- फोटो : अमर उजाला
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
पीयू छात्रसंघ चुनाव में कुछ संगठनों का गठबंधन होने से मुकाबला कड़ा हो गया है। एकतरफा जीत किसी की नजर नहीं आ रही है। हर किसी के पास बेस वोट (कार्डर वोट) लगभग 2000 के आसपास हैं, लेकिन जीत का आंकड़ा 2500 के पार जाएगा। इन्हीं 500 वोटों को अपने पक्ष में करने के लिए संगठनों ने ताकत झोंक दी है। संगठनों के थिंक टैंक अंदर ही अंदर छात्रों के बीच पैठ बनाने में जुटे हैं।
राजनीतिक पंडितों का तर्क है कि लड़ाई इस बार 400 से 500 अतिरिक्त वोट पाने की है। यह वोट जिस भी संगठन के पाले में गया तो समझो उसकी जीत पक्की है। आंकड़ों पर गौर फरमाएं तो पिछले साल एसएफएस की उम्मीदवार कनुप्रिया 2802 वोट लेकर विजेता बनी थीं। उन्हें आइसा, पीएसयू ललकार व अन्य वामपंथी दलों का साथ मिला था। दूसरे नंबर पर एबीवीपी के आशीष को 2083 वोट मिले थे। तीसरे नंबर पर सोई संगठन रहा। उसे 1997 वोट मिले थे।
इसका गठबंधन इनसो, आईएसए व हिमसू से था। चौथे नंबर पर रहने वाली एनएसयूआई को 1583 वोट मिले थे। इस बार नामांकन से पहले सभी उम्मीदवार अकेले चुनाव लड़ रहे थे, लेकिन नाम वापसी की बारी आई तो चार ही मैदान में टिके। बाकी का गठबंधन हो गया। जानकारों की मानें तो एसएफएस के पास अपने 1800 से 1900 वोट हैं। इनके साथ आइसा, पीएसयू ललकार व अन्य कुछ दल खड़े हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन
राजनीतिक पंडितों का तर्क है कि लड़ाई इस बार 400 से 500 अतिरिक्त वोट पाने की है। यह वोट जिस भी संगठन के पाले में गया तो समझो उसकी जीत पक्की है। आंकड़ों पर गौर फरमाएं तो पिछले साल एसएफएस की उम्मीदवार कनुप्रिया 2802 वोट लेकर विजेता बनी थीं। उन्हें आइसा, पीएसयू ललकार व अन्य वामपंथी दलों का साथ मिला था। दूसरे नंबर पर एबीवीपी के आशीष को 2083 वोट मिले थे। तीसरे नंबर पर सोई संगठन रहा। उसे 1997 वोट मिले थे।
विज्ञापन
इसका गठबंधन इनसो, आईएसए व हिमसू से था। चौथे नंबर पर रहने वाली एनएसयूआई को 1583 वोट मिले थे। इस बार नामांकन से पहले सभी उम्मीदवार अकेले चुनाव लड़ रहे थे, लेकिन नाम वापसी की बारी आई तो चार ही मैदान में टिके। बाकी का गठबंधन हो गया। जानकारों की मानें तो एसएफएस के पास अपने 1800 से 1900 वोट हैं। इनके साथ आइसा, पीएसयू ललकार व अन्य कुछ दल खड़े हैं।
विज्ञापन
इसी तरह एबीवीपी के अपने बेस वोटों की संख्या 1500 से 1600 है। अब उनके साथ इनसो व एचपीएसयू खड़ी है। इन संगठनों के पास भी ठीक-ठाक वोट हैं। एनएसयूआई के भी बेस वोट लगभग 1500 से 1600 के बीच हैं। इस संगठन में चार गुट हैं। यदि सभी एक जगह वोट करते हैं तो फिर परिणाम अलग होंगे। पिछले साल नंबर तीन पर रहे सोई संगठन के अपने 1200 से 1300 बेस वोट माने जा रहे हैं।
इसके अलावा इनका गठबंधन पूसू व हिमसू के साथ हुआ है। पूसू पीयू का पुराना दल है। हिमसू के पास भी पहाड़ी वोट हैं। सूत्रों का कहना है कि सभी के वोटों का गणित देंखें तो गठबंधन आदि को मिलकर लगभग 2000 से 2100 के मध्य है। यदि कुल 16138 वोटों में से 10 से 11 हजार वोट भी पड़ेंगे तो चार हिस्सों में बंटेंगे। ऐसे में जीत के लिए 2500 से अधिक वोट चाहिए।
इसके लिए हर संगठन को 400 से 500 वोटों की जरूरत होगी। उसी को पाने के लिए ताकत लगाई जा रही है। वहीं, अध्यक्ष पद उम्मीदवारों का दावा है कि उनके कार्डर वोट 2000 के पार हैं।
