पीरियड्स से पहले क्यों आता है आत्महत्या का ख्याल, जान लें ये जरूरी बात
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छायानिका कहती हैं, ''बात बहुत छोटी सी थी। हम लोग मेरी मम्मी के यहां गए थे और वापस आते हुए कहीं घूमने का प्लान था। लेकिन, मेरे पति काफी थक चुके थे तो इसलिए उन्होंने कहा कि हम सीधे घर चलते हैं। उनका इतना ही कहना था कि मैंने लड़ना शुरू कर दिया और फिर देर रात तक मेरा मूड ख़राब रहा। अगले एक-दो दिन भी मैं चिड़चिड़ी रही और फिर मुझे पीरियड्स हो गए।''
उस वक्त छायानिका नहीं जानती थीं कि उनके साथ जो हो रहा है वो क्या है। वो बताती हैं, ''मुझे पीरियड्स शुरू होने के एक-दो दिन पहले ही डिप्रेशन और चिड़चिड़ापन होने लगता है। सारी पुरानी बातें और ग़लतियां याद आती हैं और फिर सभी पर बहुत गुस्सा आता है। अकेले रहने का मन करता है। कभी-कभी खुद को खत्म कर देने के भी ख़याल आते हैं।'' लेकिन, एक दिन छायानिका को सोशल मीडिया के जरिए प्रीमेन्स्ट्रुअल डिस्फॉरिक सिन्ड्रॉम (पीएमडीडी) के बारे में पता चला। फिर जब उन्होंने इस बारे में और पता किया तो वो समझ पाईं कि उनके व्यवहार में अचानक बदलाव क्यों आता है।
पीरियड्स में होने वाले दर्द और शारीरिक परेशानियों बारे में तो महिलाएं जानती हैं लेकिन उससे जुड़े मानसिक बदलावों से वो अनजान रहती हैं। कई महिलाओं को पीरियड्स से पहले पीएमडीडी की समस्या होती है। उनके व्यवहार में बदलाव आता है और वो सबसे दूरी बना लेती हैं। ये समस्या कई बार ख़तरनाक स्तर तक भी पहुंच सकती है।
क्या है पीएमडीडी
मनोचिकित्सक संदीप वोहरा बताते हैं, ''पीएमडीडी के लक्षण पीरियड्स से दो-तीन दिन पहले दिखाई देने शुरू होते हैं। इसमें भावनात्मक और मानसिक लक्षण शारीरिक लक्षणों के साथ जुड़ जाते हैं। इस दौरान चिड़चिड़ापन, डिप्रेशन, तनाव, नींद न आना, बहुत ज़्यादा गुस्सा जैसे लक्षण दिखते हैं।''
''कुछ मामलों में महिलाओं को आत्महत्या के ख़याल भी आते हैं या वो गुस्से में दूसरों को नुकसान भी पहुंचा देती हैं। हालांकि, ऐसा बहुत कम मामलों में होता है।'' लेकिन, ज़रूरी नहीं कि इसमें हर महिला पर एक जैसा ही प्रभाव हो। जैसे छायानिका को पीरियड्स से पहले बहुत अकेलापन और चिड़चिड़ाहट होती है, लेकिन दिल्ली की रहने वालीं मानसी वर्मा का मामला कुछ मामला कुछ अलग है।
मानसी बताती हैं, ''मैं पीरियड्स से पहले बहुत उदासी महसूस करती हूं। पिछली बार पीरियड्स आने से पहले ही मेरे साथ ऐसा कुछ नहीं हुआ था कि मैं दुखी हो जाऊं लेकिन फिर भी मैं बहुत उदास हो गई थी। मन कर रहा था कि कहीं भाग जाऊं लेकिन किससे भाग रही हूं ये पता नहीं था। आत्मविश्वास नहीं था और असुरक्षित महसूस कर रही थी। मेरा पूरा दिन रोते हुए बीता।"
