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Shankaracharya Jayanti 2020: शंकराचार्य जयंती पर जानिए शंकर से शंकराचार्य बनने की कहानी
Tue, 28 Apr 2020 01:38 PM IST
रुस्तम राणा
धर्म डेस्क, अमर उजाला
धर्म डेस्क, अमर उजाला
Published by: रुस्तम राणा
Updated Tue, 28 Apr 2020 01:38 PM IST
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शंकराचार्य जयंती 2020
- फोटो : adi shankaracharya
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Adi Shankaracharya Jayanti 2020: आज आदि गुरु शंकराचार्य की जयंती है। उन्होंने सनातन धर्म के प्रसार-प्रचार और संरक्षण के लिए महान कार्य किया है। गुरु शंकराचार्यजी का जन्म वैशाख शुक्ल पंचमी को दक्षिण राज्य केरल के कालड़ी नामक ग्राम में ब्राह्मण परिवार में हुआ था। वे अल्पायु थे। उन्होंने केवल 32 वर्ष की आयु में अपना शरीर त्याग दिया था। आइए उनकी जयंती के इस मौके पर जानते हैं आदि गुरु शंकराचार्य के जन्म से जुड़ी रोचक कथा...
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ब्राह्राण दंपति के विवाह होने के कई साल के बाद भी कोई संतान नहीं हुई। संतान प्राप्ति के लिए ब्राह्राण दंपति ने भगवान शंकर की आराधना की। उनकी कठिन तपस्या से खुश होकर भगवान शंकर ने सपने में उनको दर्शन दिए और वरदान मांगने को कहा।
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इसके बाद ब्राह्राण दंपति ने भगवान शंकर से ऐसी संतान की कामना की जो दीर्घायु भी हो और उसकी प्रसिद्धि दूर दूर तक फैले। तब भगवान शिव ने कहा कि या तो तुम्हारी संतान दीर्घायु हो सकती है या फिर सर्वज्ञ, जो दीर्घायु होगा वो सर्वज्ञ नहीं होगा और अगर सर्वज्ञ संतान चाहते हो तो वह दीर्घायु नहीं होगी। तब ब्राह्राण दंपति ने वरदान के रूप में दीर्घायु की बजाय सर्वज्ञ संतान की कामना की।
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वरदान देने के बाद भगवान शिव ने ब्राह्राण दंपति के यहां संतान रूप में जन्म लिया। वरदान के कारण ब्राह्राण दंपति ने पुत्र का नाम शंकर रखा। शंकराचार्य बचपन से प्रतिभा सम्पन्न बालक थे। जब वह मात्र तीन साल के थे तब पिता का देहांत हो गया। तीन साल की उम्र में ही उन्हें मलयालम का ज्ञान प्राप्त कर लिया था।
शंकराचार्य के संन्यास ग्रहण की कहानी बहुत ही अनोखी है। बालक शंकर का रूझान संन्यासी बनने की तरफ था। उनकी माता अपने एकमात्र पुत्र को संन्यासी बनने की आज्ञा नहीं दे रही थी। तब एक दिन नदी किनारे एक मगरमच्छ ने शंकराचार्य जी का पैर पकड़ लिया तब इस वक्त का फायदा उठाते शंकराचार्यजी ने अपने माँ से कहा माँ मुझे संन्यास लेने की आज्ञा दे दो नहीं तो यह मगरमच्छ मुझे खा जाएगा।, इससे भयभीत होकर माता ने तुरंत इन्हें संन्यासी होने की आज्ञा प्रदान कर दी।
आदि गुरु शंकराचार्य का जन्म भले ही दक्षिण भारत में हुआ हो लेकिन लेकिन उनका कार्यक्षेत्र संपूर्ण भारत था। उन्होंने अद्वैत वेदांत के दर्शन का विस्तार किया। सनातन धर्म का संरक्षण करने के लिए आदि गुरु ने भारत के चारों कोनों में चार मठों की स्थापना की। जो आज भी हिंदू धर्म के सबसे पवित्र मठ माने जाते हैं और आस्था के बड़े केन्द्र हैं।