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Crude: क्या पश्चिम एशिया में तनाव भारत के कच्चे तेल के आयात पर असर डालेगा? विशेषज्ञों को सता रही दूसरी चिंता
Fri, 04 Oct 2024 05:06 PM IST
कुमार विवेक
बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: कुमार विवेक
Updated Fri, 04 Oct 2024 05:06 PM IST
सार
Crude: पश्चिम एशिया में जारी तनाव से भारत की तेल आपूर्ति सीधे तो प्रभावित होने की आशंका कम है, लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव से कच्चे तेल की कीमतें बढ़ सकती हैं। ऐसा होने से अस्थायी मूल्य वृद्धि या मासिक औसत कीमतों में बढ़ोतरी दिख सकती है।
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कच्चा तेल आयात के बिल में आई कमी
- फोटो : पीटीआई
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विस्तार
इस्राइल और ईरान के बीच चल रहे संघर्ष का भारत के कच्चे तेल के आयात पर कोई खास असर पड़ने की उम्मीद नहीं है। विशेषज्ञों के अनुसार ईरान से भारत का कच्चा तेल आयात लगभग नगण्य है। भारत वर्तमान में रूस, इराक, सऊदी अरब, अबू धाबी और अमेरिका सहित लगभग 40 अलग-अलग देशों से तेल आयात करता है, जिससे इसकी आपूर्ति से जुड़ी जरूरतें पूरी होती हैं। हालांकि, जानकार यह भी कह रहे हैं कि इस संघर्ष से वैश्विक तेल बाजारों में मूल्य अस्थिरता पैदा होने का खतरा बढ़ गया है।
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विशेषज्ञों का सुझाव है कि कच्चे तेल की कीमतों में 80 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल से ऊपर की कोई भी तेज वृद्धि तभी संभव है जब संघर्ष बढ़े और प्रमुख आपूर्ति मार्गों जैसे कि होर्मुज जलडमरूमध्य बाधित हो। वैश्विक तेल शिपमेंट के लिए यह एक महत्वपूर्ण मार्ग है।
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एचपीसीएल के पूर्व अध्यक्ष एमके सुराना ने एएनआई को बताया, "भारत को ईरान से सीधे कच्चे तेल की आपूर्ति लगभग शून्य है। भारत हाल के अंतरराष्ट्रीय संघर्षों में देखी गई ऐसी स्थिति में बहुत संतुलित और परिपक्व दृष्टिकोण अपनाने में सक्षम रहा है। इसलिए, भारत के लिए कच्चे तेल की आपूर्ति कोई मुद्दा नहीं हो सकता है, लेकिन कीमतों में उतार-चढ़ाव होगा, जिसमें क्षणिक उछाल और मासिक औसत कीमतें अधिक होंगी। 80 अमेरिकी डॉलर से ऊपर कच्चे तेल की औसत कीमतों में कोई भी वृद्धि केवल स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसी रसद आपूर्ति लाइनों में गंभीर संघर्ष की स्थिति में ही अपेक्षित है।"
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हालांकि, हालिया घटनाक्रमों से भारत की तेल आपूर्ति सीधे तो प्रभावित होने की आशंका कम है, लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव से कच्चे तेल की कीमतें बढ़ सकती हैं। ऐसा होने से अस्थायी मूल्य वृद्धि या मासिक औसत कीमतों में बढ़ोतरी दिख सकती है। मध्य पूर्व में अस्थिरता के कारण कच्चे तेल की कीमतें पहले ही बढ़ चुकी हैं। यदि इस्राइल ईरान के तेल और गैस से जुड़े बुनियादी ढांचे पर हमला करता है (जैसा करने की उसने धमकी दी है), तो इससे कीमतों में और उछाल आ सकता है।
ईरान, हर दिन लगभग 33 लाख बैरल कच्चे तेल का उत्पादन करता है। इस्राइल की ओर से कार्रवाई की स्थिति में यह होर्मुज जलडमरूमध्य को अवरुद्ध करके जवाबी कार्रवाई कर सकता है, जिससे वैश्विक तेल आपूर्ति में बड़ी बाधा उत्पन्न हो सकती है। विशेषज्ञों ने कहा कि ऐसा परिदृश्य भारत के लिए एक चुनौती बन जाएगा, क्योंकि देश अपनी तेल जरूरत का 88 प्रतिशत आयात करता है और अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं के लिए तेल पर बहुत अधिक निर्भर करता है।
भारत के प्रमुख ऊर्जा विशेषज्ञ नरेंद्र तनेजा ने मीडिया से एक विशेष बातचीत में कहा, "इस तनाव से वास्तविक समस्या बहुत अधिक बड़ी हो सकती है। हमारी अर्थव्यवस्था के साथ-साथ नीति निर्माताओं के लिए भी यह एक बड़ी चुनौती साबित होगी। भारत तेल की अपनी कुल आवश्यकताओं का 88 प्रतिशत आयात करता है। मुख्य रूप से भारत रूस, इराक, सऊदी अरब, अबू धाबी और अमेरिका से तेल खरीदता है। भारत अब भी काफी हद तक एक तेल आधारित अर्थव्यवस्था है।"
पश्चिम एशिया में संघर्ष तेल की कीमतों के मामले में जोखिम बढ़ाता है। कमजोर वैश्विक मांग अनुमान, चीन की आर्थिक सुधार को लेकर अनिश्चितता और ओपेक+ देशों की ओर से कच्चे तेल के उत्पादन में कटौती को वापस लेने की संभावना भू-राजनीतिक तनाव के असर को कम कर सकती है। इसके अलावा, लीबिया जैसे देशों में तेल उत्पादन फिर से शुरू होने से कुछ राहत मिलने की उम्मीद है। हालांकि, कच्चे तेल की ऊंची कीमतें अब भी भारत की अर्थव्यवस्था और नीति निर्माताओं के लिए एक बड़ी चुनौती बनी रहेंगी।