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कोमा में पड़े इंसान से बात करना मुमकिन होगा?

Sun, 08 May 2016 12:47 PM IST
डेविड कॉक्स
डेविड कॉक्स Updated Sun, 08 May 2016 12:47 PM IST
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a woman trapped in her body spoke once again
कोमा में पड़े इंसान से बात करना संभव! - फोटो : bbc

कई बार चोट या किसी हादसे के चलते लोग कोमा में चले जाते हैं। उनकी सुनने, सोचने-समझने, बोलने और महसूस करते की ताकत खत्म हो जाती है। उनकी बस सांसें चलती रहती हैं। वो बस नाम के लिए जिंदा रहते हैं।

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कुछ लोग ऐसी बीमारी के भी शिकार हो जाते हैं कि वो चल-फिर नहीं सकते। वो देख-सुन सकते हैं। समझ सकते हैं। महसूस कर सकते हैं। मगर अपने एहसास को बयां नहीं कर सकते। इस बीमारी को एएलएस या "एमायोट्रॉफिक लैटेरल स्क्लेरोसिस'' कहते हैं।
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कुछ ऐसा ही हुआ जर्मनी की वालट्रॉट फैनरिक के साथ। उनके पति जोआचिम बताते हैं कि 2007 में जमीन पर गिरे सिक्के को उठाते वक्त वालट्रॉट के साथ जाने क्या हुआ कि वो गिर पड़ीं और फिर नहीं उठ सकीं। तीन महीने बाद उन्हें पता चला कि वालट्रॉट को "एमायोट्रॉफिक लैटेरल स्क्लेरोसिस'' या एएलएस है।
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दोनों की जिंदगी तो तबाह सी हो गई। ये हादसा मई 2007 में पेश आया था। सितंबर के आते आते वालट्रॉट के सांस लेने के सिस्टम ने काम करना बंद कर दिया था।

जोआचिम कहते हैं कि जब उन्हें ये पता चला तो वो सारा दिन अस्पताल में रोते फिरते रहे। वो समझ नहीं पा रहे थे कि आखिर इतनी जल्दी जिंदगी कैसे बदल गई। अभी कुछ महीने पहले फैनरिक दंपति हाथों में हाथ डाले बागों की सैर किया करते थे।

2010 में डॉक्टरों ने बताया कि वालट्रॉट पूरी तरह से कोमा में चली गई हैं। उसी हाल में वो आज तक हैं।

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ऐसा नहीं कि वालट्रॉट को कुछ महसूस नहीं होता। उन्हें कमरे की गर्मी सर्दी का एहसास होता है। एक जगह पर बरसों से पड़े रहने का दर्द भी होता है। वो लोगों की बातें भी सुन सकती हैं। मगर उनका दिमाग क्या सोच रहा है? ये अब से कुछ दिनों पहले तक किसी को पता नहीं चलता था।

जर्मनी की ट्यूबिन्जेन यूनिवर्सिटी के न्यूरोसाइंटिस्ट नील्स बीरबॉमर ने अपना पूरा करियर ऐसे लोगों की बीमारी समझने में लगा दिया है जिन्हें ऐसी बीमारी है। जो महसूस तो करते हैं। मगर अपने एहसास बता नहीं पाते। नील्स को लगता है कि अब उन्हें इस अंधेरे रास्ते में रौशनी दिखने लगी है।

एफएमआरआई तकनीक से वैज्ञानिक ऐसे लोगों के दिमाग की हरकतें पढ़ सकते हैं जो कोमा में सुन्न पड़े होते हैं। ऐसे लोगों को ट्रेनिंग देकर हां या ना करने का काम भी कराया जा सकता है। कनाडा के एड्रियन ओवेन ने ये तरीका खोजकर कोमा में पड़े लोगों से बातचीत का रास्ता खोला था।

दिक्कत ये है कि एफएमआरआई कराना बहुत परेशानी वाला और खर्चीला काम है। इसी वजह से जर्मन वैज्ञानिक नील्स और उनके साथी, ऐसे लोगों से बात करने का नया तरीका खोजने में लगे हैं।

