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चिंता मनी-41: वेतनभोगी कर्मचारी होना अच्छा है या कंसल्टेन्ट होना?
Mon, 28 Sep 2020 01:39 AM IST
योगेश साहू
नारायण कृष्णमूर्ति, आर्थिक सलाहकार
नारायण कृष्णमूर्ति, आर्थिक सलाहकार
Published by: योगेश साहू
Updated Mon, 28 Sep 2020 01:39 AM IST
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- फोटो : pixabay
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बुलंदशहर के विक्रम रावत को इस बात की खुशी है कि कोविड-19 के संकट के बीच भी उनके बेटे जगत को नौकरी मिल गई। लेकिन कंपनी द्वारा बेटे को ऑफर किए गए वेतन के ढांचे से वह चिंतित हैं। उन्हें लगता है कि कंसल्टेन्ट की तुलना में वेतनभोगी कर्मचारी होना ज्यादा अच्छा है। वह जानना चाहते हैं कि इनमें से क्या बेहतर है।
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पिता का मानना है कि कंसल्टेन्ट के बजाय अगर बेटे को वेतनभोगी कर्मचारी के तौर पर नियुक्ति दी जाती, तो वह ज्यादा सुरक्षित होती। बावजूद इसके कि वेतनभोगी की तुलना में बतौर कंसल्टेन्ट काम करना टैक्स बचत के लिहाज से लाभकारी है। कंपनियां कर्मचारियों की नियुक्ति ज्यादातर वेतनभोगी के तौर पर करती है, लेकिन कई बार वे कंसल्टेन्ट के तौर पर भी नौकरी देती हैं। दोनों ही तरह की नौकरियों के लाभ और नुकसान हैं।
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वेतनभोगी और कंसल्टेन्ट
वेतनभोगी कर्मचारी के तौर पर आपको पीएफ, ग्रेच्युटी और एचआरए की सुविधाएं मिलती हैं, तो नियोक्ता आपके आयकर की गणना कर, आयकर काटकर आपको वेतन देता है। जबकि कंसल्टेन्ट के वेतन का ढांचा बहुत सरल होता है। आपके लिए जितना वेतन तय किया गया है, उसका 10 फीसदी या वेतन ज्यादा होने पर 10 फीसदी से अधिक टीडीएस काटा जाता है। अब आयकर बचाना आप पर निर्भर करता है।
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उदाहरण के लिए, सालाना आठ लाख के पैकेज या मासिक 66,666 रुपये का वेतन होने पर कंसल्टेन्ट के रूप में आपके हाथ में वेतनभोगी कर्मचारी की तुलना में ज्यादा पैसा आएगा। ऐसी स्थिति में कंसल्टेन्ट पीएफ की जगह एनपीएस (नेशनल पेंशन स्कीम) में निवेश कर सकते हैं। आप अपने कामकाज में होने वाले खर्च, जैसे-परिवहन या किसी गजट की खरीद या दूसरे मद में खर्च दिखाकर भी आयकर जिम्मेदारी को कम कर सकते हैं।
यह मत समझें कि कंसल्टेन्ट होने का मतलब आयकर से बचना है। बल्कि आयकर की धारा 80सी के तहत आप भी वेतनभोगी कर्मचारी की तरह टैक्स छूट का लाभ ले सकते हैं। होम लोन के मूलधन और ब्याज की अदायगी पर कंसल्टेन्ट को भी टैक्स छूट का लाभ मिलता है।
दूसरा पक्ष
वेतनभोगी कर्मचारियों के लिए आयकर सीधा और स्पष्ट होता है-नियोक्ता ही आपका टैक्स काटता है और अगर आपकी आय का अतिरिक्त स्रोत नहीं है, तो टैक्स फाइलिंग की जिम्मेदारी भी नियोक्ता की ही है। लेकिन अगर आप कंसल्टेन्ट हैं, तो आयकर से संबंधित तमाम जिम्मेदारियां आपकी हैं।
आपको अपने खर्च, बिल और टैक्स बचत पर खुद ही नजर रखनी होती है, जिसके लिए किसी पेशेवर की मदद की जरूरत भी पड़ सकती है। सालाना आय 20 लाख से अधिक होने पर आप जीएसटी के दायरे में भी आ जाएंगे। कुल मिलाकर, कंसल्टेन्ट के तौर पर अपनी बचत और अपने निवेश से संबंधित योजना बनाते हुए आप लचीलेपन का परिचय दे सकते हैं।
हालांकि जहां तक बैंक से कर्ज लेने का सवाल है, तो कंसल्टेन्ट को वेतनभोगी कर्मचारी की तुलना में कम वरीयता मिलती है। कुछ कंपनियां कर्मचारियों को कांट्रेक्ट पर भी रखती हैं, और कांट्रेक्ट एक तय अवधि का होता है। कांट्रेक्ट वाली नौकरी भी कंसल्टेन्ट जैसी ही होती है, क्योंकि उसमें भी वेतन के तौर पर निश्चित राशि मिलती है।
विक्रम रावत को अपने बेटे के प्रति चिंतित नहीं होना चाहिए। चूंकि उनके बेटे की उम्र अभी कम है, ऐसे में, कंसल्टेन्ट के तौर पर कम उम्र में ही अपनी बचत और निवेश की योजना बनाना उसके लिए अच्छा होगा। चूंकि पीएफ पर ब्याज दर कम है, ऐसे में, उनका बेटा बचत और निवेश के दूसरे स्मार्ट माध्यम खुद ही ढूंढ लेगा। याद रखें कि वेतनभोगी या कंसल्टेन्ट होने से रोजगार की गारंटी पर कोई फर्क नहीं पड़ता।