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पंजाब यूनिवर्सिटी ने प्रमोशन के लिए स्क्रीनिंग के ऊपर बनाई सिंडिकेट कमेटी, शिक्षकों में फैला रोष
Thu, 05 Dec 2019 01:46 PM IST
खुशबू गोयल
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: खुशबू गोयल
Updated Thu, 05 Dec 2019 01:46 PM IST
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पंजाब यूनिवर्सिटी चंडीगढ़
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शिक्षकों के प्रमोशन के लिए बनाई गई डिपार्टमेंट स्क्रीनिंग कमेटी के ऊपर सिंडिकेट की कमेटी बना दी गई। इसे लेकर शिक्षकों में आक्रोश है। उनका आरोप है कि जब विभागीय स्क्रीनिंग कमेटी सभी कार्यों की जांच कर लेगी तो फिर सिंडिकेट की कमेटी की जरूरत क्या है। आरोप है कि स्क्रीनिंग कमेटी के बाद आवेदन जब सिंडिकेट कमेटी के पास जाएगा तो वहां फिर उतना ही समय जांच में लगेगा और इससे प्रमोशन के कार्यों में देरी होगी। कहा कि इस कार्य में पक्षपात आदि भी हो सकता है, ऐसे में कुछ शिक्षकों के फार्म अटकने की भी संभावना रहेगी।
पीयू ने असिस्टेंट प्रोफेसर व एसोसिएट प्रोफेसर के प्रमोशन यूजीसी की पुरानी गाइड लाइन के मुताबिक कर दिए। इस पर कुछ लोगों ने यह कहकर आपत्ति दायर कर दी कि नई गाइड लाइन के मुताबिक इन शिक्षकों के प्रमोशन किए जाएं, लेकिन जैसे-तैसे पुराना ही प्रस्ताव पास कर दिया गया, लेकिन उसमें एक बिंदु यह शामिल कर दिया कि सभी शिक्षकों से नए प्रमोशन पॉलिसी के मुताबिक दोबारा आवेदन करा लिया जाए। इस आवेदन की जांच विभागीय स्क्रीनिंग कमेटी से कराई जाए। सिंडिकेट में यह प्रकरण पहुंचा तो जांच के लिए सिंडिकेट ने भी एक कमेटी बना दी।
इसके बाद से शिक्षकों ने इसका विरोध शुरू कर दिया। कहा कि सिंडिकेट की कमेटी की आवश्यकता इसमें महसूस नहीं हो रही है। इससे शिक्षकों के प्रमोशन के कार्य में देरी होगी। कुछ शिक्षकों ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि सिंडिकेट की कमेटी का प्रस्ताव वापस लिया जाना चाहिए। विभागीय स्क्रीनिंग कमेटी में विशेषज्ञ होते हैं, जो बेहतर ढंग से आवेदन की जांच कर पाएंगे। सिंडिकेट की कमेटी में विशेषज्ञों का अभाव होता है, ऐसे में कई चीजों का अंदेशा लगा रहेगा। शिक्षकों का आरोप है कि हर स्क्रीनिंग की जांच जब सिंडिकेट कमेटी नहीं करती है तो फिर यहां आवश्यकता क्यों पड़ी। शिक्षकों का कहना है कि विभागीय स्क्रीनिंग कमेटी की जांच के बाद सीधे प्रमोशन के आवेदन ऑडिट विभाग में भेजे जाने चाहिए ताकि उन्हें लाभ मिल सके।
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पीयू ने असिस्टेंट प्रोफेसर व एसोसिएट प्रोफेसर के प्रमोशन यूजीसी की पुरानी गाइड लाइन के मुताबिक कर दिए। इस पर कुछ लोगों ने यह कहकर आपत्ति दायर कर दी कि नई गाइड लाइन के मुताबिक इन शिक्षकों के प्रमोशन किए जाएं, लेकिन जैसे-तैसे पुराना ही प्रस्ताव पास कर दिया गया, लेकिन उसमें एक बिंदु यह शामिल कर दिया कि सभी शिक्षकों से नए प्रमोशन पॉलिसी के मुताबिक दोबारा आवेदन करा लिया जाए। इस आवेदन की जांच विभागीय स्क्रीनिंग कमेटी से कराई जाए। सिंडिकेट में यह प्रकरण पहुंचा तो जांच के लिए सिंडिकेट ने भी एक कमेटी बना दी।
