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विरासत के रखवाले
पत्रलेखा चटर्जी, वरिष्ठ पत्रकार
Updated Thu, 10 May 2018 11:01 AM IST
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लालकिला
नेपल्स, इटली का यह तीसरा बड़ा शहर आबादी के बढ़ते दबाव, बेरोजगारी और अपराध तथा भ्रष्टाचार के लंबे इतिहास से जूझ रहा है। लेकिन यहां चौथी सदी के विश्व प्रसिद्ध तहखानों जैसे अनेक बेहद खूबसूरत सांस्कृतिक खजाने भी हैं। ये तहखाने या भूमिगत कब्रिस्तान शहर की गर्व से भरी विरासत का हिस्सा हैं।
कुछ वर्ष पूर्व नेपल्स की यात्रा के दौरान मुझे इन्हें करीब से देखने का मौका मिला था। इसका एक उल्लेखनीय पहलू था वहां की प्रकाश प्रणाली, जिसे एलईडी टेक्नोलॉजी का उपयोग कर कुछ युवाओं के समूह ने तैयार किया था, ताकि वहां स्थित पेंटिंग्स और पच्चीकारी की विरासत को सुरक्षित रखा जा सके। वहां जिस प्रकाश का उपयोग किया गया था उसमें इन्फ्रारेड या अल्ट्रावाइलेट किरणों का प्रभाव नहीं था।
इससे भी कहीं अधिक गौर करने वाली बात यह भी थी कि इस प्रकाश व्यवस्था की जिम्मेदारी संभाल रहे इलेक्ट्रेशियन वहीं पड़ोस की अपेक्षाकृत गरीब बस्ती से थे और उन्होंने कला इतिहास पर अंशकालीन प्रशिक्षण लिया था। इटली अपनी विरासत को लेकर जैसा गंभीर है, वाकई वह कमाल की बात है!
दरअसल देश के भीतर विरासत के संरक्षण को लेकर आज जिस तरह की चर्चा चल पड़ी है,उससे मुझे नेपल्स का वह प्रवास याद आ गया। यदि भारत के ऐतिहासिक स्थल आम लोगों के लिए हैं और उनके संरक्षण में उनकी भागीदारी जरूरी है, तो इसके साथ ही आम लोगों को भी इससे संबंधित सवाल पूछने का हक है। मोदी सरकार की 'एक विरासत स्थल को गोद लो' योजना को लेकर हाल के दिनों में उपजी नाराजगी को इसी से जोड़कर देखना चाहिए।
इस योजना के तहत डालमिया भारत समूह ने दिल्ली में स्थित 17वीं सदी में बने लाल किले को 25 करोड़ रुपये में पांच साल के लिए गोद लिया है। इसके तहत पांच साल तक इस समूह को लाल किले का रख रखाव और वहां रेस्तरां, पीने का पानी, स्ट्रीट फर्नीचर और शौचालय आदि की व्यवस्था करनी है। यह पूछा जाना वैधानिक है कि जब इटली जैसे दूसरे देशों में विरासत स्थलों के संरक्षण और रख रखाव के लिए निजी क्षेत्र और समुदायों की मदद ली जा सकती है, तो फिर भारत में इसे लेकर इतना शोर-शराबा क्यों हो रहा है। यदि टोड्स और फेंडी जैसे अंतरराष्ट्रीय लग्जरी ब्रांड्स यूरोप के प्रतिष्ठित स्मारकों का पुनरुद्धार कर सकते हैं, तो फिर दिल्ली में लाल किले के रख रखाव की जिम्मेदारी एक भारतीय कंपनी डालमिया भारत समूह को देने में गलत क्या है?
