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ग्लोबल वार्मिंग से छह फीसदी घटेगा गेंहू का उत्पादन, भारत पर भी पड़ेगा असर

Wed, 22 May 2019 05:12 PM IST
New Delhi Published by: paliwal पालीवाल Updated Wed, 22 May 2019 05:12 PM IST
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wheat production to be down by six percent due to global warming, will affect india also
गेहूं की खरीद - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो
आने वाले सालों में ग्लोबल वार्मिंग का असर खेती पर भी पड़ने की संभावना है। इससे खाद्य उत्पादन में कमी देखने को मिलेगी। सबसे ज्यादा असर गेंहू की खेती पर पड़ेगा, जिसका उत्पादन छह फीसदी तक गिर सकता है। 
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एक वैश्विक रिपोर्ट के अनुसार कृषि क्षेत्र में ग्लोबल वार्मिंग का असर तेजी से बढ़ता जा रहा है। यह रिपोर्ट एक अमेरिकी जर्नल नेचर क्लाइमेंट चेंज ने जारी की है। जर्नल के मुताबिक  ग्लोबल वॉर्मिंग के चलते जहां 1 डिग्री सेल्सियस तापमान बढ़ने की बात कही जा रही है, वहीं इसके परिणामस्वरूप गेहूं की पैदावार 4.1 से 6.4 फीसदी तक कम होने के पूरे संकेत हैं। 
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70 करोड़ टन गेंहू का उत्पादन

पूरी दुनिया में 70 करोड़ टन गेंहू का उत्पादन होता है। अगर पांच फीसदी की गिरावट ही होती है तो भी 3.5 करोड़ टन उत्पादन घट जाएगा। भारत में वर्ष 2018-19 में गेहूं का उत्पादन 9.9 करोड़ टन रहा, जो कि पिछले सत्र के मुकाबले गहन खेती के चलते 20 लाख टन ज्यादा रहा।
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महंगा हो जाएगा भारत में गेंहू

भारत में उत्पादन घटने से गेंहू काफी महंगा हो जाएगा। लोगों को इसे खरीदने के लिए ज्यादा पैसा खर्च करना पड़ेगा। रिपोर्ट के अनुसार पूरी दुनिया में रोजाना 240 ग्राम खाद्यान्न प्रति व्यक्ति खर्च होता है। एक व्यक्ति को दो वक्त के लिए पाव भर अनाज पर्याप्त।

नौ अरब दुनिया की जनसंख्या होने का अनुमान है 2050 तक। वर्तमान उत्पादन 2050 की जरूरत से भी ज्यादा है। संयुक्त राष्ट्र संघ की एजेंसी ने कहा है कि 40 फीसदी अनाज दुनिया के विकसित देशों में नष्ट हो जाता है। इस वक्त 10 करोड़ हैक्टेयर कृषि भूमि का रकबा है चीन के पास, जबकि भारत के पास 14 से 15 करोड़ हैक्टेयर कृषि भूमि है।

कमी का विज्ञान

फसलों की बुआई के समय मॉइश्चर जरूरी है। ऐसे में यदि तापमान बढ़ता है तो इसका बुआई पर असर पड़ना तय है। तापमान बढ़ने के कारण सूखा पड़ने की आंशका भी बढ़ जाएगी। इससे उत्पादकता में कमी आ रही है।

तापमान बढ़ता रहा तो फसलें समय से पहले पकनी शुरू हो जाएंगी। फसलों को पकने का पूरा समय नहीं मिलेगा। गर्मी, सर्दी और बारिश का पैटर्न बदल रहा है। भारत में भी फरवरी मार्च में ओले पड़ने लगे हैं। इससे फसल खराब हो रही है।

पानी का स्तर नीचे जा रहा है। जमीन तो सूख ही रही है, सिंचाई के पानी की भी समस्या आ रही है। बाढ़ के मामले बढ़ने से बुआई और कटाई प्रभावित हो रही है। समुद्र स्तर बढ़ने से तटीय इलाकों में खेती मुश्किल हो जाएगी।

फसलों में लगने वाले कीड़े भी बढ़ेंगे। नमी के कारण वायरल और बैक्टीरियल इंफेक्शन भी होंगे। बीते 100 साल में पृथ्वी का औसत तापमान 0.8 डिग्री सेल्सियस बढ़ा। इस तापमान का 0.6 डिग्री सेल्सियस तो पिछले तीन दशकों में ही बढ़ा है।


उपग्रह से प्राप्त आंकड़े बताते हैं कि पिछले कुछ दशकों में समुद्र के जल स्तर में सालाना 3 मिलीमीटर की बढ़ोतरी हुई है। सालाना 4 प्रतिशत की रफ्तार से ग्लेशियर पिघल रहे हैं।
 
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