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खुलासाः राज्यों के दबाव में पिछड़े शहरों की सूची में शामिल हुए कई जिले, तो नहीं होगा विकास
सुशील कुमार, अमर उजाला, चंडीगढ़
Updated Sun, 07 Oct 2018 04:15 PM IST
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पंजाब विश्वविद्यालय (पीयू) में भूगोल विभाग की ओर से आयोजित नेशनल सेमिनार में चौंकाने वाली बात सामने आई है। नीति आयोग की ओर से देश के जिन 117 जिलों को कायाकल्प के लिए चुना गया है, वह राजनीतिक दबाव में चुने गए हैं। देशभर के प्रोफेसरों ने माना है कि विकास के नाम पर राजनीतिक दबाव गलत है। ऐसा करने से विकास की कल्पना दूर हो जाती है। यह भी निष्कर्ष निकला है कि हरियाणा का मेवात गांव धार्मिक व सांस्कृतिक उलझन के कारण विकास नहीं कर पा रहा है। यह गांव गुरुग्राम व फरीदाबाद के मध्य फंस गया है। इसके लिए नए रास्ते तलाशने होंगे।
बता दें कि नीति आयोग की ओर से देश के 117 जिलों का चयन पिछड़े जिलों के रूप में किया गया था। यह भी विशेषज्ञों को बताना था कि कहीं यह जनपद राजनीतिक दबाव में तो चयनित नहीं हुए। आंकड़ों के आधार पर विशेषज्ञों ने सब कुछ साफ कर दिया। कहा कि उड़ीसा सरकार के दबाव में नोपांडा व नवरंग जिले का नाम और सूची में जोड़ा गया। सूची में पहले से शामिल धीनकलान जनपद का नाम काटने की बात कही गई। हालांकि यह काटा नहीं गया। राजस्थान में बाड़मेर जिले का नाम काटने की पहले सिफारिश हुई और उसी के साथ बारा जनपद का नाम और जोड़ दिया गया।
हिमालय दस राज्यों को छूता है। इस क्षेत्र के कई अधिक पिछड़े जनपदों का चयन किया जाना चाहिए था लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इसके अलावा शहरों में भी इलाके पिछड़े हैं उनको भी विकास की दौड़ में शामिल किया जाना चाहिए था। कहा कि सरकारों ने राजनीतिक दबाव बनाकर गलत किया है। इससे देश का विकास पिछड़ता जाएगा।
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ये आए निर्णय
- संबंधित राज्य विश्वविद्यालयों के रिसर्च स्कॉलरों को पिछड़े गांवों से जोड़ा जाए।
- जिलों के विकास के लिए उद्योगपतियों की मदद ली जाए।
- 100 छात्रों को उस जनपद को शैक्षिक दृष्टि से गोद दिया जाए।
- शिक्षकों से पढ़ाई के अलावा कोई अन्य कार्य न लिया जाए।
- एजूकेशन, हेल्थ, इन्फ्रास्ट्रक्चर सेक्टर को मजबूत करना होगा।
- राजनीतिक दबाव को खत्म करना होगा।
- नीति बनाने वाले अधिकारी स्वतंत्र होने चाहिए।
- भौगोलिक आंकड़ों को ध्यान में रखते हुए ही योजनाएं बनाई जाएं।
कुछ राज्यों ने राजनीतिक दबाव बनाकर उन जिलों को भी सूची में शामिल करवा दिया जो अधिक पिछड़े हुए नहीं थे। कई अधिक पिछड़े जनपद सूची में शामिल नहीं हो पाए हैं। यह पूरी रिपोर्ट नीति आयोग को भेजी जाएगी।
- प्रो. कृष्ण मोहन, सेमिनार कन्वीनर
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बता दें कि नीति आयोग की ओर से देश के 117 जिलों का चयन पिछड़े जिलों के रूप में किया गया था। यह भी विशेषज्ञों को बताना था कि कहीं यह जनपद राजनीतिक दबाव में तो चयनित नहीं हुए। आंकड़ों के आधार पर विशेषज्ञों ने सब कुछ साफ कर दिया। कहा कि उड़ीसा सरकार के दबाव में नोपांडा व नवरंग जिले का नाम और सूची में जोड़ा गया। सूची में पहले से शामिल धीनकलान जनपद का नाम काटने की बात कही गई। हालांकि यह काटा नहीं गया। राजस्थान में बाड़मेर जिले का नाम काटने की पहले सिफारिश हुई और उसी के साथ बारा जनपद का नाम और जोड़ दिया गया।
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हिमालय दस राज्यों को छूता है। इस क्षेत्र के कई अधिक पिछड़े जनपदों का चयन किया जाना चाहिए था लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इसके अलावा शहरों में भी इलाके पिछड़े हैं उनको भी विकास की दौड़ में शामिल किया जाना चाहिए था। कहा कि सरकारों ने राजनीतिक दबाव बनाकर गलत किया है। इससे देश का विकास पिछड़ता जाएगा।
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ये आए निर्णय
- संबंधित राज्य विश्वविद्यालयों के रिसर्च स्कॉलरों को पिछड़े गांवों से जोड़ा जाए।
- जिलों के विकास के लिए उद्योगपतियों की मदद ली जाए।
- 100 छात्रों को उस जनपद को शैक्षिक दृष्टि से गोद दिया जाए।
- शिक्षकों से पढ़ाई के अलावा कोई अन्य कार्य न लिया जाए।
- एजूकेशन, हेल्थ, इन्फ्रास्ट्रक्चर सेक्टर को मजबूत करना होगा।
- राजनीतिक दबाव को खत्म करना होगा।
- नीति बनाने वाले अधिकारी स्वतंत्र होने चाहिए।
- भौगोलिक आंकड़ों को ध्यान में रखते हुए ही योजनाएं बनाई जाएं।
कुछ राज्यों ने राजनीतिक दबाव बनाकर उन जिलों को भी सूची में शामिल करवा दिया जो अधिक पिछड़े हुए नहीं थे। कई अधिक पिछड़े जनपद सूची में शामिल नहीं हो पाए हैं। यह पूरी रिपोर्ट नीति आयोग को भेजी जाएगी।
- प्रो. कृष्ण मोहन, सेमिनार कन्वीनर