क्या जो लोग संदेह जता रहे हैं, वे सारे के सारे खांटी समाजवादी हैं, जो चाहते हैं कि हर तरह की जिम्मेदारी सिर्फ राज्य की हो? इसका जवाब है, कि सच्चाई कहीं अधिक जटिल है। यह कोई नहीं कह सकता कि हमारे विरासत स्थलों के रख रखाव में निजी क्षेत्र की कोई जिम्मेदारी नहीं हो सकती। लेकिन जरा कुछ बातों पर गौर करें। 17वीं सदी में मुगल बादशाह शाहजहां द्वारा बनवाए गए ऐतिहासिक लाल किले की राष्ट्रीय कल्पना में विशेष जगह है।
पारंपरिक रूप से भारत का हर प्रधानमंत्री हर स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले के प्राचीर में तिरंगा फहराता है और देश को संबोधित करता है। इसलिए हेरिटेज एक्टिविस्ट जब चिंता जताते हैं, तो इसका मतलब यह नहीं है कि वे वहां सार्वजनिक सुविधाओं के रख रखाव की जिम्मेदारी किसी निजी कंपनी को दिए जाने पर सवाल उठा रहे हैं। दरअसल उनका आशय इससे भी है कि डालमिया समूह के साथ जो एमओयू किया गया है उसमें और किस तरह के काम दिए जा रहे हैं और उनका विरासत स्थल के रख रखाव की उसकी विशेषज्ञता पर सवाल उठाना जायज लगता है।
पिछले हफ्ते लाल किले के दुकानदारों से मैंने मुलाकात की, तो पता चला कि वे प्रवेश टिकट के दाम बढ़ाए जाने से चिंतित हैं और उन्हें लगता है कि इससे वहां आने वाले पर्यटकों की संख्या पर असर पड़ सकता है। यदि विरासत के संरक्षण में जनता की भागीदारी जरूरी है, तो फिर टिकट दर में बढोतरी से ऐसे लोग वहां जाने से वंचित नहीं हो जाएंगे।
उनका यह भी कहना था कि वह कंपनी खुद ही स्वीकार करती है कि उसने सीमेंट और बिजली जैसे क्षेत्र में शानदार विरासत खड़ी की है, लेकिन कभी विरासत स्थलों के रखरखाव का उसे अनुभव नहीं है, ऐसे में उसे कैसे लाल किले जैसी शीर्ष विरासत की जिम्मेदारी दी जा सकती है?
यह सच है कि जब आगा खान ट्रस्ट ने विरासत संरक्षण की शुरुआत की थी, तब कोई शोर-शराबा नहीं हुआ था। लेकिन ऐसा इसलिए था, क्योंकि आगा खान ट्रस्ट का इस देश में शानदार रिकॉर्ड रहा है, जिसने हुमांयूं के मकबरे का पुनरुद्धार किया, जोकि उस समय एक शहरी पुनरुद्धार परियोजना थी, जिसके तहत वहां आसपास स्थित हजरत निजामुद्दीन बस्ती, सुंदर नर्सरी और हुमांयंू मकबरा परिसर शामिल था। और फिर यह एक ट्रस्ट का मामला है।
विरासत स्थलों के प्रमुख क्षेत्रों के बारे में फैसला भारतीय पुरातत्व विभाग को ही करना है, लेकिन लोग पूछ रहे हैं कि आखिर डालमिया और दूसरे कॉरपोरेट ऐसे विरासत स्थलों पर खुद का प्रचार कैसे कर सकते हैं? इटली की सरकार ने जब रोम में स्थित विश्व प्रसिद्ध रोमनकाल के कलागृह के पुनरुद्धार के लिए प्रायोजक के तौर पर टोड्ज को सूचीबद्ध किया था, तब वहां भी आशंकाएं जताई गई थीं कि कहीं यह कंपनी इस परियोजना का उपयोग अपने वाणिज्यिक मुनाफे के लिए तो नहीं करेगी।