इसके अलावा इनका गठबंधन पूसू व हिमसू के साथ हुआ है। पूसू पीयू का पुराना दल है। हिमसू के पास भी पहाड़ी वोट हैं। सूत्रों का कहना है कि सभी के वोटों का गणित देंखें तो गठबंधन आदि को मिलकर लगभग 2000 से 2100 के मध्य है। यदि कुल 16138 वोटों में से 10 से 11 हजार वोट भी पड़ेंगे तो चार हिस्सों में बंटेंगे। ऐसे में जीत के लिए 2500 से अधिक वोट चाहिए।
इसके लिए हर संगठन को 400 से 500 वोटों की जरूरत होगी। उसी को पाने के लिए ताकत लगाई जा रही है। वहीं, अध्यक्ष पद उम्मीदवारों का दावा है कि उनके कार्डर वोट 2000 के पार हैं।
लिंग आधार पर पड़ा वोट तो दूसरे संगठनों के लिए बाधा
पीयू में सबसे अधिक लड़कियां शिक्षा ग्रहण करती हैं। 60 फीसदी वोट छात्राओं के हैं और 40 फीसदी छात्रों के। एसएफएस ने छात्रा प्रिया को उम्मीदवार बनाया है जबकि इस पद पर अन्य संगठनों ने लड़कों को उतारा है। यदि लिंग आधार पर यहां वोट पड़ा तो दूसरे संगठनों के पसीने छूट सकते हैं। हालांकि एबीवीपी ने वाइस प्रेसीडेंट पद के लिए दिव्या चोपड़ा को मैदान में उतारा है ताकि एसएफएस के लिंग फैक्टर को कम किया जा सके। जानकार बताते हैं कि लिंग आधार पर पीयू में कम ही वोट पड़ते हैं।
क्षेत्रवाद भी रहता है हावी
पीयू के छात्र संघ चुनाव में क्षेत्रवाद भी हावी रहता है। बड़ी संख्या में छात्र हिमाचल, हरियाणा व पंजाब से आते हैं। माना जाता है कि यदि कंडीडेट हिमाचल का है तो उसको सपोर्ट उस क्षेत्र के लोग करते हैं। इसी तरह हरियाणा के छात्र भी करते हैं। हालांकि वह जीत तक भले ही नहीं पहुंचे।
क्षेत्रवाद भी रहता है हावी
पीयू के छात्र संघ चुनाव में क्षेत्रवाद भी हावी रहता है। बड़ी संख्या में छात्र हिमाचल, हरियाणा व पंजाब से आते हैं। माना जाता है कि यदि कंडीडेट हिमाचल का है तो उसको सपोर्ट उस क्षेत्र के लोग करते हैं। इसी तरह हरियाणा के छात्र भी करते हैं। हालांकि वह जीत तक भले ही नहीं पहुंचे।
कुछ सीनेटर भी लगा रहे जोर
कैंपस में छात्राएं
- फोटो : अमर उजाला
पीयू के कुछ सीनेटर वहां की हर राजनीति में मठाधीशों का कार्य करते हैं। वहीं राजनीति का शुभारंभ करते हैं। छात्र संगठन भी उनके ईर्द-गिर्द घूमते हैं। बताया जाता है कि सीनेटर अपने-अपने छात्र संगठनों को चुनाव जिताने के लिए पूरी ताकत झोंके हुए हैं। हालांकि बड़े राजनीतिक माने वाले जाने सीनेटर इस बार किसी अन्य संगठन को सपोर्ट करते नजर आ रहे हैं। हालांकि उनका संगठन इस बात पर यकीन नहीं कर रहा है।
डीएवी में इनसो ने एनएसयूआई से मिलाया हाथ
पीयू के छात्र संघ चुनाव में जहां इनसो ने एबीवीपी के साथ हाथ मिलाया है, वहीं डीएवी कॉलेज के छात्र संघ चुनाव में एनएसयूआई के साथ खड़ी हुई है। इस निर्णय को लेकर छात्र असमंजस में हैं। हालांकि मामला कुर्सी पाने का है। छात्र कहते हैं कि यह राजनीति है, यहां सबकुछ संभव है।
डीएवी में इनसो ने एनएसयूआई से मिलाया हाथ
पीयू के छात्र संघ चुनाव में जहां इनसो ने एबीवीपी के साथ हाथ मिलाया है, वहीं डीएवी कॉलेज के छात्र संघ चुनाव में एनएसयूआई के साथ खड़ी हुई है। इस निर्णय को लेकर छात्र असमंजस में हैं। हालांकि मामला कुर्सी पाने का है। छात्र कहते हैं कि यह राजनीति है, यहां सबकुछ संभव है।