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बड़ा सवाल: ड्रैगन को कैसे देंगे कड़ी टक्कर? देश अभी भी 90 फीसदी कच्चे माल के लिए चीन पर है निर्भर

Fri, 12 Mar 2021 06:02 PM IST
Harendra Chaudhary अमित शर्मा, अमर उजाला, नई दिल्ली
अमित शर्मा, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Harendra Chaudhary Updated Fri, 12 Mar 2021 06:02 PM IST
सार

देश में ज्यादातर फोन के पार्ट्स विदेश से मंगवाए जा रहे हैं और यहां केवल उनकी असेंबलिंग का काम किया जा रहा है। इन्हें भी मेड इन इंडिया कहकर बेचा जाता है।

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The quad countries India, Australia, Japan and the US may take decisions to reduce the increasing dependence on China import
भारत स्थित Xiaomi का प्लांट - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

क्वाड देश (भारत, आस्ट्रेलिया, जापान और अमेरिका) शुक्रवार को कच्चे सामानों के मामले में चीन पर बढ़ती निर्भरता को कम करने पर कुछ ठोस फैसला कर सकते हैं। लेकिन आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि कच्चे माल के लिए चीन पर निर्भरता कम करना इतनी जल्दी संभव नहीं होगा, क्योंकि देश के अनेक उद्योग चीन आयातित कच्चे माल पर ही निर्भर हैं। भारी उद्योगों में 60 से 90 फीसदी तक, इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के अलग-अलग क्षेत्रों में 60 से 95 फीसदी तक, सोलर उपकरणों में लगभग पूरी तरह और स्मार्टफोन के पार्ट्स के मामलों में 95 फीसदी पार्ट्स के लिए देश चीन पर निर्भर है। ऐसे में अचानक लिया गया कोई फैसला देश के विकास को प्रभावित कर सकता है।

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ग्रैंडव्यू रिसर्च में टेक्नॉलोजी एनालिस्ट मधुमिता चौधरी ने अमर उजाला को बताया कि वर्ष 2019 में देश में स्मार्टफोन और फीचर फोन मिलाकर कुल 22 करोड़ फोन की बिक्री हुई। वर्ष 2020 में कोरोना के कारण पूरी दुनिया के बाजार लंबे समय तक बंद रहे। देश में भी लंबे समय तक लॉकडाउन लागू रहा। माना जा रहा था कि इससे कुल फोनों की ब्रिक्री के मामले में कमी आ सकती है। लेकिन इस दौरान बच्चों की शिक्षा जारी रखने के लिए ऑनलाइन सिस्टम का सहारा लिया गया। इसके कारण कोरोना काल में स्मार्टफोन की बिक्री में खूब बढ़ोतरी हुई और कुल फोनों की ब्रिक्री बढ़कर 23.1 करोड़ तक जा पहुंची।

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लेकिन फिर भी पिछड़ गया देश

भारत के दुनिया में दूसरे नंबर पर फोन निर्माता देश होने का दावा किया जा रहा है। लेकिन देश में ज्यादातर फोन के पार्ट्स विदेश से मंगवाए जा रहे हैं और यहां केवल उनकी असेंबलिंग का काम किया जा रहा है। इन्हें भी मेड इन इंडिया कहकर बेचा जाता है। 2020 में देश में बिके कुल फोनों में आयातित फोनों का हिस्सा लगभग 97 फीसदी रहा है। यानी देसी कंपनियां भारतीय बाजार की कुल फोन जरूरतों का केवल तीन फीसदी हिस्सा ही उपलब्ध करा पाईं।

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95 फीसदी उपकरणों का आयात चीन से

कहा जााता है कि केंद्र सरकार ने अघोषित तौर पर चीन से कच्चे सामान के आयात को हतोत्साहित करने का निर्णय ले रखा है, लेकिन स्मार्टफोन के निर्माण में लग रहे कुल उपकरणों का 95 फीसदी हिस्सा आज भी चीन से ही मंगाया जा रहा है। शेष पार्ट्स अमेरिका, नॉर्थ कोरिया, साउथ कोरिया, जापान और जर्मनी जैसे देशों से मंगया जा रहा है।

सोलर उपकरणों में लगभग पूरी तरह चीन पर निर्भर

ऊर्जा विभाग के पूर्व सचिव अजय शंकर के मुताबिक देश तेजी से ऊर्जा जरूरतों के लिए सौर ऊर्जा को अपना रहा है। लेकिन इस उद्योग की पूरी निर्भरता चीन पर टिकी हुई है। सोलर ऊर्जा के पैनल से लेकर बैटरी जैसे अहम पार्ट्स चीन से आयात किए जाते हैं। अगर देश को लंबे समय तक ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनना है, तो इसके लिए देश को उच्च गुणवत्ता का सोलर पैनल और बैटरी बनाने की क्षमता हासिल करनी होगी। इसके लिए दीर्घकालिक रणनीति की आवश्यकता होगी। देश अचानक इन उपकरणों के आयात को रोकने का जोखिम नहीं उठा सकता।

इलेक्ट्रॉनिक बाजार पूरी तरह चीन पर निर्भर

दिल्ली का भगीरथ पैलेस इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की बिक्री के मामले में अहम स्थान रखता है। यहां के इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के व्यापारी कमल जैन ने अमर उजाला को बताया कि लंबे समय से देसी इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के इस्तेमाल को बढ़ावा देने की बात कही जा रही है। लेकिन सच्चाई यह है कि आज भी बाजार में 80 फीसदी से ज्यादा सामान चीन आयातित है। भारतीय इलेक्ट्रॉनिक आइटम्स की गुणवत्ता, तकनीक कमजोर होने के साथ-साथ वे महंगी भी हैं, लिहाजा ग्राहक चीनी इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की ही मांग करते हैं।



भारतीय व्यापार मंडल के महासचिव वीके बंसल ने कहा कि चीन से लद्दाख में हुए टकराव के बाद ग्राहक भारतीय उत्पादों की मांग अवश्य कर रहे हैं जो एक बड़ा बदलाव है। लेकिन ग्राहकों की इस सोच का असली लाभ तभी उठाया जा सकेगा जब भारतीय उत्पादों की कीमतें अंतरराष्ट्रीय स्तर की होंगी, क्योंकि आज का ग्राहक गुणवत्ता के मामले में कोई समझौता नहीं करना चाहता। अगर सरकार इन क्षेत्रों में देश को आत्मनिर्भर बनाना चाहती है तो इसके लिए भारतीय निर्माताओं को तकनीकी और वित्तीय मदद देनी होगी जिससे वे गुणवत्ता और कीमतों के मामलों में चीनी सामानों के सामने टिक सकें।

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