भारत में कैसे सस्ती होगी इलेक्ट्रिक गाड़ियों की सवारी, जब चीन की चालबाजियां पड़ रही सब पर भारी
- इलेक्ट्रिक वाहनों में बैटरी का अहम रोल
- लिथियम बैटरियां भारी होने के साथ लंबी दूरी तय नहीं कर सकती
- लिथियम-कोबाल्ट के लिए चीन पर निर्भर
- भारत को हर साल 3.5 लाख टन लिथियम की जरूरत
- दोपहिया वाहनों की कीमत में 70 फीसदी कीमत बैटरी की
- दुनिया के 60 फीसदी बैटरी बाजार पर चीन का कब्जा
- चीन की घटिया क्वालिटी की बैटरियों की भारत में बिक्री
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विस्तार
यह सही है कि इलेक्ट्रिक कारें दुनिया का भविष्य हैं लेकिन यह भविष्य तभी साकार होगा, जबकि बाजार में इलेक्ट्रिक कारों के लिए सस्ती बैटरियां मौजूद होंगी। हालांकि इलेक्ट्रिक वाहनों को प्रोत्साहित करने के लिए लॉन्च की गई फेम-2 योजना में इलेक्ट्रिक गाड़ियों पर सब्सिडी मिल रही है, बावजूद इसके उनकी कीमत सामान्य कार से लगभग दोगुना पड़ती है। ऐसे में महंगी बैटरियों के साथ जल्द से जल्द इलेक्ट्रिक वाहनों को अपनाना क्या भारत के हित में होगा?
इलेक्ट्रिक वाहनों में बैटरी का अहम रोल
इसका उत्तर बिल्कुल स्पष्ट है अगर बैटरी सस्ती होंगी, तो इलेक्ट्रिक कारों को जल्द से जल्द अपनाने में कोई बुराई नहीं है। जिस तरह एक पेट्रोल कार में सबसे अहम हिस्सा इंटरनल कंबशन इंजन होता है, ठीक वैसे ही इलेक्ट्रिक वाहनों में बैटरी का रोल होता है। फिलहाल इलेक्ट्रिक वाहनों में लिथियम-आयन बैटरियों का इस्तेमाल हो रहा है। लिथियम का इस्तेमाल ही इलेक्ट्रिक वाहन के व्यापक इस्तेमाल में रोड़ा बन रहा है।
लिथियम के लिए चीन पर निर्भर
असल में लिथियम के साथ सबसे बड़ी दिक्कत है कि ये बैटरियां भारी होने के साथ लंबी दूरी तय नहीं कर सकती हैं, वहीं इनके कच्चे माल के लिए हमें हमेशा चीन पर ही निर्भर रहना पड़ता है। वजह है कि चीन ने लिथियम की अहमयित को ध्यान में रखते पहले ही अफ्रीका समेत दुनियाभर में फैले भंडारों पर कब्जा जमा चुका है। वहीं उद्योग जगत के आंकड़ों के मुताबिक भारत को हर साल 3.5 लाख टन लिथियम की जरूरत है।
इलेक्ट्रॉन्स पैदा करता है लिथियम
इसे इस तरह से समझा जा सकता है कि एक परंपरागत इलेक्ट्रिक वाहन में लगभग 500 किग्रा का बैटरी पैक होता है। जिसमें 100 से ज्यादा लिथियम आयन छड़ों के अलावा मिश्रित लिथियम, कोबाल्ट, निकिल, और मैंगनीज धातु होती है। हर धातु का अपना उपयोग है, जैसे लिथियम इलेक्ट्रॉन्स पैदा करता है, जो बैटरी चार्ज करने में सहायक होते हैं, वहीं कोबाल्ट बैटरी को ओवरहीटिंग होने से बचाता है। लेकिन समस्या यह है कि दुनियाभर में लिथियम या कोबाल्ट के भंडार धीरे-धीरे खत्म हो रहे हैं।
लिथियम की वजह से महंगी हैं इलेक्ट्रिक कारें
केवल कुछ ही देशों में लिथियम के भंडार बचे हुए हैं। बोलिविया और चिली में 65 फीसदी लिथियम भंडार हैं, तो कांगो में 54 फीसदी कोबाल्ट के भंडार हैं। लेकिन बढ़ती मांग ने दोनों को महंगा कर दिया है। आज दोपहिया वाहनों की कीमत में 70 फीसदी कीमत बैटरी की होती है, जबकि कारों में यह आंकड़ा 50 फीसदी का है। वहीं भारत में इन दोनों के स्रोत होने के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली है। हाल ही में जारी एक मेटल बुलेटिन रिपोर्ट का कहना है कि 2018 से लिथियम बैटरी ग्रेड वाले यौगिकों की कमी की शुरुआत हो चुकी है।
