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कर्ज का जाल: पेट्रोल-डीजल को मोहताज श्रीलंका, जानें क्या होता है दिवालियापन और किन बड़े देशों ने झेला ये दंश
Tue, 22 Feb 2022 02:30 PM IST
दीपक चतुर्वेदी
बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: दीपक चतुर्वेदी
Updated Tue, 22 Feb 2022 02:30 PM IST
सार
More Than 80 countries Have Gone Bankrupt: श्रीलंका सरकार ने सोमवार को स्वीकार किया कि उसके पास ईंधन खरीदने तक के लिए नकदी खत्म हो चुकी है और देश के ज्यादातर पेट्रोल पंपों पर ईंधन समाप्त हो गया है। गौरतलब है कि विदेशी मुद्रा संकट की वजह से इस द्वीपीय देश की अर्थव्यवस्था की हालत काफी खराब हो चुकी है और देश दिवालिया होने की कगार पर पहुंच चुका है।
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दिवालिया होने दी कगार पर श्रीलंका
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
कहते हैं कर्ज का फंदा ऐसा होता है जिससे जितनी दूरी रहे उतना ही अच्छा। इसका नया उदाहरण है श्रीलंका, जो कि चीन के कर्ज के जाल में ऐसा फंसा कि लगभग पूरी तरह से कंगाल हो चुका है। हालात ये हैं कि श्रीलंका सरकार ने सोमवार को खुद स्वीकार किया कि उसके पास ईंधन खरीदने तक के लिए नकदी खत्म हो चुकी है और देश के ज्यादातर पेट्रोल पंपों पर ईंधन समाप्त हो गया है।
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दिवालिया होने की कगार पर पहुंचा
श्रीलंका में स्थिति को देखकर ये कहना गलत न होगा कि श्रीलंका दिवालिया होने की कगार पर पहुंच चुका है। गौरतलब है कि विदेशी मुद्रा संकट की वजह से इस द्वीपीय देश की अर्थव्यवस्था की हालत काफी खराब हो चुकी है। देश की आर्थिक स्थिति इस कदर खराब हो चुकी है कि ईंधन की दो खेपों के भुगतान की राशि भी उसके पास नहीं है। बीते हफ्ते श्रीलंका की सरकारी रिफाइनरी सीलोन पेट्रोलियम कॉरपोरेशन (सीपीसी) ने भी कहा था कि उसके पास विदेशों से आपूर्ति खरीदने के लिए नकदी नहीं है। बता दें कि श्रीलंका ईंधन के लिए मुख्य रूप से आयात पर निर्भर है। आज विदेशी मुद्रा संकट की वजह से श्रीलंका का ऊर्जा क्षेत्र बुरी तरह प्रभावित हुआ है।
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चीनी कर्ज के जाल में बुरी तरह फंसा
बता दें कि श्रीलंका की आज जो स्थिति हो चुकी है उसका कारण कर्ज है। देश के इस हालात के लिए विदेशी कर्ज खासकर चीन से लिया गया कर्ज जिम्मेदार है। चीन का श्रीलंका पर 5 अरब डॉलर से अधिक कर्ज है। पिछले साल उसने देश में वित्तीय संकट से उबरने के लिए चीन से और 1 अरब डॉलर का कर्ज लिया था। अगले 12 महीनों में देश को घरेलू और विदेशी लोन के भुगतान के लिए करीब 7.3 अरब डॉलर की जरूरत है। नवंबर तक देश में विदेशी मुद्रा का भंडार महज 1.6 अरब डॉलर था। सरकार को घरेलू लोन और विदेशी बॉन्ड्स का भुगतान करने के लिए पैसा छापना पड़ रहा है और दूसरे देशों से कर्ज की गुहार लगानी पड़ रही है।
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80 से ज्यादा देश हो चुके दिवालिया
दिवालिया होने की कहानी नई बिल्कुल भी नहीं है। पूर्व में आई एक रिपोर्ट की मानें तो पिछली दो शताब्दी के भीतर दुनिया के 83 देश दिवालिया हो चुके हैं। इस सूची में कई विकसित देश भी शामिल हैं, जिनके पास दुनिया की सबसे बड़ी इकोनॉमी है। अमेरिका, जर्मनी, जापान और ब्रिटेन ऐसे बड़े देश हैं जो दिवालियापन का शिकार हो चुके हैं। बता दें कि किसी देश के दिवालिया होने पर उसका बेसिक सिस्टम बिगड़ जाता है। पॉवर कंपनियां अपना ऑपरेशन रोक कर देती हैं, तो वहीं गैस और पेट्रोल स्टेशन बंद कर दिए जाते हैं। इसके अलावा बैंकों पर ताले लटक जाते हें, तो वहीं सरकारी कर्मचारियों की सैलरी रोक दी जाती है।
दिवालिया होना क्या होता है?
