"पिंडदान तो एक बहाना है, असल में अंधे मां-बाप को जगाना है..." काशी के पवित्र दशाश्वमेध घाट पर जब वैदिक मंत्रोच्चार गूंज रहे थे, तब गंगा की लहरें भी जैसे बेटियों के इस मौन दर्द से ठहर सी गईं। अवसर था पितृपक्ष की मातृ नवमी का, जब 'आगमन सामाजिक संस्था' के तत्वावधान में डॉ संतोष ओझा ने उन बदनसीब बेटियों की आत्मा की शांति के लिए पिंडदान और तर्पण अनुष्ठान किया, जिन्हें दुनिया में आने से पहले ही उन्हीं के अपनों ने कोख में मार दिया।