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Pushya Nakshatra: गुरु पुष्य और रविपुष्य के मुहूर्त आपके लिए वरदान कैसे

Sun, 20 Oct 2019 04:42 PM IST
विनोद शुक्ला पं जयगोविंद शास्त्री
पं जयगोविंद शास्त्री Published by: विनोद शुक्ला Updated Sun, 20 Oct 2019 04:42 PM IST
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what is pushya nakshatra importance in muhurat astrology
नक्षत्र
21 अक्तूबर 2019 सोमवार को शाम 05 बजकर 30 पर पुष्य नक्षत्र आरंभ हो रहा है जो 22 अक्तूबर मंगलवार को शाम 04 बजकर 37 मिनट तक चलेगा। इसी अवधि के मध्य गुरु और सूर्य की होरा जब-जब मिले उसमे अपने कार्य आरंभ कर सकते हैं। पुष्य नक्षत्र हर सत्ताईसवें दिन आता है किन्तु हर बार गुरुवार या रविवार ही हो ये तो संभव नही हैं इसलिए इस नक्षत्र के दिन गुरु एवं सूर्य की होरा में कार्य आरंभ करके गुरुपुष्य और रविपुष्य जैसा परिणाम प्राप्त किया जा सकता हैं।
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21- 22 अक्तूबर का मुहूर्त विवरण
दिन समय नक्षत्र योग  कौन सा कार्य शुभ
सोमवार, 21 अक्टूबर 2019 शाम 5 बजकर 30 मिनट से 6 बजकर 29 मिनट तक 
 
रविपुष्य योग अनुबंध आदि के लिए श्रेष्ठफलदायी
सोमवार, 21 अक्टूबर 2019 रात्रि 10 बजकर 29 मिनट से 11 बजकर 29 तक मध्य गुरुपुष्य योग मंत्र साधना के लिए श्रेष्ठफलदायी
मंगलवार, 22 अक्टूबर 2019 सुबह 7 बजकर 28 मिनट से 8 बजकर 28 मिनट तक  रविपुष्य योग सभी कार्यों में श्रेष्ठफलदायी
मंगलवार 22 अक्टूबर 2019 दोपहर 12 बजकर 28 मिनट से 1 बजकर 28 मिनट तक गुरुपुष्य योग सभी कार्यों में श्रेष्ठफलदायी
मंगलवार, 22 अक्टूबर 2019 दोपहर बाद 2 बजकर 28 मिनट से 3 बजकर 28 मिनट तक रविपुष्य योग सभी कार्यों में श्रेष्ठफलदायी
 शाम 04 बजकर 37 मिनट पर पुष्य नक्षत्र समाप्ति

पुष्य नक्षत्र 

ज्योतिष शास्त्र के सभी 27 नक्षत्रों में पुष्य नक्षत्र को सर्वश्रेष्ठ माना गया है, यद्यपि अभिजीत मुहूर्त को नारायण के 'चक्रसुदर्शन' के समान शक्तिशाली बताया गया है फिर भी पुष्य नक्षत्र और इस दिन बनने वाले शुभ मुहूर्त का प्रभाव अन्य मुहूर्तो की तुलना में सर्वश्रेष्ठ माना गया है। यह नक्षत्र सभी अरिष्टों का नाशक और सर्वदिग्गामी है। विवाह को छोड़कर अन्य कोई भी कार्य आरंभ करना हो तो पुष्य नक्षत्र और इनमें श्रेष्ठ मुहूर्तों  को ध्यान में रखकर किया जा सकता है। पुष्य नक्षत्र का सर्वाधिक महत्व बृहस्पतिवार और रविवार को होता है बृहस्पतिवार को गुरुपुष्य, और रविवार को रविपुष्य योग बनता है, जो मुहूर्त ज्योतिष के श्रेष्ठतम मुहूर्तों में से एक है। इस नक्षत्र को तिष्य कहा गया है जिसका अर्थ होता है श्रेष्ठ एवं मंगलकारी।
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पुष्य नक्षत्र में गुरु का जन्म
बृहस्पति देव भी इसी नक्षत्र में पैदा हुए थे तैत्रीय ब्राह्मण में कहा गया है कि, बृहस्पतिं प्रथमं जायमानः तिष्यं नक्षत्रं अभिसं बभूव। नारदपुराण के अनुसार इस नक्षत्र में जन्मा जातक महान कर्म करने वाला, बलवान, कृपालु, धार्मिक, धनी, विविध कलाओं का ज्ञाता, दयालु और सत्यवादी होता है। आरंभ काल से ही इस नक्षत्र में किये गये सभी कर्म शुभ फलदाई कहे गये हैं किन्तु मां पार्वती विवाह के समय शिव से मिले श्राप के परिणामस्वरुप पाणिग्रहण संस्कार के लिए इस नक्षत्र को वर्जित माना गया है। 
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गुरुपुष्य योग
गुरुपुष्य योग में धर्म, कर्म, मंत्रजाप, अनुष्ठान, मंत्र दीक्षा अनुबंध, व्यापार आदि आरंभ करने के लिए अतिशुभ माना गया है सृष्टि के अन्य शुभ कार्य भी इस नक्षत्र में आरंभ किये जा सकते हैं क्योंकि लक्षदोषं गुरुर्हन्ति की भांति हो ये अपनी उपस्थिति में लाखो दोषों का शमन कर देता है। इस प्रकार रविपुष्य योग में भी उपरोक्त सभी कर्म किये जा सकते हैं। 


पुष्य नक्षत्र में जन्मी कन्या सौभाग्याली
नारी जगत के लिए ये नक्षत्र और भी विशेष प्रभावशाली माना गया है। इनमें जन्मी कन्याएं अपने कुल-खानदान का यश चारों दिशाओं में फैलाती हैं और कई महिलाओं को तो महान तपश्विनी की संज्ञा मिली है जैसा की कहा भी गया है कि, देवधर्म धनैर्युक्तः पुत्रयुक्तो विचक्षणः। पुष्ये च जायते लोकः शांतात्मा शुभगः सुखी। अर्थात- जिस कन्या की उतपत्ति पुष्य नक्षत्र में होती है वह सौभाग्य शालिनी,धर्म में रूचि रखने वाली, धन-धान्य एवं पुत्रों से युक्त सौन्दर्य शालिनी तथा पतिव्रता होती है।
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