मानसूनी बारिश होते ही कपकोट क्षेत्र में धान की रोपाई शुरू हो गई है। खेतों में महिलाएं सामूहिक रूप धान की पौध रोपने में जुट गई हैं। उमस भरी गर्मी के बीच उनकी थकान को कम करने की जिम्मेदारी दोनों आंखों से दृष्टिबाधित महेश राम संभाल रहे हैं। हुड़के की थाप के साथ पौराणिक गाथाओं को गाते हुए वह हमारी सांस्कृतिक विरासत को भी सहेजने में जुटे हैं। हुड़किया बौल गायन की वह विधा है, जिसमें पारंपरिक गाथाओं को लयबद्ध करते हुए हुड़के की थाप पर प्रस्तुत किया जाता है। इस विधा में मुख्यत: पुराने राजाओं की वीरगाथाएं, राजुला-मालूशाही की कथा समेत क्षेत्र विशेष के प्रसिद्ध और ऐतिहासिक प्रसंगों का वर्णन होता है। कपकोट गांव के दिव्यांग महेश को इस विधा में महारत हासिल है। साल 1997 से वह हुड़किया बौल गायन कर रहे हैं। हर साल आषाढ़ और श्रावण में कपकोट क्षेत्र में होने वाली धान की रोपाई में उन्हें जरूर आमंत्रित किया जाता है। कपकोट गांव की कमला देवी, दीपा देवी, दया देवी, प्रेमा देवी, सीता देवी, देवकी देवी बताती हैं कि हुड़किया बौल के साथ रोपाई करने से थकान महसूस नहीं होती है। पौराणिक गाथाओं को सुनते-सुनते काम कब खत्म हो गया, इसका पता नहीं चलता। महेश की आवाज और हुड़के की थाप के बीच काम में अधिक ध्यान लगता है। महेश बताते हैं कि हुड़किया बौल के दौरान खेतों में काम कर रही महिलाओं के उत्साह को बनाए रखना होता है। ऐसे में गायक का काम काफी चुनौती भरा रहता है।