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कोरोना वायरसः अमेरिका में इतना पानी-पानी क्यों हो गया तेल ?

Wed, 22 Apr 2020 03:17 PM IST
‌डिंपल अलवधी बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: ‌डिंपल अलवधी Updated Wed, 22 Apr 2020 03:17 PM IST
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Coronavirus impact America crude oil price reduced lowest in years
सांकेतिक तस्वीर

अमेरिका में तेल की कीमतों के साथ सोमवार को कुछ ऐसा ही हुआ जो इतिहास में पहले कभी किसी ने नहीं देखा था। सोमवार को जब बाजार खुले तो 'वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट' (डब्लूटीआई) का कारोबार 18 डॉलर प्रति बैरल से शुरू हुआ और दोपहर खत्म होते-होते ये -37.63 डॉलर की दर पर जमींदोज हो गया।

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'वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट' को ग्लोबल मार्केट में कच्चे तेल का बेंचमार्क भी माना जाता है।

विश्लेषक इसे 'निगेटिव प्राइस' बता रहे हैं। इसका मतलब ये हुआ कि वादा बाजार में कमोडिटी प्रोड्यूसर्स खरीदारों को तेल के बदले पैसे देने के लिए तैयार हैं ताकि उपभोक्ता उनसे तेल ले लें। कमोडिटी प्रोड्यूसर्स को ये डर है कि मई के आखिर तक तेल रखने के लिए जगह खत्म हो जाएगी। वे स्टोरेज की लागत से बचने के लिए तेल की डिलिवरी नहीं लेना चाहते हैं।
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आर्थिक गतिविधियां बंद
कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट की वजह कोविड-19 की महामारी से बनी स्थिति है। चूंकि आर्थिक गतिविधियां बंद हैं इसलिए दुनिया के सबसे बड़े तेल उत्पादक अमेरिका के सामने अजीब सी उलझन पैदा हो गई है कि वो उस तेल का क्या करे जिसका उत्पादन वो खुद कर रहा है।
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दरअसल, अमेरिका के प्रमुख तेल भंडार भरने की कगार पर पहुंच गए हैं। इनमें ओक्लाहोमा का सबसे बड़ा ऑयल स्टोरेज सेंटर भी शामिल है।

ये आशंका जताई जा रही है कि कुछ समय के भीतर ही ये तेल भंडार अपने उच्चतम स्तर पर पहुंच जाएंगे यानी और तेल स्टोरेज की जगह खत्म हो जाएगी।

अमेरिका के लिए ये एतिहासिक दुविधा की घड़ी है। ऐसी असमंजस की स्थिति दुनिया के कुछ दूसरे देशों के सामने भी हैं।

इन देशों ने पहले तो बड़े-बड़े तेल भंडार बनाए ताकि अगर किसी वजह से ऑयल सप्लाई बंद होने की सूरत में उनके यहां आपूर्ति प्रभावित न हो।

कोरोना की वजह से परेशानी
लेकिन अब समस्या दूसरी आ गई है कि इतना ज्यादा तेल इकट्ठा हो गया है कि वे समझ नहीं पा रहे हैं कि इसका क्या करें। और ऐसा केवल अमेरिका के साथ नहीं हो रहा है।

इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी के कार्यकारी निदेशक फातिह बिरोल ने पिछले हफ्ते ही चेतावनी दी थी, 'बहुत जल्द ही एक समय आएगा जब दुनिया भर में ऑयल स्टोरेज की क्षमता अपने चरम पर पहुंच जाएगी।'

नॉर्वे की ऑयल कंसल्टेंसी फर्म 'राइस्टाड एनर्जी' के अनुमान के मुताबिक वैश्विक तेल भंडार की कुल क्षमता का 76 फीसदी हिस्सा पहले से ही भरा हुआ है। इस अप्रैल में दुनिया में कच्चा तेल स्टोर करने के लिए जगह कम पड़ जाएगी।

सवाल उठता है कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि ये नौबत आ गई?

यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्सास में ऊर्जा मामलों के विशेषज्ञ जॉर्ज पिनॉन कहते हैं, 'ये परेशानी कोरोना वायरस से फैली महामारी की वजह से आई है। इसने तेल उत्पान और उसकी वैश्विक खपत के बीच का संतुलन बिगाड़ दिया है।'
 

अर्थव्यवस्था का इंजन
साल 2018 से ही दुनिया का सबसे बड़े तेल उत्पादक अमेरिका भी इस स्थिति से अछूता नहीं रह सका।

जॉर्ज पिनॉन कहते हैं, 'हाइड्रोकार्बन इंडस्ट्री के सामने आज जो समस्या है, वो सप्लाई की नहीं है। हम सभी जानते हैं कि दुनिया में पर्याप्त मात्रा में तेल है। आज दिक्कत डिमांड की है। कोई तेल को पूछ नहीं रहा है। कोई नहीं जानता कि इस संकट से कैसे बचा जा सकेगा।'

दुनिया में तेल की आपूर्ति और मांग के बीच के इस असंतुलन को लेकर कई विशेषज्ञों का ये भी कहना है कि इसके संकेत कोरोना वायरस के आने से काफी पहले दिखने शुरू हो गए थे। चीन और भारत जैसी अर्थव्यवस्थाओं से आर्थिक सुस्ती की ख़बरें आ रही थीं। तेल की अंतरराष्ट्रीय खरीद को किसी भी देश की अर्थव्यवस्था का इंजन माना जाता है।

उसके बाद कोरोना वायरस से फैली कोविड-19 की महामारी की समस्या आ गई जिसने व्यावहारिक रूप से दुनिया की तमाम आर्थिक गतिविधियों पर ताला लगा दिया।

साल 2008 के वित्तीय संकट के बाद
ऑयल स्टोरेज के बिजनेस से जुड़ी कंपनी द टैंक टाइगर के सीईओ एर्नी बार्सामियान कहते हैं, 'एयरलाइंस कंपनियां, इंडस्ट्री सब ठप है। शहर क्वारंटीन में है। लोगों की कारें गराज में खड़ी हैं। ऐसा लगता है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की मांग और कम होगी।'

रिसर्च फर्म आईएचएस मार्किट का अनुमान है कि इस साल की पहली तिमाही में तेल की वैश्विक मांग 38 लाख बैरल प्रतिदिन के हिसाब से कम हो गई है। ये वैश्विक आपूर्ति का चार फीसदी हिस्सा है। साल 2008 के वित्तीय संकट के बाद ये सबसे खराब स्थिति है।

कुछ हफ्ते पहले ही रूस और सऊदी अरब के बीच तेल की कीमतों पर प्राइस वॉर चल रहा था जिसकी वजह से भी तेल की कीमतों में गिरावट दर्ज की गई थी।

ओपेक प्लस देशों के समूह और मेक्सिको के बीच हुए समझौते के बाद ये तय हुआ था कि मई तक तेल के उत्पादन में दस फ़ीसदी की कटौती की जाएगी। तेल उत्पान में कटौती के लिए ये समझौता अपने आप एतिहासिक था।

मार्च के आखिर से कई अमेरीकी कंपनियों ने ये घोषणा की है कि वे अप्रैल में तेल प्रसंस्करण की मात्रा में कटौती करेंगे। कच्चे तेल के उत्पादन पर इस घोषणा का भी नकारात्मक असर हुआ था।

एर्नी बार्सामियान कहते हैं, 'कच्चे तेल का अपने आप में कोई मतलब नहीं है जब तक कि उसे प्रोसेस न किया जाए। इसलिए भंडारण का सवाल तो प्रोसेसिंग के बाद ही आता है।'

प्रोफेसर जॉर्ज पिनॉन की राय में, 'सामान्य परिस्थितियों में कच्चा तेल या तो रिफाइनरियों के टैंक में स्टोरेज किया जाता है या फिर जहां उनका खनन होता है। उसके बाद सेकेंडरी स्टोरेज की बारी आती है।'

"ये बड़े टर्मिनल्स में ज्यादा समंदर किनारे वाली जगहों पर रखे जाते हैं जहां से तेल को कहीं आसानी से लाया-ले जाया जा सकता है। ये एक सामान्य समझ की प्रक्रिया है। जहां कहीं से भी मांग आएगी, वहां के लिए तेल ट्रांसपोर्ट के जरिए भेज दिया जाएगा।'

लेकिन जब मांग गिरती है और जैसा कि अभी हो रहा है। तेल रखने की जगह धीरे-धीरे भर जाएगी। यहां तक कि समंदर में खड़े बड़े-बड़े ऑयल टैंकर भी तैरते हुए स्टोरेज यूनिट्स बनकर रह जाएंगे।

मार्च के महीने से कुछ अमेरीकी कंपनियों ने अपने जहाजों को एक जगह पर खड़ा करना शुरू कर दिया था। इसे कुछ लोग 'टैंकर फार्म' भी कह रहे हैं। एर्नी बार्सामियान कहते हैं, 'कई कंपनियां तो ये ऑयल टैंकर्स किराए पर लेती हैं। इन्हें तेल से भर दिया जाता है। समंदर में खड़ा कर दिया जाता है और ये तब तक वैसे ही खड़ी रहती हैं जब तक कि इन्हें कोई ग्राहक नहीं मिल जाता है।'

