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ब्याज दर कटौती मामला : सरकार संजीदा होती तो यू-टर्न से बच सकती थी
Fri, 02 Apr 2021 06:41 AM IST
Jeet Kumar
अमर उजाला रिसर्च टीम, नई दिल्ली।
अमर उजाला रिसर्च टीम, नई दिल्ली।
Published by: Jeet Kumar
Updated Fri, 02 Apr 2021 06:41 AM IST
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सार
- छोटी योजनाओं पर ब्याज दरें तय करने का निश्चित फार्मूला होता है, जो सरकार की सुरक्षा और दूसरे मानकों पर आधारित होता है।
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निर्मला सीतारमण (फाइल फोटो)
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PTI
विस्तार
छोटी बचत योजनाओं पर फैसला वापस लेने को भले ही ‘अप्रैल फूल’ से जोड़ा जा रहा हो, पर अगर वित्त मंत्रालय संजीदगी से फैसला लेता, तो यू-टर्न से बचा जा सकता था। विशेषज्ञ मानते हैं, छोटी बचतों पर ब्याज दर तय करते समय सरकार अर्थव्यवस्था में तेजी और छोटे निवेशकों के हितों की सुरक्षा देने के असमंजस में रहती है।
बाजार आधारित दरों से तुलना करें तो सरकारी योजनाओं पर ब्याज दर ज्यादा है, जो सामूहिक रूप से दरें कम करने में बाधक है। छोटी योजनाओं पर ब्याज दरें तय करने का निश्चित फार्मूला होता है, जो सरकार की सुरक्षा और दूसरे मानकों पर आधारित होता है।
मामूली कटौती पर्याप्त
विशेषज्ञ मानते हैं, मामूली कटौती से सरकार संवेदनशील मुद्दे पर फजीहत से बच सकती थी। वरिष्ठ नागरिकों व छोटे निवेशकों के हितों का ख्याल भी विकास जितना ही जरूरी है।
- छोटी बचत में सबसे बड़ा योगदान पीपीएफ (45.87%) का है। इसके बाद हैं, सीनियर सिटीजन सेविंग (19.73%), किसान विकास पत्र (15.56%) और एनएस टाइम डिपॉजिट अकाउंट (12.42%)।
- भारत में पश्चिमी देशों की तरह मजबूत सामाजिक सुरक्षा ढांचा नहीं है, इसलिए सरकार को छोटी योजनाओं के ब्याज को मुद्रास्फीति से जोड़ना होगा।
पहले भी वापस लिया गया था कटौती का फैसला
वैसे ब्याज दरों में कटौती का फैसला वापस लेने का यह पहला मामला नहीं है। सरकार ने 16 मार्च 2016 को छोटी योजनाओं में बड़ी कटौती की घोषणा की थी। तब भी पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल, पुडुचेरी और असम में विधानसभा चुनाव थे।
योजनाओं में 1.5 प्रतिशत तक कमी की गई थी। इस कटौती की गणना 2011 की श्यामला गोपीनाथ समिति की सिफारिशों पर की थी। तत्कालीन वित्तमंत्री अरुण जेटली ने फैसले की पूर्व सूचना न होने पर आपत्ति जताई और अगले ही दिन इसे वापस ले लिया था। 18 मार्च को नई अधिसूचना से ब्याज दरों की घोषणा हुई थी।
इनमें बचत खाते की दरों में कटौती नहीं की गई थी जबकि एक वर्ष के सावधि जमा की दर 8.4 प्रतिशत से घटाकर पर 7.1 और पीपीएफ की ब्याज दर 8.7 से घटाकर 8.1 की गई थी। इसी घटना के बाद वित्त मंत्रालय में एक अघोषित नियम बना दिया गया था कि छोटी बचत योजनाओं ब्याज दरों में कटौती की घोषणा पर वित्तमंत्री की सहमति अवश्य होनी चाहिए।
योजनाओं में 1.5 प्रतिशत तक कमी की गई थी। इस कटौती की गणना 2011 की श्यामला गोपीनाथ समिति की सिफारिशों पर की थी। तत्कालीन वित्तमंत्री अरुण जेटली ने फैसले की पूर्व सूचना न होने पर आपत्ति जताई और अगले ही दिन इसे वापस ले लिया था। 18 मार्च को नई अधिसूचना से ब्याज दरों की घोषणा हुई थी।
इनमें बचत खाते की दरों में कटौती नहीं की गई थी जबकि एक वर्ष के सावधि जमा की दर 8.4 प्रतिशत से घटाकर पर 7.1 और पीपीएफ की ब्याज दर 8.7 से घटाकर 8.1 की गई थी। इसी घटना के बाद वित्त मंत्रालय में एक अघोषित नियम बना दिया गया था कि छोटी बचत योजनाओं ब्याज दरों में कटौती की घोषणा पर वित्तमंत्री की सहमति अवश्य होनी चाहिए।