आगरा की ऐतिहासिक रामलीला में इस बार 148 साल पुरानी परंपरा का स्वरूप बदलने जा रहा है। पहली बार भगवान सालिगराम को रामलीला कमेटी की ओर से नहीं, बल्कि राजा दशरथ के घर से लाया जाएगा। इसके बाद राम-जानकी विवाह की रस्म पूरी होगी। अब तक कमेटी की ओर से पूजा-पाठ कर सालिगराम को लाने की परंपरा रही है। माता कौशल्या का स्वरूप निभा रहीं नीता सिंगल ने बताया कि परंपरा में बदलाव का सुझाव उन्होंने ही रखा था, जिसे रामलीला कमेटी ने स्वीकार कर लिया। उन्होंने बताया कि सालिगराम और कंटेश्वर की प्रतिमाएं उन्हें कई वर्ष पहले अमरकंटक से नर्मदा मंदिर के मुख्य महंत वंदे जी महाराज ने दी थीं। तभी से वह अपने मंदिर में उनकी पूजा-पाठ करती आ रही हैं। इस बार इन्हीं सालिगराम को राम विवाह के लिए दशरथ के घर से लाया जाएगा। उन्होंने बताया कि आयोजन की तैयारियां भी पारिवारिक विवाह की तर्ज पर की जा रही हैं। तुलसी जी के लिए जयपुर से साड़ी और श्रृंगार का सामान मंगाया गया है, जबकि सालिगराम जी के लिए वृंदावन से श्रृंगार सामग्री, सहारा, बांसुरी समेत अन्य सामान आया है। विवाह के दिन सालिगराम जी के लिए अलग पोशाक भी तैयार कराई गई है। तुलसी-सालिगराम विवाह की रस्में परिवार में बेटे-बेटी के विवाह की तरह ही निभाई जाएंगी। इस बार राम विवाह के आयोजन में एक और नई परंपरा जुड़ने जा रही है। राम-जानकी विवाह के बाद विदाई की रस्म पूरी होने पर पहली बार भगवान श्रीराम दशरथ के घर विश्राम करेंगे। यहीं सभी स्वरूपों का आदर-सत्कार किया जाएगा। आयोजकों के अनुसार इससे पहले विवाह के बाद श्रीराम के दशरथ के घर रुकने और सभी स्वरूपों के स्वागत-सत्कार की व्यवस्था नहीं हुई है। इस बार इसे आयोजन का हिस्सा बनाया गया है। इस बदलाव के साथ रामलीला में विवाह प्रसंग को केवल मंचीय आयोजन तक सीमित रखने की बजाय पारिवारिक परंपराओं के रूप में प्रस्तुत करने की तैयारी है। दशरथ के घर से सालिगराम का आगमन, विवाह की रस्म और विदाई के बाद श्रीराम का वहीं विश्राम इस बार के आयोजन को अलग रूप देगा।