अब तक अनसुलझा है अमेजन नदी का रहस्य
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किसी भी नदी की पहचान उसकी धारा, उसके लंबे-चौड़े पाट या किनारे होते हैं। कुदरत की सबसे खूबसूरत नेमतों में से एक हैं नदियां। लेकिन बड़ी से बड़ी नदी की शुरुआत भी बहुत छोटी धारा से होती है। किताबें हमें बताती हैं कि फलां नदी, कहीं दूर पहाड़ी से शुरू होती है। जब बारिश होना बंद हो जाती है, तो, बर्फ पिघलती है, या जमीन के अंदर से कोई झरना फूटता है और पानी की एक धार बहनी शुरू हो जाती है। कई छोटी-छोटी ऐसी धाराएं आगे जाकर एक दूसरे से मिल जाती हैं। यही धाराएं आगे चलकर बड़ी नदी का रूप ले लेती हैं।
इसका मतलब ये है कि दुनिया की सबसे लंबी या सबसे बड़ी नदियां जैसे नील या फिर अमेजन की शुरुआत के एक-दो नहीं सैकड़ों शुरुआती बिंदु होते हैं।
लेकिन भूगोल के जानकार, किसी एक ठिकाने को ही नदी की शुरुआत की जगह मानते हैं। सवाल ये है कि वो ये कैसे तय करते हैं कि कोई नदी कहां से बहना शुरू होती है? और क्या इस फैसले के कुछ खास मायने भी होते हैं? अमेरिका के स्मिथसोनियन नेशनल एयर एंड स्पेस म्यूजियम के एंड्र्यू जॉन्स्टन कहते हैं कि किसी नदी की शुरुआत के अलग-अलग ठिकाने माने जाते हैं। लेकिन कुछ बुनियादी नियम हैं जिनसे किसी नदी का शुरुआती ठिकाना तय होता है।
आमतौर पर भूगोल के जानकार, सबसे ज्यादा पानी वाली धारा के सबसे दूर वाले ठिकाने को ही किसी नदी की शुरुआत मानते हैं। हालांकि कुछ लोगों को इस परिभाषा पर ऐतरा़ज रहा है। कई बार कुछ नदियों की सहायक नदियों की धाराएं, उस नदी की अपनी धारा से ज्यादा पानी वाली होती हैं। कई बार कुछ धाराएं, अलग-अलग मौसमों में पानी की अलग मात्रा के साथ बहती हैं।
किसी नदी की शुरुआत कहां से होती है इसका पता लगाने के लिए आपको उसकी अलग धाराओं में पानी की तादाद के कई सालों के आंकड़े चाहिए होंगे। आम तौर पर ऐसे आंकड़े नहीं मिलते। ऐसे में किसी नदी की उत्पत्ति उसकी सहायक नदियों की धारा में पानी की तादाद देखकर मोटे तौर पर तय की जाती है। नदियों की दशा दिशा नापने वाले कार्टोग्राफर या नक्शानवीसों ने पूरी नदी और उसकी घाटी का नक्शा बनाना शुरू किया, तो ये तरीका ज्यादा बेहतर माना गया।
इस तरीके से ये तय पाया गया कि किसी नदी की सबसे मोटी धारा जहां से शुरू होती है वहीं से नदी बहना शुरू होती है। अब कुछ लोगों ने कहा कि ये परिभाषा नदी की लंबाई पर ज्यादा भरोसा करती है, उसमें पानी की मात्रा को पैमाना नहीं मानती। इससे पहले पानी की मात्रा के हिसाब से नदियों के नाम तय होते थे। अब आप धारा की लंबाई को पैमाना मानेंगे तो नदी की शुरुआत अलग होगी। लेकिन, अगर आप धारा में पानी की मात्रा को पैमाना मानेंगे तो नदी की शुरुआत का ठिकाना अलग होगा।
इसीलिए कई बड़ी नदियों की उत्पत्ति को लेकर आज भी मतभेद हैं। जैसे कि दुनिया की सबसे बड़ी नदी अमेजन को ही ले लीजिए। इसकी लंबाई 6200 किलोमीटर से लेकर 7,000 किलोमीटर तक मानी जाती है। इसे दुनिया की सबसे लंबी और सबसे बड़ी नदी माना जाता है। अमेजन नदी की घाटी दक्षिण अमेरिका के आठ देशों में फैली हुई है। ब्राजील, बोलीविया, पेरू, इक्वाडोर, कोलंबिया, वेनेजुएला, गुयाना और सूरीनाम के अलावा फ्रेंच गुयाना तक अमेजन की धारा बहती है।
इतनी बड़ी नदी की धारा कहां से शुरू होती है, इस पर अब तक एक राय नहीं बन सकी है। पिछली एक सदी से अमेजन के उद्गम को चिह्नित करने की कोशिश हो रही है।
