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पंजाब यूनिवर्सिटीः सिंडिकेट चुनाव को लेकर जोड़-तोड़ की राजनीति चरम पर, पर राह आसान नहीं
Fri, 13 Dec 2019 12:03 PM IST
खुशबू गोयल
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: खुशबू गोयल
Updated Fri, 13 Dec 2019 12:03 PM IST
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पंजाब यूनिवर्सिटी चंडीगढ़
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सिंडिकेट चुनाव को लेकर पंजाब यूनिवर्सिटी में जोड़-तोड़ की राजनीति चरम पर है। शुक्रवार को होने जा रही सिंडिकेट की बैठक के बाद स्थिति साफ हो जाएगी कि कौन-कौन से चेहरे मैदान में होंगे। दोनों ग्रुप अपने-अपने चेहरों को मैदान में उतार रहे हैं। पीयू की राजनीति की बात जब आती है तो दो-तीन लोगों के नाम ही जहन में आते हैं।
इन्हें ही चुनावी समीकरण बनाने में महारथ हासिल है। यह लोग किसी का भी गणित बिगाड़ सकते हैं। इनमें डॉ. नवदीप गोयल, अशोक गोयल और सुभाष शर्मा शामिल हैं। सुभाष शर्मा को छोड़कर बाकी दो डॉ. नवदीप गोयल और अशोक गोयल इस बार भी सिंडिकेट के चुनाव में उतर रहे हैं। वहीं इनको मात देने के लिए सुभाष ग्रुप इनकी टक्कर के प्रत्याशी तलाश रहे हैं।
सूत्रों का कहना है कि डॉ. नवदीप और अशोक गोयल के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह अपनी सीटों को बचाते हुए सिंडिकेट की 15 में से 15 सीटें अपने कब्जे में कैसे लें। वर्तमान में 15 सीटें गोयल ग्रुप के पास हैं। हालांकि इस बार 15 सीटें लाना आसान नहीं है। जबकि सुभाष ग्रुप का दावा है कि इस बार गोयल ग्रुप के पीसने छूट जाएंगे।
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इन्हें ही चुनावी समीकरण बनाने में महारथ हासिल है। यह लोग किसी का भी गणित बिगाड़ सकते हैं। इनमें डॉ. नवदीप गोयल, अशोक गोयल और सुभाष शर्मा शामिल हैं। सुभाष शर्मा को छोड़कर बाकी दो डॉ. नवदीप गोयल और अशोक गोयल इस बार भी सिंडिकेट के चुनाव में उतर रहे हैं। वहीं इनको मात देने के लिए सुभाष ग्रुप इनकी टक्कर के प्रत्याशी तलाश रहे हैं।
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सूत्रों का कहना है कि डॉ. नवदीप और अशोक गोयल के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह अपनी सीटों को बचाते हुए सिंडिकेट की 15 में से 15 सीटें अपने कब्जे में कैसे लें। वर्तमान में 15 सीटें गोयल ग्रुप के पास हैं। हालांकि इस बार 15 सीटें लाना आसान नहीं है। जबकि सुभाष ग्रुप का दावा है कि इस बार गोयल ग्रुप के पीसने छूट जाएंगे।
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कई फैकल्टी में कड़ा मुकाबला
पीयू में सिंडिकेट के चुनाव में हर साल 70 से 75 वोट सीनेटर डालते हैं। सीनेट में जिसका रुतबा अधिक होगा, उसी का पलड़ा भारी होगा। दोनों ही ग्रुपों के पास तकरीबन बराबर के वोटर हैं। आर्ट, लैंग्वेज, कंबाइंड, मेडिकल, साइंस, लॉ फैकल्टी से मेंबर चुनाव में खड़े किए जाएंगे। चुनाव में खड़े होने वाले मेंबर वहीं होंगे जो सीनेट में मेंबर हैं। कंबाइंड, मेडिकल, लैंग्वेज में मुकाबला कड़ा होगा। इसके साथ ही डीन के चुनाव में भी अपने चेहरे लाना किसी के लिए इस बार आसान नहीं।
बैठकों का दौर तेज, चल रही जोड़-तोड़
सीनेटरों को अपने पाले में लाने के लिए दोनों ही ग्रुप दिन-रात बैठकें कर रहे हैं। दावतें भी चल रही हैं। सूत्रों का कहना है कि इस बार कुछ पुराने चेहरे मैदान में नहीं उतारे जा रहे हैं। इसी कारण वह बागी बने हुए हैं और उनके रुख का पता दोनों ग्रुपों को ही नहीं लग पा रहा है कि आखिर वह किस पाले में जाएंगे। सूत्रों का कहना है कि इस बार भी गोयल ग्रुप का दबदबा है, लेकिन 15 सीटें इनकी झोली में नहीं आने वाली। पांच से सात सीटें गोयल ग्रुप के हाथ से निकल सकती हैं।
बैठकों का दौर तेज, चल रही जोड़-तोड़
सीनेटरों को अपने पाले में लाने के लिए दोनों ही ग्रुप दिन-रात बैठकें कर रहे हैं। दावतें भी चल रही हैं। सूत्रों का कहना है कि इस बार कुछ पुराने चेहरे मैदान में नहीं उतारे जा रहे हैं। इसी कारण वह बागी बने हुए हैं और उनके रुख का पता दोनों ग्रुपों को ही नहीं लग पा रहा है कि आखिर वह किस पाले में जाएंगे। सूत्रों का कहना है कि इस बार भी गोयल ग्रुप का दबदबा है, लेकिन 15 सीटें इनकी झोली में नहीं आने वाली। पांच से सात सीटें गोयल ग्रुप के हाथ से निकल सकती हैं।