हालांकि टोड्ज समूह ने परियोजना के बाह्य संकेतकों पर अपना सिर्फ एक छोटा-सा लोगो लगाया था। लाल किले के बाद ताजमहल का नंबर है, और कई बड़ी भारतीय कंपनियां उसे गोद लेने के लिए प्रतिस्पर्धा में उतर सकती हैं। इससे जुड़ी समिति को काफी मशक्कत करनी पड़ सकती है, क्योंकि हमारे यहां इस क्षेत्र में आ रही कंपनियों के पास विरासत स्थलों के रख रखाव से संबंधित कोई अनुभव नहीं है।
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कुछ वर्ष पूर्व नेपल्स की यात्रा के दौरान मुझे इन्हें करीब से देखने का मौका मिला था। इसका एक उल्लेखनीय पहलू था वहां की प्रकाश प्रणाली, जिसे एलईडी टेक्नोलॉजी का उपयोग कर कुछ युवाओं के समूह ने तैयार किया था, ताकि वहां स्थित पेंटिंग्स और पच्चीकारी की विरासत को सुरक्षित रखा जा सके। वहां जिस प्रकाश का उपयोग किया गया था उसमें इन्फ्रारेड या अल्ट्रावाइलेट किरणों का प्रभाव नहीं था।
इससे भी कहीं अधिक गौर करने वाली बात यह भी थी कि इस प्रकाश व्यवस्था की जिम्मेदारी संभाल रहे इलेक्ट्रेशियन वहीं पड़ोस की अपेक्षाकृत गरीब बस्ती से थे और उन्होंने कला इतिहास पर अंशकालीन प्रशिक्षण लिया था। इटली अपनी विरासत को लेकर जैसा गंभीर है, वाकई वह कमाल की बात है!
दरअसल देश के भीतर विरासत के संरक्षण को लेकर आज जिस तरह की चर्चा चल पड़ी है,उससे मुझे नेपल्स का वह प्रवास याद आ गया। यदि भारत के ऐतिहासिक स्थल आम लोगों के लिए हैं और उनके संरक्षण में उनकी भागीदारी जरूरी है, तो इसके साथ ही आम लोगों को भी इससे संबंधित सवाल पूछने का हक है। मोदी सरकार की 'एक विरासत स्थल को गोद लो' योजना को लेकर हाल के दिनों में उपजी नाराजगी को इसी से जोड़कर देखना चाहिए।
इस योजना के तहत डालमिया भारत समूह ने दिल्ली में स्थित 17वीं सदी में बने लाल किले को 25 करोड़ रुपये में पांच साल के लिए गोद लिया है। इसके तहत पांच साल तक इस समूह को लाल किले का रख रखाव और वहां रेस्तरां, पीने का पानी, स्ट्रीट फर्नीचर और शौचालय आदि की व्यवस्था करनी है। यह पूछा जाना वैधानिक है कि जब इटली जैसे दूसरे देशों में विरासत स्थलों के संरक्षण और रख रखाव के लिए निजी क्षेत्र और समुदायों की मदद ली जा सकती है, तो फिर भारत में इसे लेकर इतना शोर-शराबा क्यों हो रहा है। यदि टोड्स और फेंडी जैसे अंतरराष्ट्रीय लग्जरी ब्रांड्स यूरोप के प्रतिष्ठित स्मारकों का पुनरुद्धार कर सकते हैं, तो फिर दिल्ली में लाल किले के रख रखाव की जिम्मेदारी एक भारतीय कंपनी डालमिया भारत समूह को देने में गलत क्या है?