अस्सी के दशक से ही ऐसी तकनीक मौजूद है जिससे इंसान के दिमाग के उस हिस्से का पता लगाया जा सकता है जहां पर जबानों के और काबिलियत के संदेश पढ़े और समझे जाते हैं। इस तकनीक की मदद से अल्जाइमर बीमारी की वजह समझने में भी मदद मिली है।

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नील्स ने अपने तमाम तजुर्बों से पाया कि जब कोमा में पड़ा इंसान हां या ना कहना चाहता है तो दोनों ही सूरतों में दिमाग में खून की दौड़ान की रफ्तार एकदम अलग होती है।

नील्स ने एक ब्रेन कंप्यूटर बनाया। इसकी मदद से उन्होंने वालट्रॉट से उनके पति की आवाज में कई सवाल पूछे। जैसे कि, क्या लंदन इंग्लैंड की राजधानी है? क्या पेरिस जर्मनी की राजधानी है? क्या तुम्हारा नाम वालट्रॉट है?

इस दौरान नील्स का बनाया ब्रेन कंप्यूटर, वालट्रॉट के दिमाग की हरकतों पर नजर रखता था। करीब पच्चीस सेकेंड के बाद वालट्रॉट के दिमाग की हरकतों से उनके सवालों के जवाब मिल जाते थे। धीरे-धीरे, नील्स को वालट्रॉट से ज्यादातर सवालों के जवाब मिलने लगे।

नील्स बताते हैं कि कुछ सवालों के जवाब आपको पता होते हैं। तो आप चाहें न चाहें, आपका दिमाग वो सवाल सुनते ही प्रतिक्रिया देता है। जवाब देता है। हां या ना वाले जवाब देते वक्त दिमाग अलग तरह से रिएक्ट करता है।

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इसके लिए बहुत ज्यादा दिमाग लगाने की जरूरत नहीं होती। जब वालट्रॉट से ये सवाल किए जाते हैं तो नील्स का ब्रेन कंप्यूटर ये पता लगा सकता है कि वालट्रॉट का दिमाग सोया है या जाग रहा है।

हालांकि नील्स को इस बात की तसल्ली होनी बाकी थी कि वो वालट्रॉट का दिमाग सही तरीके से पढ़ पा रहे हैं। इस बात का पता लगाना टेढ़ी खीर है। क्योंकि दिमाग के भीतर हंगामा सा बरपा रहता है। एक साथ बहुत से काम होते रहते हैं। जब किसी मरीज का दिमाग सवालों के जवाब सोच रहा होता है। उसी वक्त दिमाग लाखों और काम भी कर रहा होता है। उन लाखों कामों में से अपने सवाल का जवाब तलाशना बड़ी चुनौती है।

इसके लिए नील्स ने कंप्यूटर के जरिए वालट्रॉट से सरल सवाल कई बार पूछे। जब ये तय हो गया कि वालट्रॉट ने कम से कम सत्तर फीसद बार इन सवालों के सही जवाब दिए, तब तक ब्रेन कंप्यूटर पर वो जवाब दर्ज नहीं किए गए।

नील्स कहते हैं कि ये जरूरी है कि मरीज को ब्रेन कंप्यूटर से बात करने की आदत हो जाए। इसके बाद भी आपको इस बात की तसल्ली करनी होगी कि आप अपने ही सवालों के जवाब मरीज के दिमाग से पा रहे हैं।

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नील्स, अपना तजुर्बा बताते हैं। एक बार उन्होंने वालट्रॉट से पूछा कि क्या आप घर पर हैं। इसका जवाब हर बार हां में मिला। फिर नील्स ने कुछ मुश्किल सवाल किए। मसलन, क्या आप तकलीफ में हैं? क्या आप अपने पति को देखना चाहती हैं? क्या आप जीना चाहती हैं? 