सन् 1707 में भूगोलविद् फादर सैमुअल फ्रिट्ज ने एक नक्शा छपवाया। इसमें अमेजन का उद्गम लॉरीकोचा झील को बताया गया जो अमेजन की सहायक नदी, मारानॉन का स्टार्टिंग प्वाइंट है। ये ठिकाना पेरू में है। फ्रिट्ज का मानना था कि मारानॉन नदी में अमेजन की सहायक नदियों के मुकाबले सबसे ज्यादा पानी रहता है। लेकिन बीसवीं सदी की शुरुआत में कुछ खोजों में ये पाया गया कि अमेजन की शुरुआत पेरू की एपूरिमैक नदी की शुरुआत से होती है, लेकिन इस पर भी आम राय नहीं बन सकी। इस सहायक नदी के उद्गम को लेकर ही मतभेद हो गए। किसी ने पेरू की विलाफ्रो झील को एपूरिमैक का उद्गम माना तो किसी ने माउंट हुगारा को।
फिर, 1960 के दशक में पेरू के भूगोलविद् कार्लोस पेनाहेरारा डेल एगुइला ने दावा कि पेरू की नेवादो मिस्मी नाम की जगह एपूरिमैक नदी की शुरुआती जगह है और यहीं से अमेजन का उद्गम माना जाना चाहिए। आज की तारीख में ज्यादातर लोग इसे ही अमेजन की शुरुआत की जगह मानते हैं।
लेकिन, साल 2000 में इससे भी ऊपर कारहुआसांता नाम की जगह, एपूरिमैक नदी के बहने की शुरुआत मानी गई। फिर अमेजन की शुरुआत भी यहीं से मानी गई।
लेकिन, 2014 में खोजकर्ता जेम्स कॉन्टोस ने दावा किया कि पेरू की मांतारो नदी को अमेजन की उत्पत्ति की जगह माना जाना चाहिए। जेम्स जब 2012 में अमेजन का शुरुआती ठिकाना तलाश रहे थे तो उन्हें लगा कि मांतारो नदी में एपूरिमैक नदी से ज्यादा पानी रहता है, वो भी पूरे साल। तो इसे ही अमेजन की शुरुआत माना जाना चाहिए।
जेम्स न जीपीएस की मदद से एपूरिमैक और मांतारो दोनों की लंबाई-चौड़ाई कई बार नापी, तब जाकर वो इस नतीजे पर पहुंचे। इस कोशिश में जेम्स को पता चला कि मांतारो नदी, एपूरिमैक से करीब 75 से 77 किलोमीटर ज्यादा लंबी है। इस नई खोज से ये तय हुआ कि अमेजन का शुरुआती ठिकाना कॉर्डिलेरा रूमू क्रूज नामक की पहाड़ी है। वैसे, सभी लोग जेम्स के दावे से इत्तेफाक नहीं रखते। उनका कहना है कि साल के कई महीने मांतारो नदी सूखी रहती है क्योंकि इसका पानी 1972 में बने एक बांध के चलते दूसरी तरफ मोड़ दिया जाता है।
इसीलिए कुछ लोग अभी भी अमेजन की सहायक एपूरिमैक नदी की शुरुआत को ही अमेजन की उत्पत्ति का ठिकाना मानते हैं। वहीं जेम्स ये कहते हैं कि बांध बनने के बावजूद मांतारो नदी में थोड़ा ही सही, पानी तो बहता ही है। इसीलिए उसे ही अमेजन का उद्गम माना जाना चाहिए। वैसे सिर्फ अमेजन नदी ही ऐसी नहीं जिसकी शुरुआत को लेकर गफलत है।
दुनिया की सबसे बड़ी नदियों में से एक अफ्रीका की नील नदी की शुरुआत कहां से होती है, इस पर भी आम राय नहीं। यहां तक कि ब्रिटेन की टेम्स नदी की शुरुआत पर भी मतभेद हैं। 1937 में दो ब्रिटिश सांसदों के बीच टेम्स के असली शुरुआती ठिकाने को लेकर अच्छी खासी बहस हो गई थी। आधिकारिक रूप से टेम्स की शुरुआत, टेम्स हेड नाम की एक जगह को माना जाता है। ये जगह दक्षिण-मध्य इंग्लैंड के केम्बल नाम के गांव के पास पहाड़ियों के बीच है। लेकिन कुछ लोग मानते हैं कि टेम्स नदी, सेवेन स्प्रिंग्स नाम की जगह से बहना शुरू होती है। यहीं से टेम्स की सहायक नदी चर्न बहती है।
आज अगर चर्न नदी को टेम्स का शुरुआती ठिकाना माना जाए तो इसकी लंबाई 22 किलोमीटर और बढ़ जाएगी। इसी तरह एशिया की सबसे बड़ी, चीन की यांग्त्जे नदी की शुरुआत को लेकर भी मतभेद हैं। 1985 में वॉन्ग हाउ मैन नाम के पत्रकार ने दावा किया कि उसने यांग्त्जे नदी का उद्गम खोज निकाला है। ये इसकी सहायक नदी डाम्कू का शुरुआती ठिकाना है।
