अगर आप भी इलेक्ट्रिक स्कूटर खरीदने की तैयारी कर रहे हैं, तो यह खबर आपके लिए बेहद जरूरी है। जरा सोचिए, आपने 88 हजार रुपये खर्च करके एक इलेक्ट्रिक स्कूटर खरीदा, कंपनी ने 85 किलोमीटर की रेंज का दावा किया, लेकिन स्कूटर चलने लगा महज 16 किलोमीटर। बार-बार सर्विसिंग कराई, बैटरी भी बदलवाई, लेकिन समस्या जस की तस बनी रही। ऐसे ही एक मामले में उपभोक्ता अदालत ने बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने स्कूटर निर्माता कंपनी को न सिर्फ उत्पादन में खराबी का दोषी ठहराया, बल्कि ग्राहक को करीब 1 लाख 68 हजार रुपये लौटाने का आदेश भी दिया। आखिर क्या है पूरा मामला और अदालत ने कंपनी को कैसे सिखाया सबक? देखिए ये रिपोर्ट।
इलेक्ट्रिक स्कूटर खरीदते वक्त कंपनियों के बड़े-बड़े दावे ग्राहकों को आकर्षित करते हैं। लंबी रेंज, कम खर्च और बेहतर परफॉर्मेंस के वादे किए जाते हैं। लेकिन जब यही दावे हकीकत में दम तोड़ने लगें, तो ग्राहक आखिर कहां जाए? केरल के पलक्कड़ में सामने आया यह मामला इसी सवाल का जवाब देता है। दरअसल, साल 2022 में एक ग्राहक ने अधिकृत डीलर से 88 हजार रुपये में इलेक्ट्रिक स्कूटर खरीदा था। कंपनी और डीलर ने दावा किया था कि स्कूटर छह घंटे में फुल चार्ज होकर 85 किलोमीटर तक चलेगा। साथ ही, वाहन पर तीन साल की वारंटी भी दी गई थी।
लेकिन स्कूटर खरीदने के साथ ही ग्राहक की मुश्किलें शुरू हो गईं। कंपनी के दावे के उलट, स्कूटर शुरुआत से ही महज 40 किलोमीटर की रेंज दे रहा था। वक्त बीतने के साथ इसकी परफॉर्मेंस और खराब होती चली गई। ग्राहक ने कई बार स्कूटर की सर्विसिंग कराई। यहां तक कि बैटरी भी बदलवाई गई, लेकिन समस्या का कोई स्थायी समाधान नहीं निकला। हालात ऐसे हो गए कि स्कूटर की रेंज घटकर सिर्फ 18 से 20 किलोमीटर रह गई। इतना ही नहीं, चार्जर में खराबी और फ्रंट व्हील के बियरिंग में ढीलापन जैसी समस्याओं ने भी ग्राहक की परेशानी बढ़ा दी।
लगातार शिकायतों और मरम्मत के बावजूद जब स्कूटर ठीक नहीं हुआ, तो ग्राहक ने दिसंबर 2024 में उपभोक्ता अदालत का दरवाजा खटखटाया। मामले की सुनवाई के दौरान पलक्कड़ जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने स्कूटर की तकनीकी जांच के लिए दो विशेषज्ञों की नियुक्ति की। विशेषज्ञों की संयुक्त रिपोर्ट में कई गंभीर खामियां सामने आईं। जांच में पता चला कि फुल चार्ज होने के बावजूद स्कूटर महज 16 किलोमीटर ही चल पा रहा था। बैटरी में वोल्टेज की कमी और चार्ज को लंबे समय तक बनाए रखने की क्षमता भी बेहद खराब पाई गई। इसके अलावा, शाफ्ट के छेद के आकार में गड़बड़ी और फ्रंट व्हील के शाफ्ट बियरिंग सिस्टम में भी खराबी मिली।
विशेषज्ञों की रिपोर्ट ने कंपनी के लिए मुश्किलें खड़ी कर दीं। वहीं, कंपनी और डीलर ने अपने बचाव में कई दलीलें दीं। उनका कहना था कि स्कूटर की कम रेंज के पीछे राइडर का वजन, सड़क की स्थिति, टायरों में हवा का दबाव, मौसम और तेज रफ्तार जैसे कारण जिम्मेदार हो सकते हैं। इसके अलावा, उन्होंने शिकायत दर्ज कराने में देरी का तर्क भी दिया। लेकिन आयोग ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि कंपनी और डीलर अपने दावों के समर्थन में कोई ठोस सबूत पेश नहीं कर सके। लगातार नौ सुनवाइयों में अनुपस्थित रहने के कारण उनके खिलाफ एकतरफा कार्यवाही भी की गई।
30 सितंबर को आयोग के अध्यक्ष विनय मेनन वी और सदस्यों विद्या ए तथा कृष्णनकुट्टी एन की पीठ ने ग्राहक के पक्ष में फैसला सुनाया। आयोग ने माना कि बार-बार बैटरी बदलने और मरम्मत के बावजूद समस्या दूर नहीं हुई। यह कंपनी की सेवा में कमी और वाहन में उत्पादन संबंधी खामी का मामला है। अदालत ने कंपनी और डीलर को कुल करीब 1 लाख 68 हजार रुपये देने का आदेश दिया। इसमें 88 हजार रुपये स्कूटर की पूरी कीमत का रिफंड, 55 हजार रुपये मानसिक उत्पीड़न और असुविधा के मुआवजे के तौर पर और 25 हजार रुपये कानूनी खर्च के लिए शामिल हैं।
यह फैसला इलेक्ट्रिक वाहन खरीदने वाले ग्राहकों के लिए एक अहम संदेश है। कंपनियां अपने उत्पादों की खराबी के लिए बिना सबूत ग्राहकों को जिम्मेदार नहीं ठहरा सकतीं। अगर बार-बार मरम्मत के बावजूद समस्या दूर नहीं होती और विशेषज्ञ जांच में उत्पादन संबंधी खामी साबित हो जाती है, तो ग्राहक रिफंड और मुआवजे की मांग कर सकते हैं। ऐसे मामलों में उपभोक्ता राष्ट्रीय हेल्पलाइन नंबर 1915 पर भी शिकायत दर्ज करा सकते हैं। यानी कंपनी के दावों और असल परफॉर्मेंस के बीच बड़ा अंतर हो, तो ग्राहक के पास कानूनी रास्ता भी मौजूद है।