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एक्सप्लेनर: भारत में स्टारलिंक को लेकर मस्क और सरकार क्यों आमने-सामने, भेदभाव के दावों में कितना दम?

Thu, 08 Oct 2026 05:38 PM IST
रिया दुबे स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: रिया दुबे Updated Thu, 08 Oct 2026 05:38 PM IST
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सार
भारत में स्टारलिंक की एंट्री को लेकर एलन मस्क और सरकार के दावे अलग हैं। मस्क ने भेदभाव का आरोप लगाया है, जबकि सरकार नियमों को समान बताते हुए सुरक्षा जांच और मंजूरियों को प्रक्रिया का हिस्सा बता रही है। आइए विस्तार से जानते हैं कि पूरा मामला क्या है?
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Explainer: Why Are Musk and Govt at Odds Over Starlink in India? Discrimination Claims Examined
क्या है स्टारलिंक का मामला? - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

भारत में एलन मस्क की स्टारलिंक का इंतजार जितना लंबा होता जा रहा है, विवाद उतना ही बढ़ रहा है। मस्क का दावा है कि भारत में स्टारलिंक की राह कुछ बड़े कारोबारी हितों की वजह से रोकी जा रही है, जबकि सरकार का कहना है कि सैटेलाइट इंटरनेट के लिए नियम सभी कंपनियों पर समान रूप से लागू हैं।  



ऐसे में आइए जानते हैं कि मस्क ने क्या आरोप लगाए? सरकार ने क्या जवाब दिया? स्टारलिंक को भारत में अब तक क्या मंजूरियां मिली हैं? स्टारलिंक भारत के लिए कितना तैयार है? भारत सैटेलाइट नेटवर्क को लेकर इतना सख्त क्यों है? स्टारलिंक के सैटेलाइट इंटरनेट के क्या फायदे हैं? भारत नें इसका कितना बड़ा बाजार है?

मस्क ने हाल में क्या आरोप लगाया?

एलन मस्क ने हाल में सोशल मीडिया एक्स पर आरोप लगाया कि स्टारलिंक को भारत में कुछ बड़े कारोबारी रोक रहे हैं। उन्होंने कहा कि ऐसा भारत के लोगों पर अपना एकाधिकार बनाए रखने के लिए किया जा रहा है। मस्क ने किसी कारोबारी या कंपनी का नाम नहीं लिया।

मस्क का यह बयान एक ऐसी पोस्ट के जवाब में आया, जिसमें कहा गया था कि स्टारलिंक भारत के दूरदराज और कम सेवा वाले इलाकों में तेज इंटरनेट पहुंचाने में मदद कर सकता है। मस्क पहले भी कह चुके हैं कि स्टारलिंक भारत के खासकर ग्रामीण इलाकों में उन लोगों के लिए मददगार हो सकती है, जिन्हें अभी पर्याप्त इंटरनेट सुविधा नहीं मिल रही है।

मस्क के आरोप के संदर्भ में रॉयटर्स ने बताया कि भारत के दूरसंचार बाजार में मुकेश अंबानी की रिलायंस जियो और सुनील मित्तल की भारती एयरटेल का बड़ा दबदबा है। इन दोनों से जुड़ी सैटेलाइट इंटरनेट सेवाएं भी भारत में उतरने की तैयारी कर रही हैं। स्टारलिंक, जियो और एयरटेल से जुड़ी सेवाओं को शुरुआती मंजूरियां मिल चुकी हैं, लेकिन तीनों अभी स्पेक्ट्रम आवंटन और अंतिम मंजूरियों का इंतजार कर रही हैं। स्टारलिंक का इंतजार करीब चार साल तक पहुंच चुका है।

मस्क और अंबानी-मित्तल के बीच भारत में सैटेलाइट स्पेक्ट्रम को लेकर पहले मतभेद भी रहे हैं। हालांकि 2025 में स्टारलिंक ने भारत में अपने उपकरण वितरित करने के लिए जियो और एयरटेल के साथ अलग-अलग समझौते किए थे।