कोमा में जाने वाले तमाम मरीजों की तरह वालट्रॉट भी वेंटिलेटर पर हैं। उन्हें नली के जरिए खाना खिलाया जाता है।

डॉक्टर मानते हैं कि उन्हें अब किसी चीज का स्वाद नहीं आता। लेकिन वालट्रॉट के पति जोआचिम अपनी पत्नी का बहुत खयाल रखते हैं। वो अभी भी साथ-साथ छुट्टी पर जाते हैं। जब भी उनकी पसंदीदा गायिका हेलेन फिशर का शो होता है। दोनों साथ जाते हैं। जोआचिम अपनी बीवी को व्हीलचेयर पर ले जाते हैं, शो दिखाने के लिए।

नील्स कहते हैं कि एक सवाल से ये पता चलता है कि अपने हालात से मरीज परेशान होकर मरना चाहता है या फिर जीने की तमन्ना उनके अंदर है।
अगर मरीज से ये पूछा जाए कि क्या आप खुद को अपने परिवार पर बोझ समझते हैं? अगर मरीज का जवाब हां है तो इसका मतलब ये है कि मरीज अब नहीं जीना चाहता। जो लोग हमेशा जीने की चाहत जताते हैं उनके लिए उनके परिजन बेहतर माहौल बनाए रखते हैं। हमेशा उनसे प्यार जताते हैं। उनकी अहमियत का उन्हें एहसास कराते हैं।

नील्स बताते हैं कि उनके सवालों के जो जवाब मिले हैं उनसे ये पता चलता है कि वालट्रॉट जीना चाहती हैं। उनके पति कहते हैं कि, ''हमारा रिश्ता अभी बहुत मजबूत है''।

दिक्कत ये है कि जोआचिम अपनी पत्नी से तीन महीने में सिर्फ एक बार बात कर पाते हैं, जब नील्स और उनकी टीम घर आती है। अब जोआचिम खुद एक ब्रेन कंप्यूटर खरीदना चाहते हैं। ताकि वो अपनी पत्नी से जब जी चाहे तब बात कर सकें। लेकिन वो बहुत महंगा है और बीमे की रकम से नहीं खरीदा जा सकता।

वहीं नील्स के पास वालट्रॉट जैसे पांच और मरीज हैं। वो उम्मीद जता रहे हैं कि एक दिन उनका तजुर्बा ऐसे मरीजों से बातचीत करने में का आएगा। हालांकि अभी तो उनके रिसर्च की ये शुरुआत भर है। ऐसे ही रिसर्च करने वाले दूसरे लोगों ने नील्स के तजुर्बों पर सवाल भी उठाए हैं।

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फिर कुछ लोग नैतिकता का सवाल उठाते हैं। कोमा में पड़े मरीज के दिमाग पर इतना जोर डालना सही है या नहीं। कि उनसे जिंदगी और मौत के सवाल किए जाएं।

नील्स कहते हैं कि कोमा में पड़े मरीजों की दिमागी तरंगों की रफ्तार आम इंसानों जैसी ही यानी पांच हर्त्ज की होती है, जब वो सोते रहते हैं। इसका मतलब ये कि लकवे के शिकार इंसान पर लंबे वक्त पर कुछ-कुछ सो जाने जैसा असर होता है।

वहीं कोमा में पड़े मरीजों को तमाम एहसास अच्छे से होते रहते हैं। ऐसे में अगर वो अपनी बात किसी भी तरीके से बता पाते हैं तो वो मरीज और तीमारदार, दोनों के लिए अच्छा होगा।

वैसे कुछ जानकार कहते हैं कि कोमा में पड़ा हर मरीज अपने एहसास ब्रेन कंप्यूटर को बता पाएगा, ये कहना जरा मुश्किल है। कई बार उनके जवाब गलत भी समझे जा सकते हैं। इससे उनकी तकलीफ बढ़ने का डर है।

वहीं नील्स को उम्मीद है कि आगे चलकर वो ऐसी तकनीक विकसित कर लेंगे, जिससे कोमा में पड़े इंसान से बात करना मुमकिन हो सकेगा। 

फिलहाल तो ब्रेन कंप्यूटर उनके दिमाग की सिर्फ हां या ना को समझ सकता है। इसमें भी सत्तर फीसद ही कामयाबी होती है। अगर यही कामयाबी अस्सी फीसद हो जाए तो कंप्यूटर, मरीज के दिमाग से निकलने वाले शब्द भी पकड़ सकेगा। मगर ये अभी दूर की कौड़ी है। नील्स कहते हैं कि अगर वो ऐसा करने में कामयाब हुए तो सुकून से मर सकेंगे।

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