अब फैक्ट्री में तैयार होंगे बड़े-बड़े पुल, मलयेशियाई तकनीक के इस्तेमाल से बचेगा समय व धन
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केंद्र सरकार ने राजमार्ग की परियोजनाओं को तेजी से पूरा करने के लिए पुल के 100 मीटर तक लंबे कंक्रीट गर्डर को परियोजना स्थल के बजाय फैक्ट्री में बनाने की योजना बनाई है। इससे महीनों में तैयार होने वाला गर्डर महज एक दिन में लांच कर दिया जाएगा। इससे न सिर्फ समय की बचत होगी, बल्कि इसकी निर्माण लागत परंपरागत तरीके के मुकाबले 30 से 35 फीसदी कम पड़ेगी।
केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने बताया कि कुछ दिन पहले ही उन्होंने एक मलयेशियाई कंपनी के प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात की थी। उन्होंने एक प्रजेंटेशन में दिखाया था कि परियोजना स्थल पर पुल के गर्डर का निर्माण न करके उसे फैक्ट्री में पहले ही तैयार कर लिया जाए।
इस प्री कास्ट तकनीक में मजबूती से कोई समझौता नहीं किया जाता है, बल्कि दावा है कि परियोजना स्थल पर बने गर्डर के मुकाबले यह ज्यादा मजबूत होती है। इसमें स्टील के सरिया का उपयोग न कर स्टील के फाइबर का इस्तेमाल किया जाता है, जिससे स्ट्रक्चर ज्यादा बेहतर परिणाम देता है।
एक रात में बनेगा 100 मीटर का पुल
गडकरी का कहना है कि मलयेशियाई कंपनी की तकनीक से 100 मीटर तक लंबे गर्डर का निर्माण फैक्ट्री में हो सकता है। इसमें परियोजना स्थल पर सिर्फ पुल के पायों का निर्माण किया जाएगा और फिर उस पर प्री कास्ट गर्डर लाकर रख दिया जाएगा। उसके बाद ऊपर सड़क बना दी जाएगी।
इससे कई साल में बनने वाले बड़े पुल भी महज कुछ दिनों में बनाए जा सकेंगे। यदि पुल 100 मीटर का हो, तो इसे एक रात में ही बनाया जा सकता है। इस बारे में मंत्रालय के इंजीनियर को परीक्षण का निर्देश दिया गया है।
यदि यह ठीक रहा तो इसे शीघ्र ही अपना लिया जाएगा। हालांकि राजमार्ग मंत्रालय के अधिकारियों का कहना है कि यह तकनीक भारत के लिए कोई नई नहीं है। इससे मिलती-जुलती तकनीक का इस्तेमाल दिल्ली मेट्रो रेल निगम एक दशक पहले से ही कर रहा है।
डीपीआर में कोलतार सड़कों का प्रावधान
राजमार्ग मंत्री ने देश में सीमेंट कंपनियों की गुटबंदी पर कड़ा प्रहार करते हुए कहा कि सरकार की किसी भी रणनीति को सीमेंट कंपनियां नाकाम कर दे रही हैं। पहले सीमेंट कंपनियां जो दर बताती थीं, उस पर कई महीने तक कायम रहती थीं, लेकिन अब हर महीने की सात तारीख को सीमेंट का रेट संशोधित कर दिया जा रहा है।
इससे सीमेंट से बनने वाली सड़कों की लागत में खासा इजाफा हुआ है। उससे निजात पाने के लिए अब राजमार्ग मंत्रालय ने नई परियोजनाओं की डीपीआर में ही सीमेंट के बजाय कोलतार से बनने वाली सड़कों का प्रावधान करना शुरू कर दिया है। इस वजह से इन सड़कों की परियोजना लागत 30 फीसदी कम पड़ रही है।