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पीयू छात्र संघ चुनाव...सबसे ज्यादा बार जीतने वाली पार्टियों का गठबंधन बिना अस्तित्व नहीं
योगेंद्र त्रिपाठी, अमर उजाला, चंडीगढ़
Updated Thu, 30 Aug 2018 11:27 AM IST
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पंजाब यूनिवर्सिटी
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पंजाब यूनिवर्सिटी में सबसे अधिक बार जीतने वाले छात्र संगठनों को अब बिना राजनीतिक पार्टियों में शामिल हुए छात्र संघ चुनाव जीतना मुश्किल हो गया है। जहां पुसू ने पीयू से छात्र संघ चुनाव में 11 और सोपू ने आठ बार जीत दर्ज की है, वहीं अब एनएसयूआई, एबीवीपी, इनसो, सोई सहित अन्य राजनीतिक छात्र संगठनों के गठबंधन के बिना जीतना कालेज के पुराने छात्र संगठनों को मुश्किल हो गया है। वर्ष 2010 से बिना गठबंधन यह दल आज तक नहीं जीत पाएं हैं। इस बार छात्र संघ चुनाव को लेकर कोई स्थित साफ नहीं है। नामांकन दाखिल होने के दौरान सभी छात्र संगठनों के अलायंस का पता चल पाएगा। अभी तक पीयू में आईएसए, एचपीएसयू ने गठबंधन किया है। वहीं सोई ने प्रेसिडेंट कैंडीडेंट इकबाल प्रीत सिंह को घोषित किया गया है। इनसो की ओर से भी चुनावी पैनल की घोषणा की गई है। पुसू, सोपू, सहित अन्य बिना राजनीतिक संगठन के सपोर्ट वाले संगठनों ने कैंडिडेट नहीं घोषित किए हैं।
जसकरण ने किया था पुसू का गठन
पीयू के चुनाव में पुसू ने अब तक ऐसा एक मात्र छात्र संगठन है जिसने प्रेसिडेंट पद पर जीत के मामले में दहाई के अंक तक पहुंचने में कामयाबी हासिल की। जसकरण बराड़ ने इसका गठन किया था। पुसू ने साल 1982 में पहली बार जीत का स्वाद चखा। यह अकेला ऐसा संगठन था जिसने जीत का चौका मारा। 2002 से लेकर 2006 तक इस संगठन ने बैक टू बैक चार बार प्रेसिडेंट का चुनाव जीता। 1997 में दोबारा डायरेक्ट पद के चुनाव शुरू हुए तो पुसू ने ही जीत का परचम लहराया। अंतिम बार पुसू का प्रेसिडेंट साल 2017 में चुना गया।
डा. डीपीएस रंधावा ने रखी थी सोपू की नींव
वर्तमान सीनेटर डॉ. डीपीएस रंधावा की बनाई सोपू ने पहली बार 1997 में चुनाव जीता। इस संगठन ने अगले दो साल भी जीत का परचम लहराया। फिर 2008 और 2009 में भी जीत दर्ज की। 2011 और 2012 में लगातार दो बार विजेता बने। सोपू से 2006 में प्रेसिडेंट का चुनाव जीतने वाले दलविंदर गोल्डी एमए एमफिल किया था। फिलहाल वह विधायक हैं।
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सबसे पुरानी पीएसयू ने जीत का चौका मारा
पीयू में पहली बार प्रत्यक्ष चुनाव जीतने वाला संगठन पीएसयू था। संगठन ने 1977 में पहला चुनाव जीता। इसके बाद अगले दो साल भी लगातार जीत दर्ज की। 1981 के चुनाव में प्रेसिडेंट के पद पर संगठन ने उम्मीदवार खडे़ किए और विपक्षी एनएसएफ के राजिंदर दीपा को केवल एक वोट के अंतर से हरा दिया। एनएसयूआई तीन बार चुनाव जीत चुकी है।
पीयू में दो बार अप्रत्यक्ष चुनाव भी हुए
1977 के बाद 1983 तक डायरेक्ट चुनाव हुए। इसके बाद 1984 के दंगों के चलते 1996 तक डायरेक्ट चुनाव बंद हो गए। लेकिन दो साल अप्रत्यक्ष चुनाव हुए। 1995 में चुनाव में कुलजीत नागरा प्रेसीडेंट बने। 1997 में बिंदर सिंह चुनाव जीते।
दंगे के कारण 13 साल नहीं हुए चुनाव
सिख विरोधी दंगों के कारण पीयू में मई 1984 में होने वाले एग्जाम समय पर नहीं हो सके। दंगों का असर छात्रसंघ चुनाव पर भी पड़ा। यहां पर 1984 से 1996 तक छात्र संघ चुनाव नहीं हुए। हालांकि इससे पहले यहां पहली बार प्रत्यक्ष चुनाव छात्र संघ चुनाव वर्ष 1977 में हुए थे। चुनाव का सिलसिला 1983 तक चला। करीब 13 साल बाद पंजाब में हालात सुधरने के बाद यहां दोबारा चुनाव 1997 में शुरू हुए थे।
पिछले आठ साल का चुनावी गणित
