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EV vs Petrol: ईवी बनाम पेट्रोल बहस, भाविश अग्रवाल के 90% सस्ते दावे पर सवाल, सोशल मीडिया ने किया फैक्ट-चेक

Thu, 22 Jan 2026 02:01 PM IST
अमर शर्मा ऑटो डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
ऑटो डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: अमर शर्मा Updated Thu, 22 Jan 2026 02:01 PM IST
सार

ओला के फाउंडर और ओला इलेक्ट्रिक के CEO भाविश अग्रवाल ने हाल ही में इलेक्ट्रिक गाड़ियों के बारे में एक बड़ा दावा करके सोशल मीडिया पर एक गरमागरम बहस छेड़ दी है।

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Bhavish Aggarwal’s EV Cost Calculation Sparks Debate on True Savings
Bhavish Aggarwal, CEO, Ola - फोटो : Ola

विस्तार

ओला इलेक्ट्रिक के संस्थाक और सीईओ भाविश अग्रवाल के एक सोशल मीडिया पोस्ट ने इलेक्ट्रिक वाहनों (ईवी) की लागत को लेकर नई बहस छेड़ दी है। सोशल मीडिया X (एक्स) पर किए गए पोस्ट में उन्होंने दावा किया कि ईवी पेट्रोल वाहनों की तुलना में चलाने में 90 प्रतिशत तक सस्ते हैं। उन्होंने अपने इस दावे के समर्थन में आंकड़े भी साझा किए। हालांकि, जहां कई लोग इस बात से सहमत दिखे कि रोजमर्रा के इस्तेमाल में ईवी सस्ते पड़ते हैं, वहीं नेटिजन्स ने इस तुलना को अधूरा बताया।
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EV की लागत को लेकर भविष अग्रवाल का गणित
भविष अग्रवाल ने अपने पोस्ट में लिखा कि लोगों को ईवी से होने वाली बचत की सही समझ नहीं है। उन्होंने पेट्रोल और इलेक्ट्रिक दोपहिया वाहनों की तुलना करते हुए कहा कि पेट्रोल बाइक अगर 50 किमी प्रति लीटर का माइलेज दे और पेट्रोल 100 रुपये प्रति लीटर हो, तो खर्च 2 रुपये प्रति किलोमीटर आता है। वहीं, एक इलेक्ट्रिक स्कूटर अगर 30 Wh प्रति किमी की खपत करता है, तो बिजली की दर 6.5 रुपये प्रति यूनिट पर खर्च करीब 0.2 रुपये (20 पैसा) प्रति किमी बैठता है। इसी आधार पर उन्होंने ईवी को 90 प्रतिशत सस्ता बताया।

ऊर्जा लागत के लिहाज से यह गणित गलत नहीं है। रोजाना सफर करने वालों के लिए ईवी चार्ज करना वाकई पेट्रोल भरवाने से काफी सस्ता पड़ता है। 



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क्या EV वाकई 90% सस्ते हैं?
नेटिजन्स ने तुरंत यह सवाल उठाया कि रनिंग कॉस्ट पूरी कहानी नहीं बताती। किसी भी वाहन की टोटल कॉस्ट ऑफ ओनरशिप (TCO) (स्वामित्व की लागत) में कई और बातें शामिल होती हैं। सबसे बड़ी आपत्ति वाहन की शुरुआती कीमत और तेजी से होने वाली डिप्रिसिएशन (अवमूल्यन) को लेकर थी।

एक यूजर ने लिखा कि ईवी स्कूटर की शुरुआती कीमत ज्यादा होती है। इसलिए पहले 1-2 साल में कुल लागत ज्यादा रहती है। और 5-6 साल बाद भी 90 प्रतिशत तक की बचत नहीं होती।

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बैटरी लाइफ और रिप्लेसमेंट पर सवाल
कई लोगों ने ईवी बैटरी को लेकर चिंता जताई। चार्जिंग भले ही सस्ती हो, लेकिन बैटरी हमेशा नहीं चलती। यूजर्स ने सवाल उठाया कि 3-5 साल बाद बैटरी बदलने में कितना खर्च आएगा। कुछ लोगों ने बैटरी डिस्पोजल (यानी पुरानी बैटरियों को सही तरीके से फेंकना) के बारे में जानकारी की कमी और खराब बैटरियों के पर्यावरणीय प्रभाव पर भी सवाल उठाए। और पूछा कि क्या ईवी उतनी ही क्लीन हैं जितना उन्हें बताया जाता है।

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सुरक्षा को लेकर भी उठी चिंताएं
कुछ यूजर्स ने तंज कसते हुए कहा कि सबसे बड़ी बचत तब होती है जब वाहन आग न पकड़े। उन्होंने ईवी स्कूटरों में ओवरहीटिंग और आग लगने की पुरानी घटनाओं का जिक्र करते हुए सुरक्षा को बड़ी चिंता बताया।

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समर्थन करने वालों की भी कमी नहीं
आलोचनाओं के बावजूद, कई लोगों ने भाविश अग्रवाल के पोस्ट का समर्थन भी किया। उनका कहना था कि ऊर्जा लागत के लिहाज से ईवी वाकई बड़ी बचत देते हैं और इस पहलू पर ध्यान जाना जरूरी है।

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असल तस्वीर क्या कहती है?
वास्तविक आंकड़े बताते हैं कि ईवी लंबे समय में फायदेमंद जरूर हैं। पांच साल में ईंधन खर्च में अच्छी-खासी बचत होती है और मेंटेनेंस भी कम होता है। लेकिन ऊंची शुरुआती कीमत, बैटरी लागत, रीसेल वैल्यू और सुरक्षा को लेकर धारणा इन फायदों को कुछ हद तक कम कर देती है।

नतीजा यह है कि ईवी लंबे समय में सस्ते तो हैं, लेकिन "90 प्रतिशत सस्ते" होने का दावा शुरुआती वर्षों में पूरी तरह सही नहीं बैठता। 

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