क्या जो लोग संदेह जता रहे हैं, वे सारे के सारे खांटी समाजवादी हैं, जो चाहते हैं कि हर तरह की जिम्मेदारी सिर्फ राज्य की हो? इसका जवाब है, कि सच्चाई कहीं अधिक जटिल है। यह कोई नहीं कह सकता कि हमारे विरासत स्थलों के रख रखाव में निजी क्षेत्र की कोई जिम्मेदारी नहीं हो सकती। लेकिन जरा कुछ बातों पर गौर करें। 17वीं सदी में मुगल बादशाह शाहजहां द्वारा बनवाए गए ऐतिहासिक लाल किले की राष्ट्रीय कल्पना में विशेष जगह है।
पारंपरिक रूप से भारत का हर प्रधानमंत्री हर स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले के प्राचीर में तिरंगा फहराता है और देश को संबोधित करता है। इसलिए हेरिटेज एक्टिविस्ट जब चिंता जताते हैं, तो इसका मतलब यह नहीं है कि वे वहां सार्वजनिक सुविधाओं के रख रखाव की जिम्मेदारी किसी निजी कंपनी को दिए जाने पर सवाल उठा रहे हैं। दरअसल उनका आशय इससे भी है कि डालमिया समूह के साथ जो एमओयू किया गया है उसमें और किस तरह के काम दिए जा रहे हैं और उनका विरासत स्थल के रख रखाव की उसकी विशेषज्ञता पर सवाल उठाना जायज लगता है।
पिछले हफ्ते लाल किले के दुकानदारों से मैंने मुलाकात की, तो पता चला कि वे प्रवेश टिकट के दाम बढ़ाए जाने से चिंतित हैं और उन्हें लगता है कि इससे वहां आने वाले पर्यटकों की संख्या पर असर पड़ सकता है। यदि विरासत के संरक्षण में जनता की भागीदारी जरूरी है, तो फिर टिकट दर में बढोतरी से ऐसे लोग वहां जाने से वंचित नहीं हो जाएंगे।
उनका यह भी कहना था कि वह कंपनी खुद ही स्वीकार करती है कि उसने सीमेंट और बिजली जैसे क्षेत्र में शानदार विरासत खड़ी की है, लेकिन कभी विरासत स्थलों के रखरखाव का उसे अनुभव नहीं है, ऐसे में उसे कैसे लाल किले जैसी शीर्ष विरासत की जिम्मेदारी दी जा सकती है?
यह सच है कि जब आगा खान ट्रस्ट ने विरासत संरक्षण की शुरुआत की थी, तब कोई शोर-शराबा नहीं हुआ था। लेकिन ऐसा इसलिए था, क्योंकि आगा खान ट्रस्ट का इस देश में शानदार रिकॉर्ड रहा है, जिसने हुमांयूं के मकबरे का पुनरुद्धार किया, जोकि उस समय एक शहरी पुनरुद्धार परियोजना थी, जिसके तहत वहां आसपास स्थित हजरत निजामुद्दीन बस्ती, सुंदर नर्सरी और हुमांयंू मकबरा परिसर शामिल था। और फिर यह एक ट्रस्ट का मामला है।
विरासत स्थलों के प्रमुख क्षेत्रों के बारे में फैसला भारतीय पुरातत्व विभाग को ही करना है, लेकिन लोग पूछ रहे हैं कि आखिर डालमिया और दूसरे कॉरपोरेट ऐसे विरासत स्थलों पर खुद का प्रचार कैसे कर सकते हैं? इटली की सरकार ने जब रोम में स्थित विश्व प्रसिद्ध रोमनकाल के कलागृह के पुनरुद्धार के लिए प्रायोजक के तौर पर टोड्ज को सूचीबद्ध किया था, तब वहां भी आशंकाएं जताई गई थीं कि कहीं यह कंपनी इस परियोजना का उपयोग अपने वाणिज्यिक मुनाफे के लिए तो नहीं करेगी।
हालांकि टोड्ज समूह ने परियोजना के बाह्य संकेतकों पर अपना सिर्फ एक छोटा-सा लोगो लगाया था। लाल किले के बाद ताजमहल का नंबर है, और कई बड़ी भारतीय कंपनियां उसे गोद लेने के लिए प्रतिस्पर्धा में उतर सकती हैं। इससे जुड़ी समिति को काफी मशक्कत करनी पड़ सकती है, क्योंकि हमारे यहां इस क्षेत्र में आ रही कंपनियों के पास विरासत स्थलों के रख रखाव से संबंधित कोई अनुभव नहीं है।