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कपड़ा उद्योग में एमएसपी लाने की तैयारी, चीनी मिलों की तरह लागू होगी व्यवस्था
बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Updated Thu, 31 May 2018 11:31 AM IST
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केंद्रीय कृषि मंत्रालय कपास और जूट की खरीद पर कपड़ा उद्योग से किसानों को अनिवार्य तौर पर न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) मुहैया कराने के विकल्प विचार कर रहा है। यह कदम किसानों को उत्पादन में आए खर्च और मेहनत पर 50 फीसदी फायदा देने के सरकार के वायदे के मद्देनजर उठाया जा सकता है, जो कपड़ा उद्योग के लिए परेशानी का सबब बन सकता है।
कपड़ा मिलों के लिए ऐसा प्रस्ताव चीनी मिलों पर लागू व्यवस्था की तर्ज पर लाया जा सकता है। किसानों को किया वायदा पूरा करने के लिए सरकार को कपास के एमएसपी में मौजूदा स्तर से 2018-19 में कम से कम 28 फीसदी की वृद्धि करनी होगी।
कपास, जूट के लिए दो विकल्प
एक अधिकारी के मुताबिक, कपास और जूट के लिए दो विकल्प हैं। पहला यह कि भारतीय कपास निगम (सीसीआई) और जूट निगम को देशभर में एमएसपी पर दो फसलों को खरीदना पड़ेगा और बाद में वह इसे खुले बाजार में बेचे।
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जबकि दूसरा, सभी मिलों को एमएसपी में अनिवार्य तौर पर इनकी खरीद करने को कहा जाए और बदले में कुछ प्रोत्साहन दिया जाए। यह विचार ऐसे समय आया है, जब कपड़ा उत्पादन में लगातार 11 महीने से गिरावट जारी है। यही नहीं, निर्यात के लिए अप्रैल में सात माह के लिए अनुबंध किया गया है। वर्ष 2017-18 में परिधान उत्पादन में 11 फीसदी गिरावट आई और निर्यात में लगभग 4 फीसदी की कमी आई, भले ही देश का कुल व्यापार निर्यात 9.8 फीसदी बढ़ गया।
विरोध में कपड़ा मंत्रालय
उत्पादकों, औद्योगिक उपभोक्ताओं और निर्यात के हितों के बीच संतुलन बनाने के लिए कपड़ा मंत्रालय पहले से इस विचार के विरोध में है, जबकि कृषि मंत्रालय ने उससे अभी इस पर कोई राय नहीं मांगी है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह विचार पूरी तरह से अव्यावहारिक है और उद्योग के लिए बहुत हानिकारक है।
इस तरह की व्यवस्था ने चीनी क्षेत्र में वृद्धि को रोक दिया। बीते एक दशक में मिलों में विस्तार क्षमता नहीं बची और मौजूदा समय 22,000 करोड़ रुपये से अधिक का गन्ना बकाया है। चीनी चुनिंदा राज्यों में संचालित है, जबकि कपास ज्यादातर राज्यों में उगाया जाता है। ऐसे में हजारों कपड़ा इकाइयों, जिनमें ज्यादातर सूक्ष्म एवं लघु हैं, उन पर इसके तहत अनुपालन मुश्किल होगा।
गौरतलब है कि सीसीआई और नाफेड एमएसपी पर बाजार से कपास खरीदते हैं। यह खरीद कीमतों के ज्यादा नीचे जाने पर किसानों को नुकसान से बचाने के लिए की जाती है। इसके बाद वे स्टॉक मिलों या अन्य थोक उपभोक्ताओं को बेचे जाते हैं। इसमें नुकसान की भरपाई सरकार द्वारा की जाती है।
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कपड़ा मिलों के लिए ऐसा प्रस्ताव चीनी मिलों पर लागू व्यवस्था की तर्ज पर लाया जा सकता है। किसानों को किया वायदा पूरा करने के लिए सरकार को कपास के एमएसपी में मौजूदा स्तर से 2018-19 में कम से कम 28 फीसदी की वृद्धि करनी होगी।
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कपास, जूट के लिए दो विकल्प
एक अधिकारी के मुताबिक, कपास और जूट के लिए दो विकल्प हैं। पहला यह कि भारतीय कपास निगम (सीसीआई) और जूट निगम को देशभर में एमएसपी पर दो फसलों को खरीदना पड़ेगा और बाद में वह इसे खुले बाजार में बेचे।
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जबकि दूसरा, सभी मिलों को एमएसपी में अनिवार्य तौर पर इनकी खरीद करने को कहा जाए और बदले में कुछ प्रोत्साहन दिया जाए। यह विचार ऐसे समय आया है, जब कपड़ा उत्पादन में लगातार 11 महीने से गिरावट जारी है। यही नहीं, निर्यात के लिए अप्रैल में सात माह के लिए अनुबंध किया गया है। वर्ष 2017-18 में परिधान उत्पादन में 11 फीसदी गिरावट आई और निर्यात में लगभग 4 फीसदी की कमी आई, भले ही देश का कुल व्यापार निर्यात 9.8 फीसदी बढ़ गया।
विरोध में कपड़ा मंत्रालय
उत्पादकों, औद्योगिक उपभोक्ताओं और निर्यात के हितों के बीच संतुलन बनाने के लिए कपड़ा मंत्रालय पहले से इस विचार के विरोध में है, जबकि कृषि मंत्रालय ने उससे अभी इस पर कोई राय नहीं मांगी है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह विचार पूरी तरह से अव्यावहारिक है और उद्योग के लिए बहुत हानिकारक है।
इस तरह की व्यवस्था ने चीनी क्षेत्र में वृद्धि को रोक दिया। बीते एक दशक में मिलों में विस्तार क्षमता नहीं बची और मौजूदा समय 22,000 करोड़ रुपये से अधिक का गन्ना बकाया है। चीनी चुनिंदा राज्यों में संचालित है, जबकि कपास ज्यादातर राज्यों में उगाया जाता है। ऐसे में हजारों कपड़ा इकाइयों, जिनमें ज्यादातर सूक्ष्म एवं लघु हैं, उन पर इसके तहत अनुपालन मुश्किल होगा।
गौरतलब है कि सीसीआई और नाफेड एमएसपी पर बाजार से कपास खरीदते हैं। यह खरीद कीमतों के ज्यादा नीचे जाने पर किसानों को नुकसान से बचाने के लिए की जाती है। इसके बाद वे स्टॉक मिलों या अन्य थोक उपभोक्ताओं को बेचे जाते हैं। इसमें नुकसान की भरपाई सरकार द्वारा की जाती है।