लेकिन, बीस साल बाद खुद हाउ मैन को लगा कि उसका पिछला अंदाजा गलत था। इसमें तो यांग्त्जे की एक और सहायक नदी है जो डाम्कू से भी ज्यादा लंबी है। हाउ मैन ने खुद अपनी गलती सुधारी। कुछ और वैज्ञानिकों ने भी हाउ मैन के दावे पर मुहर लगाई है। वहीं एक और चीनी वैज्ञानिक ने साल 2008 में पता लगाया कि यांग्त्जे नदी की शुरुआती धारा तो दांगला की पहाड़ियों से बहना शुरू होती है। वैसे आधिकारिक रूप से यांग्त्जे की छोटी सहायक नदी ट्यूटुओ की शुरुआत को ही इस नदी का उद्गम माना जाता है।
अब इतने अलग-अलग दावों के बीच किसे सही माना जाए? बेहतर होगा कि जिस जगह पर सरकार की मुहर लगे, उसे ही किसी नदी की उत्पत्ति की जगह माना जाना चाहिए। लेकिन कई बार सरकारें भी गलती करती हैं। और फिर इन्हें जल्दी ठीक भी नहीं किया जाता। भारत में सर्वे ऑफ इंडिया ही सरकारी नक्शे बनाता है। तो सर्वे ऑफ इंडिया जिस जगह को किसी नदी की शुरुआत मानता है, वो ही आधिकारिक ठिकाना होती है।
हालांकि भारत के पूर्व सर्वेयर जनरल स्वर्ण सुब्बा राव कहते हैं कि हम किसी खास ठिकाने को नदी की शुरुआत बताते ही नहीं। वो कहते हैं कि सर्वे ऑफ इंडिया, नदी की पूरी घाटी का सर्वे करके नक्शा जारी कर देती है। कुछ देशों में नक्शों को गोपनीय कहकर जारी नहीं किया जाता। कई इलाकों की तो अब तक पैमाइश ही नहीं हो सकी है। इसके लिए सैटेलाइट से रिमोट सेंसिंग तकनीक की मदद से नक्शे तैयार किए जाते हैं। लेकिन, इनके आंकड़ों पर भी पक्के तौर पर यकीन नहीं किया जा सकता।
जेम्स कॉन्टोस कहते हैं कि नदियों की धाराएं अक्सर कुछ सालों में दशा-दिशा बदल लेती हैं। ऐसे में सैटेलाइट से मिले आंकड़े भरोसे लायक नहीं होते।
ऐसे में सवाल ये है कि क्या किसी नदी की शुरुआत का सही-सही पता होना जरूरी है? इसका जवाब है, हां। सही उद्गम पता होने से नदी के पानी का बेहतर इस्तेमाल हो सकता है। इसे खतरों से बचाने के लिए जरूरी इंतजाम करने में भी मदद मिलती है।
ये इसलिए भी जरूरी है कि हमें धरती के बारे में जानने का कौतूहल होता है। हम जानना चाहते हैं कि फलां पहाड़ कितना ऊंचा है। इसी तरह हम ये भी जानना चाहते हैं कि कोई नदी कितनी लंबी है। असल में ये दुनिया की खोज की दिशा में उठा एक कदम है।
जैसे, अमेजन या नील नदी के उद्गम के तमाम विकल्पों में से जिसे भी आप मानते हैं, उस हिसाब से दुनिया की सबसे लंबी नदी का खिताब दोनों नदियों में से किसी एक को ही मिलेगा। बात ये मामूली है, मगर है बेहद दिलचस्प। स्थानीय लोग इसमें गौरव महसूस करते हैं।
2012 में भारतीय वैज्ञानिक मलय मुखोपाध्याय ने टेम्स नदी के शुरुआती ठिकाने का दौरा किया। इसके बाद उन्होंने भारत में भी नदियों की उत्पत्ति की जगह पर कोई निशानी लगाने की मुहिम शुरू की।
इसीलिए उन्होंने दिसंबर 2015 में पूर्वी भारत की प्रमुख अजय नदी की शुरुआत का पता लगाया। फिर वहां उन्होंने निशानी के तौर पर बड़ा सा पत्थर लगा दिया। मुखोपाध्याय कहते हैं कि इससे जियो-टूरिज्म के दरवाजे खुलते हैं।
वो बताते हैं कि पत्थर लगाने के बाद एक स्थानीय आदमी ने उनसे कहा कि अब बाहर के लोग यहां घूमने आएंगे। इससे उसके बच्चे भी बाहर की दुनिया के बारे में जानने में दिलचस्पी लेंगे।
नदियों का हमारी जिंदगी पर गहरा असर पड़ता है। इसलिए इनकी शुरुआत के बारे में पता लगाना एक बड़े राज पर से पर्दा उठाने जैसा है।