आमतौर पर घरों से निकलने वाला किचन कचरा लोगों के लिए परेशानी बन जाता है, लेकिन अर्बन स्टेट निवासी रेशमा गेरा के लिए यही कचरा हरियाली और स्वच्छता का सबसे बड़ा साधन है। अगर सही तरीके और सोच के साथ काम किया जाए, तो बिना किसी बड़े खर्च के घर पर ही पौष्टिक खाद तैयार की जा सकती है। रेशमा जीरो वेस्ट और जीरो बजट कंपोस्टिंग के जरिए न केवल अपने घर का कचरा पूरी तरह मैनेज कर रही हैं, बल्कि इसी खाद से उन्होंने सैकड़ों गमलों में हरियाली भी उगाई है। मैंने शुरुआत में खाली समय बिताने के लिए गार्डनिंग को अपनाया था। एक सहेली को पौधों की देखभाल करते देख मुझे भी शौक हुआ। धीरे-धीरे यह शौक इतना पसंद आने लगा कि यह मेरा जुनून बन गया। हालांकि, जब बाजार से खाद और पौधे खरीदने में खर्च बढ़ने लगा, तो मैंने सोचा कि क्यों न इसे बिना खर्च के किया जाए। यहीं से जीरो बजट गार्डनिंग और खाद बनाने का विचार मेरे मन में आया। पिछले आठ वर्षों से वेस्ट मैनेजमेंट के क्षेत्र में काम कर रहीं हूं। मुझे हरि भरी वसुंधरा समिति की अध्यक्ष सुनीता महाजन से विशेष प्रेरणा मिली। मैंने तय किया कि रोज़ाना घर से निकलने वाले किचन वेस्ट को बाहर फेंकने के बजाय खाद में बदला जाएगा। शुरुआत में मैंने केवल 10 गमलों से काम शुरू किया, लेकिन पौधों की प्रोपेगेशन और डिवाइडिंग के जरिए आज मेरे पास करीब 200 गमले हैं, जिन्हें मैं पूरी तरह घर पर बनी खाद से ही पोषित कर रही हैं। मैं खाद बनाने के लिए अपने घर में पुराने मिट्टी के मटकों का उपयोग करती हैं। मिट्टी के मटकों में कंपोस्टिंग की प्रक्रिया ज्यादा बेहतर होती है, क्योंकि इनमें हवा और नमी का संतुलन बना रहता है। हालांकि प्लास्टिक की बाल्टी या ड्रम में भी खाद बनाई जा सकती है, लेकिन मिट्टी के बर्तनों में खाद जल्दी और अच्छी गुणवत्ता की बनती है। खाद बनाने की प्रक्रिया बेहद आसान हैं। सबसे पहले पुराने गमलों की मिट्टी मटके में डाली जाती है। इसके ऊपर किचन से निकलने वाला जैविक कचरा जैसे फल और सब्जियों के छिलके, सूखे पत्ते, न्यूजपेपर, शादी के कार्ड के गत्ते की एक परत बिछाई जाती है। सूखे पत्तों की लेयर डालकर मटके को ढक दिया जाता है और कुछ ही समय में यही कचरा पौष्टिक खाद में बदल जाता है। जब मटके भर जाते हैं और फिर भी कचरा बच जाता है, तो मैं कट्टों में भी खाद बनाती हैं। मूली, संतरा, प्याज, लहसुन, अनार और केले के छिलकों से तैयार की गई खाद उनके गार्डन की सबसे बड़ी ताकत है। इस खाद से न केवल पौधे स्वस्थ रहते हैं, बल्कि बाजार से खाद खरीदने का खर्च भी पूरी तरह बच जाता है। मेरे पति भी खाद तैयार करने में मेरा पूरा सहयोग करते हैं। रेशमा गेरा का कहना है, अगर हम देश को पूरी तरह साफ नहीं रख पा रहे, तो कम से कम उसे गंदा भी न करें। घर का कचरा घर में ही मैनेज करना हम सभी की जिम्मेदारी है। उनकी यह पहल लोगों को यह संदेश देती है कि थोड़े से प्रयास से हर घर जीरो वेस्ट बन सकता है और कचरा भी हरियाली का साधन बन सकता है।