भारत दूसरा सबसे बड़ा कोबाल्ट आयातक देश
वॉल स्ट्रीट जनरल की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक चीन कोबाल्ट को कांगो से आयात करता है, जो इस धातु का दुनिया का सबसे बड़ा उत्पादक है। चीन ने 2017 में पहले नौ महीनो में 120 करोड़ डॉलर के कोबाल्ट का आयात किया, वहीं 32 लाख डॉलर के कोबाल्ट का आयात किया। भारत कोबाल्ट आयात करने वाला दूसरा सबसे बड़ा देश है। अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण के मुताबिक दुनियाभर में कोबाल्ट की मांग बढ़ने के चलते उत्पादन 2000 से बढ़कर लगभग 123,000 मीट्रिक टन प्रति वर्ष हो गया है। इन दोनों धातुओं का इस्तेमाल इलेक्ट्रिक वाहनों को पावर देने के अलावा स्मार्टफोन, लैपटॉप, स्पेस टेक्नोलॉजी और डिफेंस में होता है।
कोबाल्ट खानों पर चीनी कंपनियों का कब्जा
वहीं चीन ने दूरदर्शिता का परिचय देते हुए खुद को बैटरी हब के तौर पर स्थापित कर लिया है। कांगों की आधे से ज्यादा कोबाल्ट खानों पर चीनी कंपनियों का कब्जा है। आज पूरी दुनिया के 60 फीसदी बैटरी बाजार पर चीन का कब्जा है। वहीं वह लगातार कागों, बोलिविया, चिली और आस्ट्रेलिया में अपनी पहुंच बढ़ा रहा है। जिसके बाद इलेक्ट्रिक वाहनों को सप्लाई होने वाले कोबाल्ट और लिथियम को लेकर चीन पर हमारी निर्भरता बढ़ती जा रही है। वहीं महंगी इलेक्ट्रिक कारें बनाने के लिए मशहूर टेस्ला जैसी बड़ी कंपनियों को भी इस समस्या के लिए चिंतित होने की जरूरत है।
कंपनियों ने बदली रणनीति
लेकिन अब कई कंपनियों को चीन की इस रणनीति का अंदाजा होने लगा है। कई देशों ने लिथियम आयन वाली बैटरियों की जगह नेक्स्ट जेनरेशन बैटरियां विकसित करने की कोशिशें शुरू कर दी हैं। पैनासोनिक, टेस्ला, टोयोटा इनमें सबसे आगे हैं। भारत में भी टेस्ला ने फैक्टरी लगाने में दिलचस्पी दिखाई है। इन कंपनियों की कोशिश है कि कैसे कोबाल्ट के इस्तेमाल को कम किया जाए और इसकी जगह सल्फर, सोडियम और मैग्नीशियम का इस्तेमाल किया जाए।
हो फ्यूल सेल्स का इस्तेमाल
वहीं फ्यूल सेल्स का इस्तेमाल भी उपयोगी साबित हो सकता है। फ्यूल सेल से चलने वाले इलेक्ट्रिक वाहनों में हाइड्रोजन का इस्तेमाल किया जाता है, जो केवल पानी की भाप और गर्म हवा का उत्सर्जन करते हैं। लेकिन इसमें सबसे बड़ी जरूरत इसकी कीमतों में कमी लाने की है। जनरल मोटर्स और एयरबस पहले ही ग्लोबल हाइड्रोजन काउंसिल का हिस्सा हैं, जो फ्यूल सेल के जरिए परिवहन को बढ़ावा देना चाहती है।
चीन से आती हैं घटिया क्वॉलिटी की बैटरियां