विशेषज्ञों के अनुसार, किसी देश का दिवालिया होने का मतलब है कि आपकी क्रेडिट रेटिंग लगातार खराब हो रही हो. जैसे अभी श्रीलंका के साथ हो रहा है। अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों का उस देश से भरोसा उठ जाता है और कर्जदाता कर्ज अदायगी की तारीख बढ़ाने से इनकार कर देते हैं। दिवालिया होने पर देश का सबसे बड़ा नुकसान ये होता है कि बाजार में उसकी साख खत्म हो जाती है। उसकी हालत को सुधारने के लिए कोई भी दूसरा देश मदद कर पैसे लगाने से डरता है। साफ शब्दों में कहें तो देश की अगर क्रेडिट रेटिंग खराब होगी, तो कोई भी उसे कर्ज देने के लिए कोई तैयार नहीं होगा।
विदेशी मुद्रा इसलिए है जरूरी
किसी भी अर्थव्यवस्था में विदेशी मुद्रा का अहम रोल होता है। विदेशी मुद्रा से मतलब दरअसल, खासतौर से अमेरिकी डॉलर से होता है। अंतरराष्ट्रीय व्यापार में डॉलर और यूरो काफी लोकप्रिय और स्वीकार्य हैं। दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों में जो विदेशी मुद्रा भंडार होता है, उनमें 64 फीसदी अमेरिकी डॉलर होते हैं। ऐसे में डॉलर को ही वैश्विक मुद्रा माना जाता है। इंटरनेशनल स्टैंडर्ड ऑर्गेनाइजेशन सूची को देखें तो दुनियाभर में कुल 185 करेंसी चलन में हैं. हालांकि, इनमें से ज्यादातर मुद्राओं का इस्तेमाल देश के भीतर ही होता है। डॉलर की बात करें तो दुनिया भर का 85 फीसदी के करीब व्यापार डॉलर में ही होता है। इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय क़र्ज भी डॉलर में ही दिए जाते हैं।
विदेशी मुद्रा कम होने का असर
डॉलर की तुलना में किसी देश की राष्ट्रीय मुद्रा कितनी मजबूत है, यह इस पर भी निर्भर करता है कि उस देश के विदेशी मुद्रा भंडार में कितने डॉलर है। विशेषज्ञों के अनुसार, एक्सचेंज रेट को काबू में रखने के लिए विदेशी मुद्रा भंडार का संतुलित होना सबसे अहम होता है। अगर किसी देश की मुद्रा की कीमत गिरने लगती है तो विदेशी मुद्रा भंडार से डॉलर मार्केट में डाला जाता है ताकि एक्सचेंज रेट ज्यादा ना बढ़ सके। विदेशी मुद्रा खत्म होने के चलते कोई देश जरूरी सामान का आयात करने में भी विफल रहता है। 1991 में भारत ने भी इस स्थिति का सामना किया था। जून 1991 में देश का विदेशी मुद्रा भंडार लगभग खत्म हो चुका था। आज उसी स्थिति से श्रीलंका गुजर रहा है।
श्रीलंका के हालात बदतर
एक रिपोर्ट के अनुसार, 1991 में भारत की जो स्थिति थी वही आज श्रीलंका की है। हालांकि, भारत इससे उबर गया था, लेकिन श्रीलंका के लिए इस समस्या से निजात पाना मुश्किल होता जा रहा है। यहां बीते कुछ महीनों में खाद्य सामग्रियों की कीमत में 20 फीसदी तक बढ़ गए है। पिछले दिनों आई एक रिपोर्ट में कहा गया था कि श्रीलंका में 100 ग्राम हरी मिर्च का दाम 71 श्रीलंकाई रुपये, आलू का भाव 200 रुपये किलो पहुंच गया। इसमें बताया गया कि 2019 के अंत में श्रीलंका का विदेशी मुद्रा भंडार 7.6 अरब डॉलर था। 2020 की शुरुआत से ही श्रीलंकाई रुपया दबाव में था। 2020 के अंत तक श्रीलंका का विदेशी मुद्रा भंडार घटकर 5.7 अरब डॉलर तक पहुंच गया और 2021 के नवंबर महीने में यह 1.6 अरब डॉलर रह गया।
ग्रीस और अर्जेटीना का रहा बुरा हाल
दुनिया की सबसे बड़ी इकोनॉमी वाला देश अमेरिका एक-दो बार नहीं बल्कि 5 बार दिवालियापन की चपेट में आ चुका है। पहली बार विदेशी कर्जा न दे पाने के कारण इसे दिवालिया घोषित किया गया था। तो वहीं चार बार अंदरुनी कर्जे में डूबने से अमेरिका को यह दंश झेलना पड़ा। अमेरिका के बाद दुनिया की सबसे बड़ी इकोनॉमी में शामिल ब्रिटेन 4 बार दिवालिया घोषित हो चुका है। इसके अलावा ग्रीस को साल 2015 में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष को 12 हजार करोड़ रुपये न चुका पाने के कारण दिवालिया घोषित कर दिया गया। लातिन अमेरिकी देश अर्जेंटीना साल 2000 से 2020 के बीच दो बार डिफॉल्टर हो चुका है। इसके अलावा 1998 में रूस, 2003 में उरुग्वे, 2005 में डोमिनिकन रिपब्लिक भी दिवालिया घोषित हो चुके हैं।
सबसे ज्यादा बार दिवालिया हुए ये देश
- वेनेजुएला 11 बार
- इक्वाडोर 10 बार
- ब्राजील 9 बार
- चिली 9 बार
- कोस्टा रिका 9 बार
- स्पेन 8 बार
- जर्मनी 8 बार
- अमेरिका 5 बार
- ब्रिटेन 4 बार