भारत में कनेक्टिविटी की जरूरत का दिया गया आंकड़ा

स्टारलिंक के समर्थन में की गई एक पोस्ट में दावा किया गया कि भारत में इंटरनेट की पहुंच बढ़ने के बावजूद ग्रामीण और दूरदराज इलाकों में कनेक्टिविटी की चुनौती बनी हुई है। मई 2026 तक देश के 11,256 सूचीबद्ध गांवों में 4जी सुविधा नहीं थी। मार्च 2026 में भारत में 109.3 करोड़ इंटरनेट सदस्यताएं थीं, लेकिन ग्रामीण इलाकों में इनकी संख्या करीब 44.09 करोड़ थी। ग्रामीण क्षेत्रों में प्रति 100 लोगों पर इंटरनेट सदस्यता 48.31 थी, जबकि शहरों में यह आंकड़ा 126.80 था।

जमीन के जरिए इंटरनेट पहुंचाने के लिए भारतनेट के तहत 8.5 लाख रूट किलोमीटर से ज्यादा फाइबर बिछाया जा चुका था और करीब 2.21 लाख ग्राम पंचायतों को सेवा के लिए तैयार किया गया था। हालांकि, जून 2026 तक इनमें से 80,472 ग्राम पंचायतों में ही प्वाइंट ऑफ प्रेजेंस चालू थे। वहीं, मार्च 2026 में भारत की कुल इंटरनेट सदस्यताओं में केवल 4.26 फीसदी वायर्ड कनेक्शन थे। पोस्ट में कहा गया कि स्टारलिंक दूरदराज के गांवों, पहाड़ी इलाकों और द्वीपों तक तेज इंटरनेट पहुंचाने का एक अतिरिक्त माध्यम बन सकता है।

भारत सरकार बनाम एलन मस्क
भारत सरकार बनाम एलन मस्क - फोटो : Amar Ujala

भारत सरकार ने क्या जवाब दिया?

मस्क के आरोप के बाद संचार मंत्रालय ने कहा कि भारत में सैटेलाइट संचार सेवाओं के लिए नियामकीय ढांचा निष्पक्ष और भेदभाव रहित है।

सरकार के मुताबिक, गैर-भूस्थिर कक्षा आधारित सैटेलाइट संचार सेवा के लिए तीन कंपनियों को लाइसेंस दिया गया है। हर लाइसेंसधारी के लिए सुरक्षा से जुड़ी शर्तों का पालन करना जरूरी है। फिलहाल तीनों कंपनियों की सुरक्षा जांच चल रही है।

मंत्रालय ने कहा कि सुरक्षा जांच पूरी होने के बाद संबंधित कंपनी स्पेक्ट्रम आवंटन के अगले चरण में जा सकती है। इन मंजूरियों के बाद ही स्टारलिंक भारत में कमर्शियल सैटेलाइट इंटरनेट सेवा शुरू कर सकेगा। सरकार के अनुसार तीनों कंपनियां फिलहाल लगभग एक ही नियामकीय चरण में हैं। इसलिए स्टारलिंक के साथ भेदभाव किए जाने का आरोप निराधार है।

स्टारलिंक को भारत में अब तक क्या मंजूरियां मिली हैं?

दूरसंचार विभाग ने 6 जून 2025 को स्टारलिंक सैटेलाइट कम्युनिकेशंस प्राइवेट लिमिटेड को एकीकृत लाइसेंस दिया था। इसमें वैश्विक मोबाइल व्यक्तिगत संचार उपग्रह सेवा, वाणिज्यिक वी-सैट बंद उपयोगकर्ता समूह सेवा और इंटरनेट सेवा प्रदाता श्रेणी ए की अनुमति शामिल थी। यह लाइसेंस सुरक्षा शर्तों को स्वीकार करने के बाद दिया गया था।

इससे पहले विभाग ने सैटेलाइट संचार सेवाओं के लिए स्पेक्ट्रम आवंटन की शर्तों और कीमतों पर दूरसंचार नियामक से सिफारिशें मांगी थीं। नियामक ने 9 मई 2025 को अपनी सिफारिशें दी थीं।

