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पेक फेस्ट का रंगारंग समापन, स्टूडेंट्स ने वेस्टर्न डांस से मचाया धमाल
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़
Updated Mon, 10 Oct 2016 09:11 PM IST
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पेक फेस्ट का रंगारंग समापन
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पेक यूनिवर्सिटी ऑफ टेकनोलॉजी में चल रहे तीन दिवसीय यूथ फेस्टिवल का सोमवार को रंगारंग समापन हुआ, जिसमें स्टूडेंट्स ने जबरदस्त वेस्टर्न डांस पेश किए। फेस्ट के आखिरी दिन नुक्कड़ नाटक, स्टैंड अप कॉमेडी, अंताक्षरी और वेस्टर्न डांस की प्रतियोगिताएं हुई। फेस्टिवल के अंतिम दिन पेक के आर्ट एंड फोटोग्राफी क्लब की ओर से आर्ट प्रदर्शनी का भी आयोजन किया गया। जिसमें पेक स्टूडेंट्स द्वारा खींची गई फोटोग्राफ के साथ-साथ पॉट पेंटिंग और हैंडीक्राफ्ट्स को शामिल किया गया।
ऑडिटोरियम उस समय खचाखच भर गया जब स्टूडेंट्स को हॉकी में तीन बार ओलंपिक गोल्डमेडलिस्ट रह चुके सरदार बलबीर सिंह के आने के बारे में पता चला। 92 वर्षीय सरदार बलबीर सिंह ने कार्यक्रम में जहां अपने हॉकी के दिनों को स्टूडेंट्स के साथ साझा किया वहीं उनके सवालों के जवाब भी दिए। स्वास्थ्य ठीक न होने के बावजूद भी वह फेस्ट में शामिल होने आए। अपने बचपन की यादों को ताजा करते हुए वह बताते हैं कि पढ़ने में मैं ज्यादा होशियार नहीं था। खेल कूद में मेरा लगाव शुरू से ही था।
पिता फ्रीडम फाइटर थे और माता गृहणी थी वह ज्यादा पढ़ी लिखी नहीं थी, लेकिन उनकी हिंदी बहुत अच्छी थी। वह ब्लैक बोर्ड पर चॉक के जरिए लिखती थी। उनकी लिखावट प्रिंटेड शब्दों की तरह होती थी। इस तरह उनके हाथों का जादू जो ब्लैक बोर्ड पर दिखता था मेरी हॉकी स्टिक पर दिखना शुरू हो गया। आज मैं जो भी हूं उनकी बदौलत हूं। सरदार बलबीर सिंह को 1957 में पदमश्री से सम्मानित किया गया था। उनका जन्म पंजाब के जिला जालंधर के हरिपुर गांव में हुआ था। उन्होंने 1948 में पहली बार लंडन ओलंपिक गेम्स में इंडिया को रिप्रजेंट किया था।
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ऑडिटोरियम उस समय खचाखच भर गया जब स्टूडेंट्स को हॉकी में तीन बार ओलंपिक गोल्डमेडलिस्ट रह चुके सरदार बलबीर सिंह के आने के बारे में पता चला। 92 वर्षीय सरदार बलबीर सिंह ने कार्यक्रम में जहां अपने हॉकी के दिनों को स्टूडेंट्स के साथ साझा किया वहीं उनके सवालों के जवाब भी दिए। स्वास्थ्य ठीक न होने के बावजूद भी वह फेस्ट में शामिल होने आए। अपने बचपन की यादों को ताजा करते हुए वह बताते हैं कि पढ़ने में मैं ज्यादा होशियार नहीं था। खेल कूद में मेरा लगाव शुरू से ही था।
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पिता फ्रीडम फाइटर थे और माता गृहणी थी वह ज्यादा पढ़ी लिखी नहीं थी, लेकिन उनकी हिंदी बहुत अच्छी थी। वह ब्लैक बोर्ड पर चॉक के जरिए लिखती थी। उनकी लिखावट प्रिंटेड शब्दों की तरह होती थी। इस तरह उनके हाथों का जादू जो ब्लैक बोर्ड पर दिखता था मेरी हॉकी स्टिक पर दिखना शुरू हो गया। आज मैं जो भी हूं उनकी बदौलत हूं। सरदार बलबीर सिंह को 1957 में पदमश्री से सम्मानित किया गया था। उनका जन्म पंजाब के जिला जालंधर के हरिपुर गांव में हुआ था। उन्होंने 1948 में पहली बार लंडन ओलंपिक गेम्स में इंडिया को रिप्रजेंट किया था।
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