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इसके बाद से शिक्षकों ने इसका विरोध शुरू कर दिया। कहा कि सिंडिकेट की कमेटी की आवश्यकता इसमें महसूस नहीं हो रही है। इससे शिक्षकों के प्रमोशन के कार्य में देरी होगी। कुछ शिक्षकों ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि सिंडिकेट की कमेटी का प्रस्ताव वापस लिया जाना चाहिए। विभागीय स्क्रीनिंग कमेटी में विशेषज्ञ होते हैं, जो बेहतर ढंग से आवेदन की जांच कर पाएंगे। सिंडिकेट की कमेटी में विशेषज्ञों का अभाव होता है, ऐसे में कई चीजों का अंदेशा लगा रहेगा। शिक्षकों का आरोप है कि हर स्क्रीनिंग की जांच जब सिंडिकेट कमेटी नहीं करती है तो फिर यहां आवश्यकता क्यों पड़ी। शिक्षकों का कहना है कि विभागीय स्क्रीनिंग कमेटी की जांच के बाद सीधे प्रमोशन के आवेदन ऑडिट विभाग में भेजे जाने चाहिए ताकि उन्हें लाभ मिल सके।
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समय सीमा तय नहीं की
शिक्षकों के प्रमोशन के आवेदनों की स्क्रीनिंग एक माह में पूरी करके देने की तो समय सीमा निर्धारित कर दी गई, लेकिन सिंडिकेट रिव्यू कमेटी कितने दिन में काम पूरा करेगी, यह तय नहीं है।
शिक्षकों का कहना है कि सिंडिकेट के चुनाव इसी माह में हैं। ऐसे में नए या पुराने सदस्य चुनकर आएंगे। यदि सिंडिकेट कमेटी में जो नाम शामिल किए गए हैं, उसमें से कोई मेंबर चुनाव नहीं जीत पाता है तो फिर नई कमेटी बनेगी और फिर आवेदनों की जांच में देरी होती चली जाएगी।
इससे शिक्षकों को परेशानी होगी। शिक्षकों का कहना है कि वाइस चांसलर को इस मामले को गंभीरता से लेना चाहिए। जांच पर जांच नहीं करवाई जानी चाहिए। रजिस्ट्रार प्रो. करमजीत सिंह कहते हैं कि प्रमोशन की गाइड लाइन में प्रयुक्त शॉर्टली शब्द के बारे में जानकारी मांगी गई है, वहां से जवाब आने के बाद अगली कार्रवाई की जाएगी।
शिक्षकों का कहना है कि सिंडिकेट के चुनाव इसी माह में हैं। ऐसे में नए या पुराने सदस्य चुनकर आएंगे। यदि सिंडिकेट कमेटी में जो नाम शामिल किए गए हैं, उसमें से कोई मेंबर चुनाव नहीं जीत पाता है तो फिर नई कमेटी बनेगी और फिर आवेदनों की जांच में देरी होती चली जाएगी।
इससे शिक्षकों को परेशानी होगी। शिक्षकों का कहना है कि वाइस चांसलर को इस मामले को गंभीरता से लेना चाहिए। जांच पर जांच नहीं करवाई जानी चाहिए। रजिस्ट्रार प्रो. करमजीत सिंह कहते हैं कि प्रमोशन की गाइड लाइन में प्रयुक्त शॉर्टली शब्द के बारे में जानकारी मांगी गई है, वहां से जवाब आने के बाद अगली कार्रवाई की जाएगी।