जुलाई 2025 में भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष संवर्धन और प्राधिकरण केंद्र यानी इन-स्पेस ने स्टारलिंक को भारत में संचालन के लिए मंजूरी दी। सितंबर 2025 में कंपनी को परीक्षण के लिए अस्थायी स्पेक्ट्रम भी मिला और इसके बाद सुरक्षा मंजूरी के लिए परीक्षण प्रक्रिया चली।

भारत में स्टारलिंक अकेली कंपनी नहीं है। वनवेब इंडिया और जियो सैटेलाइट कम्युनिकेशंस को भी वैश्विक मोबाइल व्यक्तिगत संचार उपग्रह सेवा के लिए लाइसेंस मिला है।

स्टारलिकं
स्टारलिकं - फोटो : Amar Ujala

स्टारलिंक भारत के लिए कितना तैयार है?

स्टारलिंक का कहना है कि उसने भारत में सेवा शुरू करने के लिए काफी तैयारी कर ली है। 7 अक्तूबर को भारत मोबाइल कांग्रेस 2026 में स्टारलिंक की कारोबार संचालन उपाध्यक्ष लॉरेन ड्रेयर ने बताया कि कंपनी ने भारत की सुरक्षा जरूरतों और दूसरे नियमों को ध्यान में रखकर अपनी व्यवस्था तैयार की है। कंपनी ने भारत में 20 गेटवे साइट बनाई हैं, जिनमें सैकड़ों एंटीना लगाए गए हैं।

कंपनी के मुताबिक, भारतीय उपयोगकर्ताओं का डेटा भारत के भीतर रखने की व्यवस्था की गई है। स्टारलिंक ने देश में जमीन पर जरूरी बुनियादी ढांचा और स्थानीय संचालन व्यवस्था भी तैयार कर ली है।

ड्रेयर के अनुसार, स्टारलिंक पिछले पांच साल से भारतीय नियामकों, उद्योग जगत और दूरसंचार कंपनियों के साथ काम कर रही है। कंपनी ने भारत में भारती एयरटेल और रिलायंस जियो के साथ भी साझेदारी की है।

भारत सैटेलाइट नेटवर्क को लेकर इतना सख्त क्यों है?

सैटेलाइट संचार सामान्य मोबाइल नेटवर्क से अलग तरीके से काम करता है। इसके लिए हर जगह मोबाइल टावर या जमीन के नीचे बिछी फाइबर केबल की जरूरत नहीं होती। यही इसकी ताकत है, लेकिन सुरक्षा के लिहाज से यही चुनौती भी बन सकती है। भारत में सुरक्षा एजेंसियों की चिंता यह रही है कि ऐसे संचार माध्यमों को सामान्य मोबाइल नेटवर्क की तुलना में अलग तरीके से नियंत्रित और ट्रैक करना पड़ सकता है।

26/11 के बाद क्यों बढ़ी चिंता?

26/11 मुंबई आतंकी हमले के दौरान हमलावरों ने संयुक्त अरब अमीरात आधारित थुराया सैटेलाइट फोन का इस्तेमाल पाकिस्तान में मौजूद अपने आकाओं से बातचीत के लिए किया था।सैटेलाइट फोन सामान्य भारतीय मोबाइल नेटवर्क पर निर्भर नहीं होता। इसलिए ऐसे संचार को पकड़ना और ट्रैक करना सुरक्षा एजेंसियों के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

इसी पृष्ठभूमि में भारत में सैटेलाइट आधारित संचार सेवाओं के लिए सुरक्षा से जुड़ी शर्तें महत्वपूर्ण हो गईं। हालांकि यहां स्टारलिंक और थुराया सैटेलाइट फोन को एक जैसा समझना सही नहीं होगा। स्टारलिंक एक सैटेलाइट इंटरनेट नेटवर्क है, जो पृथ्वी की निचली कक्षा में मौजूद बड़ी संख्या में उपग्रहों के जरिए ब्रॉडबैंड सेवा देता है। वहीं थुराया मुख्य रूप से सैटेलाइट फोन के जरिए कॉल और संचार की सुविधा देता है।

स्टारलिंक का मामला
स्टारलिंक का मामला - फोटो : Amar Ujala

हाल में स्टारलिंक को लेकर कौन-कौन से मामले सामने आए?