एर्नी बार्सामियान जैसे लोग इसी तरह के तेल के लिए खरीदार खोजने का काम करते हैं। यहीं उनका बिजनेस है।

वो कहते हैं, 'लेकिन इसमें एक और दिक्कत है। समंदर में तेल रखना, जमीन पर स्टोरज करने की तुलना में तीन गुना ज्यादा महंगा है। हालांकि इसकी लागत बहुत ज्यादा पड़ती है लेकिन पिछले कुछ हफ्ते में हमने ये नोटिस किया है कि कई कंपनियां ये विकल्प अपना रही हैं क्योंकि अमेरिका में जमीन पर स्टोरेज की कम पड़ गई है।'

एर्नी बार्सामियान बताते हैं, 'पहले अगर हम रोज दो ग्राहकों से बात करते थे तो पिछले कुछ हफ्तों से हम हर दिन 12 ग्राहकों से बात कर रहे हैं।

एनर्जी मार्केट से जुड़ी कंसल्टेंसी फर्म 'केप्लर' सैटेलाइट के जरिए समंदर में खड़े ऑयल टैंकर्स की गतिविधियों पर नजर रखती है। फर्म का कहना है कि मार्च के महीने में समंदर में ऑयल टैंकरों के जरिए तेल भंडारण की मात्रा में 25 फीसदी की वृद्धि हुई है।

तेल के उत्पादन में कटौती क्यों नहीं?
तेल उत्पादन में कटौती पर ओपेक प्लस देशों का समझौता एक मई से लागू होने वाला है।

बहुत से लोग ये सवाल पूछ रहे हैं कि अमेरिका ने पहले ही तेल उत्पादन में कटौती का फैसला क्यों नहीं लिया जिससे कि सोमवार जैसी स्थिति को टाला जा सकता था।

प्रोफेसर जॉर्ज पिनॉन स्पष्ट करते हैं कि ये मुमकिन नहीं था क्योंकि तेल उत्पादन में कटौती का फैसला क्लाइंट्स और ओपेक देशों की सहमति से ही लिया जा सकता था। दरअसल ऊपर से ये जितना आसान लगता है, ये उससे कहीं ज्यादा जटिल मसला है।

वो बताते हैं, 'जब ऑयल सेक्टर में काम करना शुरू करते हैं तो पहला सबक ये दिया जाता है कि तेल के कुएं कभी बंद नहीं किए जाते हैं। आपको चाहे जो भी करना पड़े। चाहे कितना भी खर्च आए। चाहे तेल की कितनी ही बिक्री क्यों न हो, ऑयल फील्ड बंद नहीं किया जाता है।'

'किसी तेल के कुएं से उत्पादन कम करने की अपनी तकनीकी चुनौतियां हैं। इससे धरती में जमा कुल जमा तेल भंडार पर असर पड़ सकता है। धरती से तेल जिस प्राकृतिक दबाव से निकलता है, उसमें किसी किस्म का बदलाव करने से पहले जैसा प्रेशर दोबारा हासिल करना बहुत मुश्किल है।'

सबसे बड़ा रणनीतिक तेल भंडार
हालांकि अमेरिका में कई ऑयल फील्ड्स से हाइड्रोलिक प्रेशर के जरिए भी तेल निकाला जाता है, वहां उत्पादन में कटौती करना ज्यादा आसान है।

एर्नी बार्सामियान के अनुसार उत्पादन में कटौती नहीं करने के और भी कारण हैं। जब कुएं सक्रिय रहते हैं तो उत्पादन की लागत सामान्य तौर पर कम पड़ती है। तेल उत्पादन करने वाली कंपनियां बिक्री से होने वाली आमदनी पर निर्भर होती हैं, इसलिए जब कीमत गिरती है तो भी उन्हें बिक्री जारी रखनी पड़ती है।

बार्सामियान कहते हैं, 'तेल कंपनियां उत्पादन बंद नहीं कर सकती हैं। उन्हें किसी भी कीमत पर इसे बेचना होगा।'

अमेरिका के पास दुनिया का सबसे बड़ा रणनीतिक तेल भंडार है और मार्च के आखिर में ट्रंप ने कहा था कि उनकी योजना जहां तक मुमकिन हो सके, तेल स्टोर करने की है।

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