पीयू सीनेट चुनाव : एक-एक सीट जीतने के लिए हो रही मारामारी, मनोनीत सदस्यों की संख्या पर टिकी नजरें
कुल सदस्यों की संख्या में से दस सदस्य ऐसे हैं जो पदेन होते हैं, जो कभी आते हैं तो कभी नहीं। ऐसे में कुल सदस्य 80 से 81 मानकर चला जाता है।
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चंडीगढ़ के पंजाब विश्वविद्यालय सीनेट चुनाव में इस बार एक-एक सीट जीतने के लिए मारामारी है। गोयल ग्रुप व सुभाष ग्रुप ने सीनेट में अपना दबदबा कायम करने के लिए पूरी ताकत झोंक दी है। अब तक सीनेट में गोयल ग्रुप का दबदबा रहा है। सीनेट में कुल सदस्यों की संख्या 91 है।
कुल सदस्यों की संख्या में से दस सदस्य ऐसे हैं जो पदेन होते हैं, जो कभी आते हैं तो कभी नहीं। ऐसे में कुल सदस्य 80 से 81 मानकर चला जाता है। इन सदस्यों में से अकेले गोयल ग्रुप के पास 45 सीटों से अधिक रही हैं। हालांकि यह संख्या कुछ मनोनीत सदस्यों के जरिए भी बढ़ती रही है, क्योंकि चांसलर कार्यालय से सदस्यों का मनोनयन होता है। इस बार मनोनयन के जरिए गोयल ग्रुप के खाते में सीटों की संख्या कम आती नजर आ रही हैं।
माना जाता है कि केंद्र में जिसकी सरकार होती है, उसी के सदस्य मनोनीत होते हैं। हालांकि यह नियम नहीं है। इस तरह गोयल ग्रुप को इस बार चुनाव के जरिए आने वाली सीटों की ओर ध्यान देना होगा। उनका पूरा ग्रुप स्नातक वर्ग की 15 सीटें, पीयू कैंपस की दस सीटें और कॉलेजों की 15 सीटों पर काम कर रहा है। हर सीट पर गोयल ग्रुप अपना कब्जा जमाता है तो फिर उनकी सरकार सीनेट में बन सकती है।
मनोनीत सदस्यों की संख्या पर टिका सुभाष ग्रुप का गणित
वहीं सुभाष ग्रुप पिछले तीन सालों से सीनेट में अधिक सक्रिय है। उन्होंने मुद्दों को करीब से उठाया और अपने पक्ष में माहौल बनाने की कोशिश की। काफी हद तक वह सफल भी रहे। बताया जाता है कि उनकी रणनीति के कारण ही डीएवी ग्रुप ने उनसे हाथ मिलाया था। डीएवी ग्रुप के पास अकेले 10 सीटें होती हैं जो अपने आप में काफी हैं।
सुभाष ग्रुप इस बार भी दिग्गज खिलाड़ियों के साथ मैदान में उतरा है। वह चुनाव भी लड़ेंगे और दूसरा चांसलर कार्यालय से अधिकतर मनोनीत सदस्य अपने लेकर आएंगे। मनोनीत सदस्यों की संख्या 32 है। ऐसे में यदि पूरे सदस्य सुभाष ग्रुप के मनोनीत होकर आते हैं तो उससे उन्हें लाभ मिल सकता है। इस बार लड़ाई एकतरफा नहीं है, क्योंकि मनोनीत सदस्यों को लेकर सुभाष ग्रुप का पलड़ा भारी है। वहीं गोयल ग्रुप स्नातक, पीयू कैंपस व कॉलेजों की सीटों पर अपना प्रभाव रखता है। इस तरह सीनेट में बहुमत बनाने में एक या दो ही सीटों का अंतर रहेगा।