स्टारलिंक की सुरक्षा को लेकर भारत में इसके उपकरण मिलने के कुछ मामले पहले भी सामने आ चुके हैं।

मणिपुर में हालिया दावा: सोशल मीडिया पर हाल में दावा किया गया कि म्यांमार सीमा के पास मणिपुर में सक्रिय उग्रवादी समूहों से सुरक्षा बलों ने स्टारलिंक के उपकरण बरामद किए हैं।

एलन मस्क ने इस दावे को खारिज किया। उन्होंने कहा कि भारत के ऊपर स्टारलिंक के उपग्रह संकेत बंद हैं। एक्स पर डोजडिजाइनर नाम के अकाउंट ने भी सवाल उठाया कि जब भारत के ऊपर संकेत बंद हैं, तो भारत में कोई उपकरण स्टारलिंक नेटवर्क से कैसे जुड़ सकता है। मस्क ने इस बात का समर्थन किया। हालांकि स्टारलिंक के दुरुपयोग को लेकर भारत में पहले कुछ और मामले भी आ चुके हैं। 

अंडमान-निकोबार मामला: नवंबर 2024 में म्यांमार में पंजीकृत एक नाव से करीब 6,000 किलोग्राम मेथामफेटामाइन बरामद किया गया था। इसी कार्रवाई में स्टारलिंक मिनी उपकरण भी मिला। पुलिस ने आशंका जताई थी कि इसका इस्तेमाल समुद्र में संचार और दिशा तय करने के लिए किया गया हो सकता है।

पंजाब मामला: 24 मई 2026 को फिरोजपुर में 28.12 किलोग्राम हेरोइन, 9.5 लाख रुपये की संदिग्ध मादक पदार्थों की रकम और स्टारलिंक का सैटेलाइट संचार उपकरण बरामद किया गया। अधिकारियों ने आशंका जताई कि इसका इस्तेमाल सीमा पार संपर्क और ड्रोन गतिविधियों के लिए किया जा सकता था।

भारत में सेटलाइट इंटरनेट बाजार कितना बड़ा हो सकता है?

भारत स्टारलिंक और दूसरी सैटेलाइट इंटरनेट कंपनियों के लिए बड़ा बाजार हो सकता है। डेलॉयट के अनुमान के मुताबिक, भारत का सैटेलाइट ब्रॉडबैंड बाजार 2030 तक 1.9 अरब डॉलर का हो सकता है। 2025 की ईवाई-फिक्की रिपोर्ट के मुताबिक भारत का सैटेलाइट संचार क्षेत्र 2033 तक 14.8 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है।

सैटेलाइट नेटवर्क से ब्रॉडबैंड पहुंच बढ़ने के साथ वित्तीय समावेशन और डिजिटल बुनियादी ढांचे को भी बढ़ावा मिल सकता है। इससे डिजिटल इंडिया और भारतनेट जैसी पहलों को मदद मिल सकती है।

डेलॉयट ने यह भी अनुमान लगाया है कि कुछ सैटेलाइट ऑपरेटर पारंपरिक दूरसंचार कंपनियों से सीधे मुकाबले की रणनीति अपना सकते हैं। कम कीमत पर सेवा देकर वे उन ग्राहकों को लक्ष्य कर सकते हैं, जिन्हें मौजूदा नेटवर्क से पर्याप्त सेवा नहीं मिल रही है। सीधे मोबाइल फोन तक सैटेलाइट से इंटरनेट पहुंचाने वाली तकनीक भी इस प्रतिस्पर्धा को बढ़ा सकती है।

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