पीएमएस और पीएमडीडी में अंतर
''पीएमएस में सिर्फ़ विटामिन दे देते हैं लेकिन पीएमडीडी में पूरी तरह इलाज़ चलता है और काउंसलिंग की ज़रूरत भी पड़ती है। पीएमएस के लक्षण पीरियड्स से 5-6 दिन पहले शुरू होते हैं और पीरियड्स के दौरान भी रहते हैं। ये बहुत हल्के होते हैं।'' प्रीमेन्स्ट्रुअल डिस्फॉरिक सिन्ड्रॉम के लक्षण पीरियड्स से दो-तीन दिन पहले दिखाई देने शुरू होते हैं। इसमें शारीरिक लक्षणों के साथ भावनात्मक और मानसिक लक्षण भी जुड़ जाते हैं। इसका मानसिक प्रभाव ज़्यादा होता है।
डॉ. अनीता बताती हैं कि पीएमडीडी में मूड स्विंग बहुत ज़्यादा होते हैं। महिलाएं समाज से अलग-थलग महसूस करती हैं और काम पर भी इसका असर पड़ता है। अगर लक्षण बहुत ज़्यादा हैं और डॉक्टर को न दिखाया जाए तो महिला पूरी तरह डिप्रेशन में जा सकती है या खुद को नुकसान या दूसरों को नुकसान पहुंचा सकती हैं। हालांकि, ऐसे मामले बहुत कम देखने को मिलते हैं।
डॉक्टर संदीप कहते हैं कि इसके इलाज में पहले देखते हैं कि लक्षण किस स्तर के हैं। फिर दवाई के साथ-साथ काउंसलिंग भी की जाती है। कुछ मामलों में दवाई लगातार देनी पड़ती है और कुछ में सिर्फ़ पीरियड्स के दौरान दी जाती है।इसमें घरवालों और महिला दोनों को समझाया जाता है। परिवार की काउंसलिंग बहुत ज़रूरी होती है ताकि वो समझ सकें कि बहुत सी बातें मरीज के हाथ में नहीं हैं। ये हार्मोनल और दिमाग़ में कैमिकल के असंतुलन के कारण होता है। वहीं, मरीज को ये समझाया जाता है कि अगर ये पीरियड्स के आसपास हो रहा है तो आप कुछ चीजों का ध्यान रख सकते हो। जैसे नींद पूरी लें, खाना समय से खाएं ताकि मूड ख़राब होने का कोई कारण न बने।
जानकारी की कमी
पीएमएस और पीएमडीडी दोनों को लेकर महिलाओं में जानकारी का अभाव है। पुरुषों को तो इसकी जानकारी और भी कम है। वहीं, पीएमडीडी के मामले भी बहुत कम होती है इसलिए भी महिलाओं को इसकी जानकारी नहीं होती। डॉक्टर संदीप कहते हैं कि महिलाओं को अगर इस समस्या की जानकारी हो तो वो इससे खुद को समझ पाती हैं। उस समय वो अपना ज़्यादा ख़याल भी रख सकती हैं।
मानसी वर्मा कहती हैं कि जब से उन्हें पीएमडीडी के बारे में पता चला है तब से उन्होंने फ़ैसला किया है कि वो अपने पीरियड्स का ध्यान रखेंगी और अपने व्यवहार पर गौर करेंगी। पहले वो ऐसा नहीं करती थीं। अब उन्होंने अपनी मां से भी इस पर बात करना शुरू कर दिया है।
वहीं, डॉक्टर संदीप साफ़तौर पर ये बताते हैं कि पीएमडीडी बॉयोलॉजिकल कारणों से होता है ये कोई मानसिक रोग नहीं है और इसका इलाज संभव है। अगर लक्षण बहुत गहरे नहीं हैं तो अपना ध्यान रखकर और परिवार के सहयोग भी सब ठीक हो जाता है।