वहीं भारत के लिए इलेक्ट्रिक वाहनों के सपने को सही अंजाम तक पहुंचाने के लिए दो ही विकल्प बचे हैं। या तो वह महंगा कोबाल्ट और लिथियम खरीदे और बैटरी के निर्माण में अपनी विशेषज्ञता हासिल करें। या फिर चीन से बैटरियों का आयात करे। लेकिन चीन से आयात बैटरियों की क्वालिटी इतनी घटिया है कि इसका भारत के इलेक्ट्रिक प्रोग्राम पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। भारत में इलेक्ट्रिक व्हीकल्स कार्यक्रम से जुड़े एक अधिकारी का कहना है कि बैटरी टेक्नोलॉजी लगातार बदल रही है और पुरानी बैटरियों का वहां कोई बाजार नहीं है। जिसके चलते चीन में दोयम दर्जे के बैटरी निर्माता भारत में ये बैटरियां बेच रहे हैं, क्योंकि चीन में उनका कोई खरीदार नहीं है।
भारत में सस्ती बैटरियां बनानी होंगी
लेकिन अधिकांश कंपनियां बैटरी बनाने की जगह इंपोर्ट करना पंसद करती हैं। अकेले भारत में ही इलेक्ट्रिक स्कूटरों में 90 फीसदी से ज्यादा पार्ट्स चीन से आते हैं, वहीं भारतीय कारों में 10 से 15 फीसदी पार्ट्स आयातित होते हैं। जबकि इलेक्ट्रिक वाहनों में आयात निर्भरता 70 फीसदी से ज्यादा होगी। इलेक्ट्रिक वाहन ऑटोमोबाइल सेक्टर का भविष्य हैं, लेकिन भविष्य तभी उज्जवल हो सकता है जब नई टेक्नोलॉजी वाली सस्ती बैटरियां भारत में उपलब्ध हों। जिसकी अभी से ही शुरुआत करने की जरूरत है।
जापान भी नहीं तोड़ पाया चीन की बादशाहत
इसके लिए जापान का उदाहरण समझने की जरूरत है। वहां इलेक्ट्रिक कारें 10 साल पहले ही आ गई थीं, लेकिन बैटरी टेक्नोलॉजी में वह मात खा गया और चीन के एकाधिकार को नहीं तोड़ पाया। यहां तक कि नए इलेक्ट्रिक वाहनों में वही पुरानी जेनरेशन की लिथियम आयन बैटरियां ही इस्तेमाल हो रही हैं।
इलेक्ट्रिक कारों से गैर जरूरी पार्ट्स खत्म हों
वहीं भारत में इलेक्ट्रिक वाहनों को फुल स्पीड में दौड़ने के लिए दो बातों पर ध्यान देने की जरूरत है। पहला, इलेक्ट्रिक वाहनों में से गैर जरूरी पार्ट्स जैसे मल्टीपल स्पीड ट्रांसमिशन को खत्म किया जाए, क्योंकि इलेक्ट्रिक मोटर्स एक ही तरह का टॉर्क जेनरेट करती है, इसलिए उसमें क्लच और गियरबॉक्स की कोई जरूरत नहीं है। चूकिं इलेक्ट्रिक गाड़ियां प्रदूषण रहित होती हैं, तो इनमें एग्जास्ट पाइप लगाने की कोई आवश्यकता नहीं हैं। एक इलेक्ट्रिक वाहन में तकरीबन 20 मूविंग पार्ट्स होते हैं, जबकि सामान्य पेट्रोल या डीजल गाड़ी में यह संख्या 2000 से ज्यादा होती है।
स्टार्टअप ने बनाई 1,000 किमी तक चलने वाली बैटरी
दूसरा, भारत को अगले 10 सालों में नेक्स्ट जेनरेशन बैटरी टेक्नोलॉजी में मार्केट लीडर बनने की तैयारी अभी से करनी होगी। जिसके लिए एक्सपर्ट्स के साथ स्टार्टअप्स को भी आगे बढ़ाना होगा और उन्हें रिसर्च के लिए फंडिंग मुहैया करानी होगी। इसके लिए हमें आईआईटी रुड़की के एक स्टार्टअप्स लॉग 9 मैटेरियल्स से सबक लेने की जरूरत है। जिसने ग्रैफेन से बनी मैटल एयर बैटरी बनाई है, जिसे एलुमीनियम को एनोड, हवा को कैथोड और पानी को इलेक्ट्रोलाइट की तरह इस्तेमाल किया जाता है। इसस बैटरी को रिचार्ज करने की भी जरूरत नहीं होती और हर 100 किमी पर पानी से रिफ्यूल करना पड़ता है। न तो इसमें लिथियम का इस्तेमाल होता है और न ही कोबाल्ट का। वहीं इनकी बैटरी लगी रेंजर डेमो कार एक बार में 1,000 किमी तक चली जाती है, जिसके बाद केवल एलुमीनियम बदलना पड़ता है, जिसे मिनटों में बदला जा सकता है।