दिवाली पर्व पर लोग दिये जलाकर रोशनी का त्योहार मनाते हैं, वहीं अनेक लोग दिवाली का इंतजार सिर्फ इसलिए करते हैं कि वो अपने दिये बेचकर दिवाली मनाने के साथ-साथ परिवार का पालन-पोषण कर सकें। आधुनिक समय में इलेक्ट्रॉनिक उपकरण के चलन ने दिये से होने वाली आय को कम किया है। हालांकि दिवाली के दौरान समय पर दिये व अन्य सामान तैयार करने के लिए चाक पर 76 वर्ष के बुजुर्ग से लेकर स्कूल व कॉलेज में पढ़ने वाले बच्चे सहित परिवार के सभी सदस्य मिलकर कार्य करते हैं, ताकि आय को बढ़ाया जा सकें। ---------- दिये का मूल्य है कि बढ़ता ही नहीं : आज से करीब 60 से 70 साल पहले मिट्टी के दिये बनाने वाले कारीगर बाजरा व गेंहू के बदले दिये बेचते थे। आधुनिक दौर में व्यापार का स्वरूप बदल गया है, लेकिन दिये का मूल्य अभी भी बहुत कम बना हुआ है। जिसके चलते 100 दिये बेचने के बाद कारीगरों को 30 से 40 रुपये की बचत निकल पाती है। -------- परिवार को मजबूत करने का लक्ष्य बनाया बच्चों ने : मोहल्ला बड़ का कुआं में अनेक लोग मिट्टी के बर्तन व दीये बनाने का कार्य करते हैं। 11 से 20 वर्ष आयु के बच्चे पारंपरिक कार्य के बजाय अन्य क्षेत्रों में करियर बनाना चाहते हैं। 13 वर्षीय पंकज व 14 वर्षीय कार्तिक सेना में, 14 वर्षीय कोमल शिक्षिका, 15 वर्षीय अर्चना पुलिस और 17 वर्षीय नैंसी व्यापार करना चाहती हैं, ताकि अपने व परिवार के जीवन को बेहतर बना सकें।