वर्ष 2010 में पुसू, इनसो, सोपू, एबीवीपी, एचएसए, एचपीएसयू के अलांयस पर पार्टी जीती है। 2011 में सोपू-सोई, एचपीएसए - एचएसए, पुसू-इनसो-एबीवपी ने मिलकर चुनाव जीता था। 2012 में सोपू-एचएसए-सोई-एसएफआई-पुसु-एनएसयूआई ने मिलकर गठबंधन से चुनाव जीता। 2013 में एनएसयूआई हिमसू, पुसू -इनसो-एबीवीपी ने मिलकर चुनाव जीता। 2014 में एनएसयूआई, एनएसओ का पैनल सोई-इनसो ने मिलकर चुनाव जीता। 2015 में सोई हिमसू, एनएसओ, यूथ ऑर्गेनाइजेशन ऑफ इंडिया, इनसो ने चारों सीटें जीतीं और 2016 में पुसू पीयूएचएच, एनएसयूआई स्टूडेंट्स फ्रंट, एनएसओ ने चारों सीटों पर कब्जा किया। 2017 में एनएसयूआई तीन सीटें जीती, एक सीट पुसु-पीपीएसओ-आईएसए और एनएसओ की अलायंस ने मिलकर विजेता बनी।
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जसकरण ने किया था पुसू का गठन
पीयू के चुनाव में पुसू ने अब तक ऐसा एक मात्र छात्र संगठन है जिसने प्रेसिडेंट पद पर जीत के मामले में दहाई के अंक तक पहुंचने में कामयाबी हासिल की। जसकरण बराड़ ने इसका गठन किया था। पुसू ने साल 1982 में पहली बार जीत का स्वाद चखा। यह अकेला ऐसा संगठन था जिसने जीत का चौका मारा। 2002 से लेकर 2006 तक इस संगठन ने बैक टू बैक चार बार प्रेसिडेंट का चुनाव जीता। 1997 में दोबारा डायरेक्ट पद के चुनाव शुरू हुए तो पुसू ने ही जीत का परचम लहराया। अंतिम बार पुसू का प्रेसिडेंट साल 2017 में चुना गया।
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डा. डीपीएस रंधावा ने रखी थी सोपू की नींव
वर्तमान सीनेटर डॉ. डीपीएस रंधावा की बनाई सोपू ने पहली बार 1997 में चुनाव जीता। इस संगठन ने अगले दो साल भी जीत का परचम लहराया। फिर 2008 और 2009 में भी जीत दर्ज की। 2011 और 2012 में लगातार दो बार विजेता बने। सोपू से 2006 में प्रेसिडेंट का चुनाव जीतने वाले दलविंदर गोल्डी एमए एमफिल किया था। फिलहाल वह विधायक हैं।
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सबसे पुरानी पीएसयू ने जीत का चौका मारा
पीयू में पहली बार प्रत्यक्ष चुनाव जीतने वाला संगठन पीएसयू था। संगठन ने 1977 में पहला चुनाव जीता। इसके बाद अगले दो साल भी लगातार जीत दर्ज की। 1981 के चुनाव में प्रेसिडेंट के पद पर संगठन ने उम्मीदवार खडे़ किए और विपक्षी एनएसएफ के राजिंदर दीपा को केवल एक वोट के अंतर से हरा दिया। एनएसयूआई तीन बार चुनाव जीत चुकी है।
पीयू में दो बार अप्रत्यक्ष चुनाव भी हुए
1977 के बाद 1983 तक डायरेक्ट चुनाव हुए। इसके बाद 1984 के दंगों के चलते 1996 तक डायरेक्ट चुनाव बंद हो गए। लेकिन दो साल अप्रत्यक्ष चुनाव हुए। 1995 में चुनाव में कुलजीत नागरा प्रेसीडेंट बने। 1997 में बिंदर सिंह चुनाव जीते।
दंगे के कारण 13 साल नहीं हुए चुनाव
सिख विरोधी दंगों के कारण पीयू में मई 1984 में होने वाले एग्जाम समय पर नहीं हो सके। दंगों का असर छात्रसंघ चुनाव पर भी पड़ा। यहां पर 1984 से 1996 तक छात्र संघ चुनाव नहीं हुए। हालांकि इससे पहले यहां पहली बार प्रत्यक्ष चुनाव छात्र संघ चुनाव वर्ष 1977 में हुए थे। चुनाव का सिलसिला 1983 तक चला। करीब 13 साल बाद पंजाब में हालात सुधरने के बाद यहां दोबारा चुनाव 1997 में शुरू हुए थे।
पिछले आठ साल का चुनावी गणित
वर्ष 2010 में पुसू, इनसो, सोपू, एबीवीपी, एचएसए, एचपीएसयू के अलांयस पर पार्टी जीती है। 2011 में सोपू-सोई, एचपीएसए - एचएसए, पुसू-इनसो-एबीवपी ने मिलकर चुनाव जीता था। 2012 में सोपू-एचएसए-सोई-एसएफआई-पुसु-एनएसयूआई ने मिलकर गठबंधन से चुनाव जीता। 2013 में एनएसयूआई हिमसू, पुसू -इनसो-एबीवीपी ने मिलकर चुनाव जीता। 2014 में एनएसयूआई, एनएसओ का पैनल सोई-इनसो ने मिलकर चुनाव जीता। 2015 में सोई हिमसू, एनएसओ, यूथ ऑर्गेनाइजेशन ऑफ इंडिया, इनसो ने चारों सीटें जीतीं और 2016 में पुसू पीयूएचएच, एनएसयूआई स्टूडेंट्स फ्रंट, एनएसओ ने चारों सीटों पर कब्जा किया। 2017 में एनएसयूआई तीन सीटें जीती, एक सीट पुसु-पीपीएसओ-आईएसए और एनएसओ की अलायंस ने मिलकर विजेता बनी।